ताजा सुबह


ताजा सुबह...

ये सुहानी सुबह
खिड़की से झांकता उजाला
एक नई उम्मीद की
रौशनी बिखर रही है

तुम भी
हँसी बिखेर दो,
सुकून अपना लो,
हर पल अपने नाम कर लो 
जीवन के मधुर संगीत का
आनंद भी लीजिए...

जो बीत गया 
उसे उसे भूल जाओ
जो आने वाला है 
उसका स्वागत करो
याद रखो 
हर क्षण खास है.....

☺️☺️☺️☺️☺️☺️

कहानी: संगम


कहानी : संगम 


शाम ढलने लगी थी ... गहरी सुनहरी किरणें राणा प्रताप सागर की बहती जलधारा की सतह पर बिखर रही थी.. दोनो का मिलन, ऐसा लगता था जैसे शाम को दो प्रेमी मिल रहे हों... और जल की मधुर आवाज जैसे कोई गीत गुनगुना रहा हो..

सागर किनारे खड़ा नीलेश ये नजारा देख रहा था... ऊंचे ऊंचे पर्वत... दूर दूर फैला सागर का शांत जल, जिसमें दिखाई देती थीं पहाड़ियों की परछाइयाँ और कहीं दूर ढलता हुआ सुनहरी सूरज. 

ऐसे में किसी ने पुकारा
"हेलो नीलेश" 
नीलेश एक क्षण चौंका फिर पलट कर बोला
"ओ हाय नीलम"
दोनों ने एक दूसरे को देखा और मुस्कुराने लगे.
"आप बोर तो नहीं हो रहे थे" नीलम ने नीलेश के चेहरे के भावों को पढ़ते हुए कहा..
"नहीं तो मैं तो इन सुंदर नज़ारों का आनंद ले रहा था"
नीलेश ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया.

ये दोनों की पहली मुलाकात थी. दोनों के मन में असंख्य प्रश्न थे. दोनों के दिल धड़क भी रहे थे.
"बहुत सुंदर जगह है" नीलेश ने चुप्पी तोड़ी.
"मै अक्सर यहां आती रहती हूँ.. मुझे यहां ढलता हुआ सूरज देखना बहुत अच्छा लगता है" नीलम ने अपने मन की बात कह दी.
"चलो वहां उस पत्थर पर बैठते है" नीलेश ने आग्रह किया तो नीलम ने उसे स्वीकार कर लिया.

शादी डॉट कॉम के जरिये ये उन दोनों की पहली मुलाकात थी... शाम अब गहराने लगी थी...  दोनों के लिये अब ये शाम रोमांटिक होती जा रही थी... थोड़ी देर में दोनों ने अपने अपने विचारों का आदान प्रदान किया... ढेर सारी बातें हुई... शंकाओं का समाधान हुआ... भविष्य की बाते हुई... कुछ काम की बाते भी हुई... और फ़िर उनकी ये बातें कब प्यार में बदल गई.
"मुझे तुम पसंद हो, क्या मैं तुम्हें ?? " 
नीलेश ने रोमांटिक होते हुए पूछा 
"हां" 
इतना बोलते ही नीलम शरमा गई, उसके गाल शरम से लाल हो गये थे.

नीलेश ने नीलिमा का हाथ पकड़ा और गाने लगा
“चाँद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था… हां तुम बिल्कुल वैसी हो जैसा मैने सोचा था"

दोनों एक दूसरे का हाथ थामे... सागर किनारे किनारे चलने लगे... नीचे अथाह जल ... ऊपर अनंत आकाश...   इनके बीच ये दो अंजान अपना छोटा-सा संसार रच रहे थे...  बातचीत साधारण थी पर हर शब्द में एक नई शुरुआत की स्वीकारोक्ति थी.

सूरज अब पूरी तरह ढल चुका था...  आकाश में असंख्य तारे उतर आये थे... हल्की चाँदनी भी उतर आई थी... नीलेश का गया गीत सार्थक हो रहा था. 
दोनों वापसी की तैयारी में थे. दोनों जाना नहीं चाह रहे थे. अब कोई औपचारिकता भी नहीं थी,  एक नए बंधन की तैयारी थी. 
नीलेश ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा
"नीलू चलते हैं... जल्दी ही .. फिर मिलेंगे" 
"हां नीलेश" 
कहते हुए नीलम धीरे धीरे घर की तरफ मुड़ने लगी... बिछुड़ने का ग़म दोनों को ही हो रहा था.
उस दिन राणा प्रताप सागर के जल में उनका प्रतिबिंब एक संगम बन गया था..

 

जिंदगी : एक खुली किताब


जिंदगी : एक खुली किताब 

हमारी जिंदगी एक खुली किताब है. हर सुबह एक नया पन्ना हमारे सामने खुलता है. ये पन्ने कुछ सुनहरे अक्षरों से लिखे होते हैं, जिनमें खुशियां, उपलब्धियां और प्रेम की कहानियाँ दर्ज होती हैं. लेकिन वहीं कुछ पन्नों पर धुंधले शब्द होते हैं, संघर्ष, असफलता और इंतजार के. देखा जाय तो जिंदगी में सब तरह के पन्ने होने चाहिए़ क्योंकि यही पन्ने हमारी जिंदगी की कहानी को पूर्ण बनाते हैं.

इस जिंदगी वाली किताब की सबसे रोचक बात यह है कि इसके लेखक भी हम हैं और पाठक भी हम ही हैं. हमारे निर्णय, हमारी सोच, हमारे कर्म , यही इस कहानी की स्याही हैं. अगर हम शिकायत की भाषा चुनते हैं तो पन्ने भारी हो जाते हैं; यदि हम आशा और सकारात्मकता की कलम उठाते हैं तो यही पन्ने हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाते हैं.

जिंदगी में, कभी-कभी हम पुराने पन्नों में अटक जाते हैं. बीती हुई गलतियाँ, टूटे रिश्ते, अधूरे सपने, ये सब हमें पीछे की ओर खींचते हैं. लेकिन किताब की खूबसूरती इसी में है कि हर अध्याय के बाद नया अध्याय आता है. कोई भी पन्ना अंतिम नहीं होता, जब तक हम खुद उसे अंतिम ना मान लें.

हमारे जीवन की इस खुली किताब के कुछ पन्ने हम स्वयं लिखते हैं, और कुछ परिस्थितियाँ हमारे लिए लिख देती हैं. परंतु शीर्षक और निष्कर्ष हमेशा हमारे हाथ में ही होते हैं. यदि हम धैर्य, विश्वास और कर्म को आधार बनाएं, तो यह किताब प्रेरणा की एक गाथा बन सकती है.

जिंदगी को पढ़ने से अधिक उसे समझना और महसूस करना बहुत जरूरी है. हर अनुभव एक सीख है, हर मुलाकात एक नए विचार को जन्म देती है और हर संघर्ष एक नया अध्याय लिख देती है. 

आओ कलम को थामे रखते हैं, जिंदगी के पन्नों को किस्से कहानियों से रंगने के लिए....

Poem: Until I hold you again


Until I Hold You Again

You know 
My home is quiet now…
but your silence 
is the loudest sound.

Your beautiful face, 
your lovely smile,
the way you called my name
"Gee kay"
they linger still in the air.

Every morning 
I still speak to you
Every night 
I feel you with me.

People say time heals
but time only teaches me
how much of my heart
went with you.

Oh My love 
Wait for me 
beyond the stars,
When the journey ends,
I will find you again…


शिव क्या हैं ?


शिव क्या हैं ?
“शिव” शब्द का अर्थ है ;  कल्याण, मंगल, शुभता. 
इस दृष्टि से शिव कोई देवता मात्र नहीं हैं, बल्कि अस्तित्व का परम कल्याणकारी सिद्धांत हैं. भारतीय दर्शन में शिव को परम चेतना (Pure Consciousness) माना गया है.  शिव पुराण और लिंग पुराण में शिव को सृष्टि के मूल कारण के रूप में वर्णित किया गया है. चेतना और ऊर्जा का अद्वैत मिलन ही सृष्टि है.

पुराणों के अनुसार शिव को त्रिदेवों में “संहारकर्ता” कहा गया है, परंतु यह संहार विनाश नहीं, बल्कि रूपांतरण (Transformation) है.
त्रिदेव की अवधारणा में:
ब्रह्मा – सृष्टि
विष्णु – पालन
शिव – संहार और परिवर्तन
शिव का तांडव नृत्य सृष्टि और प्रलय की लयात्मक गति का प्रतीक है.

शिव जी के प्रतीक चिन्ह है...
त्रिनेत्र → भूत, वर्तमान, भविष्य का बोध
नीलकंठ → विष धारण कर भी संतुलन रखना
जटा से बहती गंगा → ज्ञान की धारा
चंद्रमा → मन और शीतलता
डमरू → सृष्टि की आद्य ध्वनि (स्पंदन सिद्धांत)
शिवलिंग → निराकार ब्रह्म का प्रतीक

उपनिषदों में शिव को ब्रह्म का ही एक नाम माना गया है. ईशोपनिषद की भावना के अनुसार , सब कुछ उसी एक चेतना से व्याप्त है. अर्थात शिव कोई बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि:“जो भीतर साक्षी है, वही शिव है।”

योग परंपरा में शिव को “आदियोगी” कहा जाता है अर्थात प्रथम योगी. वे ध्यान, समाधि और तंत्र के मूल प्रवर्तक माने जाते हैं.

शिव केवल एक देवता नहीं  हैं 
वे शून्य भी हैं और पूर्ण भी,
वे विनाश भी हैं और सृजन भी,
वे मौन भी हैं और नाद भी

ॐ नमः शिवाय 

गायत्री माता और मंत्र


माता गायत्री और गायत्री मंत्र
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में गायत्री माता को वेदों की जननी और ज्ञान की अधिष्ठात्री शक्ति माना गया है. माता गायत्री,  केवल एक देवी स्वरूप नहीं हैं, बल्कि प्रकाश, चेतना और विवेक की प्रतीक भी हैं.

गायत्री माता का स्वरूप
धार्मिक ग्रंथों में देवी गायत्री को पाँच मुख और दस भुजाओं वाली दिव्य शक्ति के रूप में चित्रित किया गया है. माता के पाँच मुख पाँच प्राण और पाँच तत्वों का प्रतीक माने जाते हैं. उनका संबंध विशेष रूप से ऋग्वेद से बताया जाता है, जहाँ गायत्री छंद में अनेक ऋचाएँ रची गई हैं. 

गायत्री मंत्र
गायत्री मंत्र को वेदों का सार कहा गया है। यह मंत्र ऋग्वेद  के मंडल 3, सूक्त 62, मंत्र 10 से प्राप्त हुआ है.

ॐ भूर्भुवः स्वः
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्.........
अर्थात 
ॐ – परम ब्रह्म का प्रतीक
भूः, भुवः, स्वः – तीन लोक (पृथ्वी, अंतरिक्ष, स्वर्ग)
तत् सवितुः – उस परम दिव्य प्रकाश (सूर्य स्वरूप) का
वरेण्यं – जो वरण करने योग्य है
भर्गः – पाप और अज्ञान का नाश करने वाला तेज
धीमहि – हम ध्यान करते हैं
धियो यो नः प्रचोदयात् – वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे.

विभिन्न दृष्टिकोण
गायत्री मंत्र में “सविता” शब्द सूर्य देव के लिए प्रयुक्त हुआ है.सूर्य यहाँ  प्रकाश का प्रतीक है. आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार, नियमित मंत्र-जप से:
     1. मन की एकाग्रता बढ़ती है
     2. तनाव कम होता है
     3. सकारात्मक विचारों का विकास होता है
     4. न्यूरोलॉजिकल स्थिरता में सुधार देखा गया है
         यह प्रभाव ध्वनि-तरंगों, लयबद्ध श्वसन और             ध्यान की अवस्था के कारण होता है.

आध्यात्मिक महत्व
गायत्री मंत्र को “वेदमाता” कहा जाता है क्योंकि यह आत्म-शुद्धि और चेतना-विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। अनेक संतों और विचारकों ने इसे सार्वभौमिक प्रार्थना बताया है. पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने गायत्री साधना को युग-परिवर्तन की आधारशिला माना है.

हम कह सकते हैं  कि गायत्री मंत्र वस्तुतः बुद्धि-प्रकाश और विवेक-जागरण की एक प्रार्थना है. यह मंत्र एक सार्वभौमिक प्रार्थना है , न किसी जाति की, न किसी पंथ की... यह मनुष्य की बुद्धि को प्रकाशमान करने की साधना है. क्योंकि “जब भीतर प्रकाश जलता है, तभी बाहर का अंधकार मिटता है।”


कहानी: निंदिया और बिंदिया

कहानी: निंदिया में बिंदिया 

गजेंद्र अपने बेड रूम में लेटा अपनी पत्नी प्रिया की फोटो को निहार रहा था. मुस्कुराती हुई प्रिया के माथे पर लाल लाल गोल बिंदी बहुत प्यारी लग रही थी. गजेंद्र अक्सर गुनगुनाया करता था
"आय हाय तेरी बिंदिया रे"
और वो कहती थी 
"तेरी निंदिया ले लेगी मेरी बिंदिया रे"
सच में जब से वो गई है, गजेंद्र की निंदिया में बिंदिया छाई रहती है"

उसे याद आया प्रिया को तो बिंदी बहुत पसंद थी, चाहे शादी फंक्शन हो या पीहर जाना हो उसके मेक अप बॉक्स में तरह तरह की मैचिंग बिंदिया जरूर होती थीं. कई बार तो हॉस्पिटल भर्ती होने से पहले अपने समान में बिंदी रखना नहीं भूलती थी. अगर भूल भी जाती तो कहती " जी मैं बिंदी भूल आई हूँ लेते आना" 
जब गजेंद्र बिंदिया ले कर जाता तो कहती थी
"अरे जी ये वाली नहीं चाहिए थी, तुम भी ना एक भी काम ढंग से नहीं करते हो" 
ये सब सोचते सोचते उनकी आँखों कुछ गीली हो जाती थीं.

प्रिया को गये करीब 4 वर्ष बीत गए. उसके जाने के बाद
घर में कई चीज़ें बदलीं, नहीं बदली तो उसकी बिंदी वाली फोटो और उसकी जगह. 

गजेंद्र अब भी प्रिया के साथ उसी कमरे में अपने आप को कैद कर लिया है, मानो प्रिया कह रही हो जी तुम मेरे सामने रहो और रोज़ मेरी बिंदी निहारा करो. जी मैडम, उसने तस्वीर की तरफ देखा और मुस्कुरा उठा.. 

एक छोटी सी बिंदी ने उसका जीवन अभी भी थाम के रखा है...


कविताएँ : ये जो है जिंदगी

ये जो है जिंदगी.....

ज़िंदगी 
सीधी लकीर तो नहीं 
हर मोड़ एक कहानी है
कभी धूप में जलती हैं साँसें,
तो कभी छाँव मौजों की कहानी है..
🙂🙂🙂🙂😀😀😀😀😀😀


हर सुबह 
एक सवाल है,
हर शाम 
ढेरों सवाल छोड़ जाती है
क्या, क्यों कैसे में 
जिंदगी उलझ जाती है...
🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂


ज़िंदगी ने सिखाया 
मुस्कुराना और रोना भी
कोई हंसता हुआ रोता है
किसी के आंसू सूख जाते हैं 
फिर भी जिंदगी चलती है
बिन पते की चिट्ठी लिए ..
😊😊😊😊😊😊😊😊


ये जिंदगी है दोस्तो
जीत में हर कोई 
मुस्कुराता रहता है
कुछ ऐसे भी हैं
जो हार में भी 
जिंदगी खोज लेती है...
☺️☺️☺️☺️☺️☺️☺️




कहानी: अकेलापन

अकेलापन 

रात के करीब ग्यारह बज रहे थे. शहर की एक आलीशान बिल्डिंग के तीसरे माले पर खड़ा आरव नीचे की ओर देख रहा था.. इतनी रात को भी गाड़ियों का मेला सा लगा हुआ था... कुछ गाड़ियां थमी थीं.. कुछ भाग रही थीं, लोग भाग रहे थे, समय भी भाग रहा था. वह उदास सा इन सबको देख रहा था. उसके कमरे में ठहरा हुआ सन्नाटा सा था.

आरव की दिनचर्या मे दिन भर दफ्तर में लोगों से घिरा रहना, मीटिंग, ईमेल, फोन कॉल औरभी बहुतकुछ. शाम जब वो फ्लैट का दरवाज़ा खोलता, सारा शोर बाहर रह जाता और उसके भीतर एक खालीपन आ जाया करता था.

अक्सर चाय का कप लिए वह बालकनी से बड़ी बड़ी इमारतों की खिड़कियां की जलती बुझती रोशनी देखता जैसे हर फ्लैट की अपनी कोई कहानी चल रही हो. उसे लगता था कि इतनी भीड़ के बीच भी वह अकेला कैसे है?

एक रात उसने चाय वाले को देखा. कुछ लोग उस ठेले के पास खड़े हँस हँस कर बतियारहे थे और चाय सिगरेट का आनंद ले रहे थे. उसकी हिम्मत नहीं हुई उनकी बातों में शामिल होने की. चाय का गिलास खत्मकर आरव अपने फ्लैट पर आ गया.

आरव दफ्तर से लौटते वक्त रूटीन से उसके ठेले से चाय पीता. उसकी चाय वाले से बातचीत भी शुरू होने लगी, कभी मौसम की, काम की, शहर की और भी चीज़ों की. अब ये ठेला आरव की शाम का हिस्सा बन गया था. उसे लगने लगा था उसकी तरह ही यहाँ कॉलेज के छात्र , ऑटो चालक , ऑफिस के लोग औरभी लोग.. सब अपने अपने अकेलेपन को दो घूँट चाय में घोल रहे थे.

आरव महसूस करने लगा कि शहर में अकेलापन भीड़ की कमी से नहीं, जुड़ाव की कमी से होता है. उसने सोचा अब अकेलेपन को हराया जाय ... अब आरव ने कुछ नया करने की सोची उसने स्केच बनाना, पार्क में बैठकर लोगों के चेहरे पढ़ना, फोटोग्राफी करना, छुट्टी के दिन किसी नजदीक जगह घूमने चले जाना और व्यस्त रहना शुरू कर दिया.

अब उसका कमरा पहले जैसा खाली नहीं रहता था. 
खिड़की से दिखती रोशनियाँ भी अब अनजानी नहीं थीं. 
उसे समझ आ गया था... अकेलापन कोई दीवार नहीं है बल्कि एक पुल है जो उस पार क्या है.. दिखाता है..

आरव अब अकेला नहीं था उसे शहर में धड़कन महसूस होने लगी थी...

कहानी : मैं फिर लौटूंगा


मैं फिर लौटूंगा
 

वरुणेश एक कॉल सेंटर में काम करता है .. कुछ दिनों से उसे अच्छा नहीं लग रहा था... वह कुछ थका और असहाय सा महसूस कर रहा था.. काम के बोझ से, इस देश की राजधानी के पोल्यूशन से, भीड़ से और ऊंची ऊंची बिल्डिंग से वह घुटन महसूस कर रहा था. वह अक्सर सोचा करता था पैसों की चाहत ने इंसान को मशीन ही बना डाला.

वरुणेश को अब शांति की जरूरत महसूस हुई. उसने सोचा दो दिन की छुट्टी पर कहीं शांत और एकांत वाली जगह चला जाय. शुक्रवार की शाम का दिन था उसने फटाफट जरूरी सामान के साथ बैंग पैक किया और निकल पड़ा बस अड्डे की तरफ, बिना किसी तय मंज़िल के.

विशाल बस अड्डा... ... जहाँ देखो बसें ही बसे, चिल्ल पों मची हुई थी, कन्डेक्टर अपनी अपनी बसों को भरने में लगे थे... वरुणेश के सामने एक बस वाला चिल्ला रहा था 
"नॉन स्टॉप... ऋषिकेश... ऋषिकेश"

बारुणेश ने क्षण भर के लिए सोचा फिर फटाफट बस के अंदर प्रवेश किया... बस भर चुकी थी... थोड़ी देर में कंडक्टर ने टिकट भी बना दिया.. बस चल रही थी ... हवा के ठंडे झोंको ने उसे सुला दिया...

सुबह हो चुकी थी. कंडक्टर ने उसे जगाया 
"सर .. ऋषिकेश आ गया है"
"ओह" उसने कंडक्टर को धन्यवाद दिया.

शांत सुबह... हरी भरी पहाड़ीयों के किनारे माँ गंगा तीव्र गति से बह रही थी. असीम शांति थी, मनोरम दृश्य था और नदी के किनारे एकांत था. वरुणेश ने बिना समय गवाएं नदी के तट की ओर बढ़ा... घाट की सीढ़ियों पर बैठा नदी के बहाव को देख रहा था. सोच रहा था.. जीवन में इंसान को भी को इसी तरह चलते रहना चाहिए... सतत.

उसने महसूस किया ... पहाड़ों की गोद में बसा यह छोटा सा स्थान किसी दैविक जगह से कम नहीं है. उसे हवा में ठंडक और ताज़गी महसूस हुई... दूर किसी मंदिर से घंटी की आवाज उसे एक मधुर संगीत की तरह महसूस होने लगी. वह इस अनुपम सौंदर्य का आनंद लेने लगा. उसे लगा प्रकृति उसे प्यार कर रही है छोटे बच्चे की तरह दुलार रही है.

पास खड़े एक वृद्ध साधु ने मुस्कुराकर कहा
“बेटा, यहाँ लोग सवाल लेकर आते हैं और शांति लेकर जाते हैं।”
"जी बाबा आप सही कह रहे हैं" 
वरुणेश ने आँखें बंद कर लीं, उसे देख शहर की भागती सड़कें, अधूरे काम, उलझी बातें सब धीरे-धीरे धुँधली हो रहीं थीं.

उसे सब समझ आ गया था. प्रकृति समाधान नहीं देती है बल्कि वह मन को इतना शांत कर देती है कि समाधान स्वयं दिखाई देने लगते हैं.

दिनभर वह गंगा के किनारे घूमता रहा.. शाम को जब सूरज पहाड़ों के पीछे उतर रहा था, आकाश का रंग गहरा पीला हो रहा था. वरुणेश मन ही मन आनंदित होकर बोला,
“जब भी मेरा मन उदास होगा" 
फिर माँ गंगा की तरफ मुखातिब होकर बोला..
"माँ ... मैं फिर लौटूँगा, आपसे मिलने" 
सूरज ढल रहा था, फिर एक नई सुबह के लिए...



कविता : गाय माता


गाय माता...

वह बोलती नहीं है
उसकी आँखों में प्यार होता है
सदियों से मानव जाति पर 
उसका अटूट विश्वास होता है...

आज भी हम
उसे “माता” कहते हैं
आस्था के दीप भी जलते हैं
कभी कभी उसकी थाली में
पुण्य के लिए 
कुछ खास भी परोस भी देते हैं..

देखते हैं
हर गली मोहल्ले के 
अंजान मोड़ों पर
वीरान सड़कों पर
व्यस्त चौराहों पर
वह खड़ी रहती है
चुपचाप देखती रहती है
इधर उधर टुकुर टुकुर 
काश कोई खाने को दे जाये..

उसको भी लगती है
सुबह शाम भूख 
मुँह में कचरा दबाए
आँखों में उम्मीद लिए 
फिरती रहती है मारे मारे
काश कोई बेटा बनकर आये..

उसने दी  
खेतों को हरियाली दी,
घर को दिया अन्न 
बचपन में दूध दिया,
बीमार को दी औषधि 
पर बदले में क्या पाया?
कचरा और पॉलीथिन की पीड़ा,
दर दर की ठोकरें,
और भूख से भरी
लंबी रातें ..

कचरे में रोटी खोजती है
वो एक गाय नहीं रोती
धरती का हृदय रोता है,
मानवता की आत्मा रोती है...

यदि सच में 
उसे “माँ” कहते हो,
तो उसकी रक्षा
नारों से नहीं
अपने हाथों से करो
एक मुट्ठी चारा,
स्वच्छ जल का पात्र,
एक सुरक्षित आश्रय
यही उसकी पूजा होगी
तेरी आत्मा भी तृप्त होगी.....

चलो संकल्प लेते हैं
गाय का उत्थान करेंगे 
केवल शब्दों से नहीं,
संवेदनाओं से होगा;
राजनीति से नहीं,
मानवता से होगा

जब उसकी आँखों में
भूख नहीं संतोष चमकेगा,
तभी तो हमारी सभ्यता 
बची रहेगी
बची रहेगी....


कहानी: पूनम का चाँद




कहानी: पूनम का चाँद

लोकेश की आँखों में आँसू चमक रहे थे.. उसने आकाश की ओर देखा... आज पूनम का चाँद कुछ अलग सा था, संपूर्ण, उजला और निर्विकार जैसे उसे दीन दुनिया से कोई सरोकार न हो. आँगन में दूधिया रोशनी फैल रही थी, मगर लोकेश के भीतर अँधेरा गहराता चला जा रहा था... उसे कुछ सूझ नहीं रहा था. उसकी पत्नी इस दुनियां को अलविदा कह चुकी थी.

अस्पताल की सफ़ेद दीवारें और चादरें उसकी आँखों में चुभ रहीं थीं.. मशीनों की आवाज़, डॉक्टरों की औपचारिक बातें, लापरवाह नर्सिंग स्टाफ, पीला होता उसका चेहरा और उसकी ठंडी होती उसकी हथेली... सब कुछ उसको धीरे धीरे फिल्मी सीन की तरह नज़र आ रहा था... 

उसने महसूस किया ... सफेद चादर में लिपटी उसकी पत्नि मानो कह रही हो...
“लोकेश प्लीज रोना मत, ये मौत किसी की सगी नहीं होती.... क्या पता कब किसका साथ छोड़ दे”  
लोकेश रोया तो नहीं… लेकिन आंसुओं को छिपा भी नहीं पाया... लोग आते गये ... समझाते गये. कुछ मौन रूप से सहानुभूति जताते गये.. कुछ तो ज्ञान भी बांट गये “रोने से कोई फायदा नहीं.. ये समय है... सब ठीक कर देगा.. धैर्य रखना” उन नादानों को क्या मालूम समय क्या जानता है और वो क्या ठीक करेगा.. क्या बीता वक्त लौट के आयेगा???

लोकेश ने फिर चांद की तरफ देखा... रातों का राजा पूनम का चाँद, उसे अब बैरी लगने लगा था... 





कहानी: बिंदी


कहानी : बिंदी

प्रिया को रंग बिरंगी बिंदीयां बहुत पसंद थी.. उसके बैग में बहुत सी बिंदियों के पैकेट हुआ करते थे... उसके माथे पे गोल गोल बिंदी चांद की तरह दिखती थी.. उसे लगता था ये बिंदियां जैसे उसके माथे पर ठहरा हुआ आत्मविश्वास हो. 

जब भी वह आईने के सामने खड़ी होती तो अपने आप से ही पूछने लगती "मैं ठीक तो लग रही हूँ ना ?” और हँस पड़ती..

एक दिन वो चली गई... बहुत दूर... चांद के पास.. पूनम के चांद ने उसे छीन लिया था. उसकी बिंदियों का डिब्बा अब भी अलमारी में रखा हुआ है... उसकी याद के तौर पर... अलग-अलग रंग, अलग-अलग आकार और सबसे ऊपर वही लाल बिंदी जो उसने मिलन की रात लगाई थी. इसे वह सुहाग की निशानी मानती थी... हर करवा चौथ पर इसे ही लगती थी. मानो उसका व्यक्तित्व और चेहरे की सारी पहचान इस बिंदी में सिमट आई हो .... ठीक वैसे ही जैसे रात के आगोश में पूनम का चाँद..

चाँद तो आज भी आता है रोज़ आता है... लेकिन एक बिंदी के बिना उसका श्रृंगार अधूरा है... और मेरी जिंदगी का भी....

प्रकृति


प्राकृति...

ऊपर नीला आसमान
पृथ्वी पर सजी हरियाली 
कल-कल करती नदियाँ
अडिग खड़े पहाड़ 
फूलों की खुशबू 
सुंदर हरे वृक्ष 
डाल पर चिड़ियों चहकी है
कितना सुंदर है
ये प्रकृति का प्यार....


ये जीवन है


ये जीवन है....

ये जीवन
सीधी रेखा तो नहीं,
यह तो एक वृत्त है
जहाँ हर अंत
नई शुरुआत को जन्म देता है...

कभी धूप की तेजी
कभी छाँव की ठंडक
कभी प्रश्नों के गूंजते स्वर
कभी मौन होता है इनका उत्तर...

हम तो यात्री हैं,
समय की राहों पर
सीखते हुए गिरते हैं
गिरकर फिर उठ जाते हैं..


बैरी चांद


चाँद मेरा बैरी ...

ये चाँद 
बैरी है मेरा
तुमको छुपा ले गया
अपनी चांदनी में 
मेरे मन की रोशनी को
सजा ले गया 
अपने आकाश में .....

मैं छत पर खड़ा हूँ
बार बार पूछता हूँ 
इस पूनम के चांद से
क्यों छीना तुमने 
मेरा सांझ सवेरा
वो मुस्कुराता है
चुप हो जाता है,
जैसे मेरे दर्द की
इसको परवाह नहीं.....

हर पूनम की रात
अब तीर सी लगती है,
उजली किरणें भी जलाती हैं
चांद सी चमकती है
तेरे माथे की बिंदी
आँखों में यादें भर जाती हैं.....

ओ बैरी पूनम के चांद
मेरी चांदनी लौटा दे
या फिर मुझे बुला ले...

तुम कहां हो


तुम कहाँ हो प्रिये 
शायद इस सुबह की 
पहली किरण में
जो खिड़की से आकर
मेरे अकेलेपन को छू जाती है?

या फिर 
उस हवा के झोंको में
जो शाम ढले
धीरे से मेरा नाम लेती है?

या फिर 
उस चाँद की शीतलता में
या उन तारों की झिलमिल में
जो हर रात 
मेरी आँखों में उतर आते हैं?

मैं जानता हूँ,
तुम दूर नहीं हो 
मेरी धड़कनों में हो
एक संगीत की तरह...

तुम जहाँ भी हो,
मेरा गीत हो
मेरा संगीत हो
मेरी हर प्रार्थना का 
केंद्र तुम ही तो हो....


Villa no. 20


विला नं. 20 : लॉयंस डेन 
करमा रिजॉर्ट्स, 

मैं शांत खड़ा है 
सुबह की आलसाई धूप में,
जैसे मेरी यादों का
कोई पुराना घर हो
जो अब भी
मेरा नाम पुकारता हो

इनकी खिड़कियों से
हवा नहीं, यादें आती हैं
उनकी हँसी की हल्की गूंज,
जैसे चाय की भाप में 
घुली हुई हो ढेर सारी बातें......

बरामदे की कुर्सी जानती है
कितनी शामें वहाँ 
चाय के साथ निखरती हैं
और ये फूल गवाह है
उन हसीन पलों के...

ऐसा लगता है
ये विला नहीं
एक ठिकाना है
उन पलों का,
जिनको हम कभी 
घर कहा करते थे...


Letter to a daughter


Dear daughter,

When you step into your new home, remember,  you are not leaving one world behind, you are expanding your world.

The first days may feel unfamiliar. New faces, new habits, new expectations. It is natural to feel nervous. Let your heart stay calm. Take your time to understand the rhythm of this house. Every home has its own pulse.

Respect everyone, but never lose respect for yourself. Adjustment is beautiful, but self-respect is essential. You do not have to prove your worth, you already carry it within you.

Speak gently, but speak honestly. If something hurts, don’t bury it in silence. Share your thoughts with your husband; he is your companion now, not just in celebration but in understanding. Build friendship with him ; it will become your strongest shelter.

There may be days when you miss your parents deeply. That does not mean you are weak. It means your heart is pure. Keep calling them, keep loving them. Love multiplies; it does not divide.

Try to learn the little things that matter in your new family ; how they take their tea, what makes them smile, what they avoid speaking about. Small gestures create big warmth.

But also keep your dreams alive. Continue what makes you feel like yourself — reading, working, writing, creating. A happy woman builds a happy home.

Do not rush belonging. Roots grow slowly. Give yourself permission to take time.

And always remember — a home becomes yours not when you enter it, but when you fill it with kindness, patience, and quiet strength.

You are not alone. You are capable. You are enough.

All the best and good luck for your new journey.

With love and blessings. 

🙂🙂

ये लाल रंग


ये लाल रंग.......

ये लाल रंग
एक रंग नहीं,
मेरे धड़कते हुए दिल की 
मौन भाषा है।

सूरज की आभा है,
उनके माथे की बिंदीया है
प्यार का अहसास है
एक गहरा विश्वास है।

लहू है
उनकी यादों का
जीवन के रगों का
बहता है,  
कहता है,
“जीके जीओ… पूरी गति से।” 




कविता : नादान

कविता : नादान 

कौन सी शौहरत पर,
तुझको इतना नाज़ है, 
ए नादान इंसान...

तू तो खुद ही मोहताज है
जिंदगी के अंतिम सफ़र में 
किसी और के कंधों का....

याद रख
शोहरतें भी बदल देती हें 
रिश्तों के मायने ...

कहता है जीके 
ए मुकद्दर किसी को 
इतना भी मशहूर ना कर....
🙂🙂🙂🙂🙂

कविता : शिव



शिव....

रात में 
जब चंद्रमा साधना में लीन होता है,
आकाश
मौन का वस्त्र ओढ़ लेता है
तब कहीं दूर
घंटियों की धीमी ध्वनि में
भगवान महादेव उतरते हैं
मन के एकांत आँगन में.

ना कोई आडंबर है,
ना कोई शब्दों का शोर
बस एक मंत्र,
“ॐ नमः शिवाय”
जो सांसों में घुलकर
अंतर का विष हर लेता है
बेलपत्र सा सरल हो मन,
गंगाजल सा निर्मल हो विचार
तभी समझ आता है,...

शिव मंदिरों में नहीं,
हमारी जागी हुई चेतना में 
निवास करते हैं।
उस रात को
अंधकार भी आरती बन जाता है,
और शून्य में
पूर्णता का अनुभव होता है...

ॐ नमः शिवाय 

शिवरात्रि


महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र त्यौहार है  जो भगवान शिव को समर्पित है. यह प्रतिवर्ष फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है.

शिवरात्रि के दिन भगवान शिव और पार्वती का विवाह हुआ है, ऐसा माना जाता है. एक मान्यता यह भी है कि इसी रात शिवजी ने तांडव नृत्य किया था. कुछ मान्यताओं के अनुसार इसे शिवलिंग के प्रकट होने का दिन भी कहा गया है.

शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, दूध, जल, शहद आदि अर्पित किए जाते हैं. और “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप और रात्रि जागरण भी किया जाता है.

महाशिवरात्रि केवल त्योहार ही नहीं, बल्कि आत्मसंयम और अंतर्मन की शुद्धि का पर्व भी है. यह अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक भी है.

शिवरात्रि का त्यौहार हमें सिखाती है कि मन का विष स्वयं ही पीना होगा, तभी भीतर का नीलकंठ जागेगा.

अपने मन के अहंकार का विसर्जन ही सच्चा अभिषेक है. मौन में ही महादेव का स्वर सुना जा सकता है.

शिव केवल मंदिरों में नहीं, वे हर उस हृदय में हैं जहाँ करुणा, धैर्य और वैराग्य का वास है.

ॐ नमः शिवाय 

कविता : वेलेंटाइन डे


जीके कहता है....

ना गुलाबों की चमक 
ना चॉकलेट का इज़हार 
यह तो मन का पावन उत्सव है
जहाँ समर्पण ही है, असली श्रृंगार....

राधा की पायल की रुनझुन 
कृष्ण की बांसुरी की तान 
प्रेम केवल आकर्षण नहीं
एक भक्ति है सम्मान है....

प्यार तो 
सीता का धैर्य है
राम का संकल्प,
ये बंधन नहीं, 
विश्वास का सूत्र है
जीवन का अटल विश्वास....

प्यार को प्यार ही रहने दो
इसे रिश्तों का नाम ना दो
सिर्फ एक एहसास है
रूह से महसूस करो...
 ❤️
एंजॉय एवरी डे
इंडियन वेलेंटाइन डे 
😀😀😀😀😀

भारतीय वेलेंटाइन डे

भारतीय वेलेंटाइन डे 

जब फरवरी की हवा में ढेरों गुलाबों की सुगंध घुलती है, बाज़ार गुलाबी और लाल रंग से भर जाता हैं.  ढेरों युवा जोड़े हाथों में उपहार लिए दिखाई देते हैं तब मेरे मन में एक प्रश्न उठता है: क्या यह प्रेम प्रदर्शन  गुलाबों और शारीरिक आकर्षण तक सीमित है ?  

भारतीयत परंपरा के हिसाब से प्यार एक एहसास है,  समर्पण है, त्याग है और जीवन में सतत चलने वाली प्रक्रिया है जो इस जनम से लेकर कई जन्मों तक चलती है.

भारतीय संदर्भ में जब हम सीता और राम को स्मरण करते हैं, तो हमें केवल दांपत्य नहीं दिखता; हमें कठिन परिस्थितियों में भी साथ निभाने का साहस दिखाई देता है.  प्रेम वहाँ शब्दों से नहीं, आचरण से प्रकट होता है.  जब राधा और कृष्ण की बांसुरी की तान सुनाई देती है, तो वह केवल मिलन की कथा नहीं होती, वह विरह की अग्नि में तपे हुए प्रेम की अनुभूति होती है. ऐसा प्रेम जो पास रहकर भी दूर हो सकता है, और दूर रहकर भी हृदय में बसा रहता है.

भारतीय संस्कृति में प्रेम का अर्थ “तुम मेरे हो” से अधिक “मैं तुम्हारा हूँ” है क्योंकि यह अधिकार नहीं, स्वीकार है. 
अपेक्षा नहीं, एक विश्वास है.

आज के संदर्भ में वेलेंटाइन डे केवल उपहारों, शारीरिक आकर्षण और तस्वीरों तक सीमित रह गया है क्योंकि यह त्याग के बिना अधूरा है.

प्यार का सही अर्थ तो ये है जब दोनों एक दूसरे को समर्पण और त्याग की भावना से बोले जैसे कि...
“मैं तुम्हारे सुख-दुःख में साथ हूँ,”
“मैं तुम्हारी कमियों को भी अपनाता हूँ,”
“मैं तुम्हारे साथ समय की हर परीक्षा से गुजरूँगा,”
तभी यह प्यार का उत्सव है.

भारतीयता हमें सिखाती है कि प्रेम एक दिन के फूल का आदान प्रदान नहीं है बल्कि जीवन भर की साधना है. इस वेलेंटाइन पर यदि कुछ देना ही है, तो
गुलाब के साथ धैर्य दीजिए,
चॉकलेट के साथ भरोसा दीजिए,
और शब्दों के साथ प्रतिबद्धता दीजिए
क्योंकि भारतीय हृदय जानता है
प्रेम केवल कहा नहीं जाता,
ये तो आत्मा से जिया जाता है, और जन्म जन्मांतर का अटूट बंधन होता है..


रंग कौन भरेगा

रंग कौन भरेगा....

मैं चित्र बनाता हूँ, 
इनमें रंग कौन भरेगा,

जिंदगी कोरे काग़ज़ सी
कुछ यादों की लकीरें 
इन सूखे से लम्हों में 
उमंग कौन भरेगा..

मैंने तो तोड़ दी हैं
तक़दीर की सारी सीमाएँ,
इस बैरंग दुनिया में 
किस्से कौन भरेगा...

यादों की धूल जमी है 
कई बीते बरसों से 
इन फीकी सी यादों में 
तरंग कौन भरेगा।
कौन भरेगा....

🙂🙂🙂🙂🙂🙂

विश्व रेडियो दिवस

विश्व रेडियो दिवस.......

विश्व रेडियो दिवस...

विश्व रेडियो दिवस प्रतिवर्ष 13 फरवरी को मनाया जाता है. यह तारीख वर्ष 1946 में संयुक्त राष्ट्र रेडियो की स्थापना की स्मृति में चुनी गई थी.

एक जमाने में रेडियो को सूचना प्रसार, शिक्षा और संवाद का सशक्त माध्यम माना जाता है. विशेषकर दूरदराज और ग्रामीण क्षेत्रों में यह आज भी सबसे सुलभ और विश्वसनीय संचार माध्यम बना हुआ है.

भारतीय जनता, विविध भारती पर जयमाला, समाचार और नाटकों को एंजॉय करती थी. रेडियो सिलोन से बिनका गीत माला को आज भी याद किया जाता है.

🙂🙂🙂🙂🙂

कहां हो प्रिये

कहां हो प्रिये ??

मैं यहीं हूँ 
तुम्हारे पास प्रिय 
एक जगह नहीं,
तुम्हारे भीतर फैले मौन में.

तुम्हारी सुबह की 
पहली रोशनी में,
जो तुम्हारे मन को 
रोशन करती है..

चलते चलते 
जब तुम थक जाते हो
मैं पेड़ की छांव बन जाती हूं.

रात को
आकाश देखना
मैं पूनम का चांद बन
तुम्हे देखती हूं.

मैं हर पल वहीं हूँ
जब तुम कुछ कहना चाहते हो
होंठ चुप रह जाते हैं
मैं सब समझ जाती हूं.

मैं दूर नहीं हूं
पर सामने भी नहीं
तुम्हारे दिल में रहती हूं 
तुम्हे खबर भी नहीं होती
हर कदम तुम्हे थामे रखती हूं.

प्रिय 
जब भी ढूंढोगे मुझको
अपने दिल में झांकना
मैं हमेशा वहीं रहती हूं...


पधारो म्हारे देश





पधारो म्हारे देश : 
राजस्थानी सांस्कृति की एक झलक

राजस्थान भारत का एक ऐसा राज्य है, जिसकी पहचान उसकी गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत से होती है. यह पावन भूमि वीरों, संतों, लोक कलाओं और परंपराओं की जन्मस्थली रही है. 

राजस्थान के किले, महल, बावड़ियाँ और हवेलियाँ इसकी सांस्कृतिक पहचान के सबसे मजबूत स्तंभ हैं. 

राजस्थान के प्रमुख किले और महल में चित्तौड़गढ़ का किला जो जौहर और बलिदान की परंपरा का प्रतीक है. मेहरानगढ़ का किला, जोधपुर जो विशालता और युद्धकला का अद्भुत उदाहरण है जयपुर का आमेर किला राजपूत और मुगल स्थापत्य का संगम है. जैसलमेर का किला जिसे “सोनार किला”, भी कहते है, आज भी आबाद है. उदयपुर का सिटी पैलेस, राजसी जीवनशैली का प्रतीक है. इनके अलावा बहुत से किले महल अब होटलों में परिवर्तित हो गए हैं.

राजस्थान की प्रसिद्ध बावड़ियाँ जो जल और संरचना का अद्भुत नमूना है जैसे आभानेरी स्थित चाँद बावड़ी .जयपुर स्थित पन्ना मीणा का कुंड, जयपुर के ग्रामीण अंचल में बसी भापुरा बावड़ी, नीमराणा बावड़ी और बूंदी में ढेर सारी बावड़ियां हैं. इसी तरह और भी असंख्य बावड़िया करीब हर जिलों में पाई जाती है. ये राजस्थान की जल-संरक्षण को दर्शाती हैं.

राजस्थान के लोकसंगीत और लोकनृत्य अपने आप में एक अजूबा है जो यहां के जन जीवन के हर सुख-दुख से जुड़ा है. लोकप्रिय संगीत में मुख्यतया मांगणियार दरबारी और लोकगीतों में लंगा समुदाय प्रसिद्धहैं. लोक नृत्य मे घूमर और कालबेलिया प्रसिद्धहैं. कुछ नृत्य लोक कथाओं पर आधारित हैं जैसे कच्छी घोड़ी, चरी और गवरी इत्यादि.

 राजस्थान की वेशभूषा और आभूषण में पुरुष: धोती, अंगरखा, कुर्ता और रंगीन साफा पहनता है. महिलाएँ: घाघरा, चोली और ओढ़नी पहनती हैं. आभूषण में कुंदन, मीनाकारी थेवा कला, नथ, बोरला, पायल और बाजूबंद जो यहाँ के आभूषण सामाजिक स्थिति और परंपरा को दर्शाते हैं.

हस्तकला में राजस्थान काफी आगे है. यहां की हस्तकलाएँ पूरे विश्वभर में प्रसिद्ध हैं जैसे बंधेज और लहरिया (कपड़ों की रंगाई), ब्लू पॉटरी (जयपुर), संगमरमर व पत्थर पर नक्काशी, लकड़ी की नक्काशी और फर्नीचर. चित्रकला में फड़ और पिचवाई चित्रकला प्रसिद्ध है.

राजस्थानी भोजन के प्रमुख व्यंजनो में दाल-बाटी-चूरमा, गट्टे की सब्ज़ी, केर-सांगरी, बाजरे की रोटी और लहसुन की चटनी इत्यादि प्रसिद्द हैं. मिठाइयों में घेवर, मालपुआ और चूरमा के लड्डू पसंद किए जाते हैं.

राजस्थान में मेले और त्योहार यहां की संस्कृति को जीवंत बनाए रखते हैं जैसे यहां के प्रमुख त्योहार हैं , तीज और गणगौर जो माता पार्वती की पूजा से जुड़े हैं. कुछ अन्य प्रसिद्ध मेले हैं जिनमें पुष्कर मेला, मरु महोत्सव और डेज़र्ट फेस्टिवल जैसे कई फेस्टिवलआयोजित होते हैं.

राजस्थान की लोककथाएँ वीरता और नैतिक मूल्यों से भरी हैं जैसे पाबूजी की फड़, ढोला-मारू, मीराबाई के भजन और चारण और भाट परंपरा इत्यादि.

राजस्थान को रंगीला राजस्थान भी कहा जाता है यहां का प्रसिद्ध स्लोगन है “पधारो म्हारे देश” जो केवल वाक्य नहीं, बल्कि राजस्थान का जीवांत जीवन-दर्शन है. यहाँ अतिथि को देवता माना जाता है और सरल जीवनशैली अपनाई जाती है.

निष्कर्ष में हम कह सकते हैं कि राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत केवल भूतकाल की स्मृति नहीं, बल्कि आज भी लोगों के दैनिक जीवन में जीवंत रूप में दिखाई देती है. यह विरासत हमें संघर्ष, सौंदर्य, परंपरा और आत्मसम्मान का संदेश देती है और भारत की विविधता में एक अनमोल रत्न की तरह चमकती है.




पर्यटन: एक अच्छी हॉबी


पर्यटन: एक अच्छा विकल्प

पर्यटन या यात्रा ज्ञान प्राप्ति के लिए एक शानदार हॉबी है. जरूरी नहीं कि यात्रा आपके मनपसंद जगह की हो या किसी धार्मिक स्थल की, हर तरह की यात्राएं आपको ज्ञान, सुकून और भावनात्मक अनुभव ही देंगी. जैसे कई खूबसूरत जगह देखकर या कोई धार्मिक जगह देखकर इंसान का बदल जाना.

यह भी अनुभव किया गया है. कई बार तो शहरी लोगों को पर्यटन से शान्ति का अच्छा अनुभव प्राप्त होता है जैसे पहाड़ों में मोबाइल का चुप होना आपको प्रकृति की समीपता का अहसास दिलाता है. जैसे पहाड़ सिखाते है, दृढ़ होना.  नदी के किनारे बैठकर समझ आता है, धीरे चलना और सतत चलते रहना.

पर्यटन से आपको कई अनजाने अनुभव भी होते हैं. जैसे रेल की खिड़की से दिखते हुए पहाड़, नदियां और नई नई जगहें. नए स्थानों में हम देख पाते हैं उस जगह के लोगों की जिंदगियां, उनके रहन सहन और उनकी संस्कृति.

पर्यटन का मनोविज्ञान पहलू यह भी है, जो लोग अकेले यात्रा करना चाहते हैं, उनका डर कम होता है. कुछ उनके जैसे सहयात्री भी उनका मनोबल बढ़ाते हैं. यात्रा उनको अपने आप को जानने का अवसर भी प्रदान करती है.

यात्रा या पर्यटन के दौरान क्या करें जिससे यात्रा मनोरंजक और ज्ञान देने वाली हो. आओ इस पर विचार करें...

ज्ञात रहे बजट के द्वारा कम पैसों में भी बड़ी यात्रा की जा सकती है.

यात्रा मैं आप जानकारी और ढेर सारी यादों एकत्रित कर सकते हैं.

यात्रा के दौरान आप फोटोग्राफी और स्केचिंग भी कर सकते हैं.

सीनियर सिटीजन धार्मिक यात्रा कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकते है.

नई जगह की संस्कृति वहां के भोजन का आनंद ले सकते हैं

अंत में, मैं ख्वाजा मीर दर्द की प्रसिद्ध शायरी का उल्लेख करना चाहूंगा. उन्होंने लिखा था.
सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल, 
ज़िंदगानी फिर कहाँ 
ज़िंदगानी गर रही तो, 
ये जवानी फिर कहाँ.



ध्यानाकर्षण का मनोविज्ञान

ध्यानाकर्षण का मनोविज्ञान 
Attention Seekers

ध्यानाकर्षण चाहने वाले लोग वो व्यक्ति हैं जो अपनी आदतों से मजबूर या यूं कहो अपनी हरकतों, व्यवहार या बातों से दूसरों का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहते हैं.

मनोविज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो अकसर इनका मकसद दूसरों को नज़रअंदाज़ करके अपनी बात या उपस्थिति को महत्वपूर्ण बनाना होता है.

ध्यानाकर्षण चाहने वाला व्यक्ति केवल “दिखावा” नहीं करता, अक्सर उसके व्यवहार के पीछे उसकी गहरी मानसिक कुंठा होती है. 

इसे मनोविज्ञान की दृष्टि से समझते हैं...

1) ऐसे लोगों को मान्यता और स्वीकार्यता की तीव्र इच्छा या जरूरत होती है,  ऐसे लोग चाहते हैं कि उन्हें देखा सुना और माना जाए. इसका कारण कुछ भी हो सकता है जैसे बचपन में उपेक्षा, तुलना, प्रेम में विफलता या कोई भावनात्मक कमी.

2) आत्मसम्मान की कमी महसूस होना, ऐसे लोगों के अंदर असुरक्षा की भावना पैदा करती है. इन्हें तारीफ़, लाइक्स, प्रशंसा या सहानुभूति मिलती रहनी चाहिए क्योंकि ऐसे लोगों का मन स्थिर नहीं रहता है.

3) इन लोगों में भावनात्मक खालीपन रहता है. ऐसे व्यक्ति खुद से भी जुड़े नहीं होते. इनका ज्यादातर वक्त दूसरों पे निर्भर रहता है ताकि इन्हें केवल ध्यान ओर इंपॉर्टेंस मिले.

4) ऐसे लोगों को तीव्र नियंत्रण की इच्छा होती है. ऐसे लोग अटेंशन के ज़रिए रिश्तों या माहौल पर कंट्रोल करना चाहते हैं. इनका उद्देश्य “मेरी बात सबसे ज़्यादा सुनी जाए”

5) ऐसे लोगों को अपनी पहचान का भी संकट महसूस होता है. कभी ये सोचते हैं “मैं कौन हूँ?” जवाब ना मिलने पर ये अपनी पहचान खुद ही गढ़ने लगते हैं.

6) ऐसे लोग कम व्याहारिक होते हैं. अटेंशन ना मिले तो व्यथित हो जाते है, इनका स्वभाव जिद्दी हो जाता है, उचित अनुचित की इन्हें परवाह नहीं रहती.

7) ऐसे लोगों के साथ और भी समस्याएं होती है जैसे अक्सर सोशल मीडिया में व्यस्त, छोटी छोटी बातों को बड़ा बनाना, दूसरों की बातों को अपने ऊपर ले लेना इत्यादि.

ऐसा नहीं है कि ये एक बीमारी है . यदि यह रिश्तों, काम या मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाने लगे तो यह अस्वस्थ पैटर्न माना जा सकता है और इसका निवारण होना भी जरूरी है.

ऐसे लोगों से अपना व्यवहार नम्र रखें, उन्हें शांत, सीमित और ईमानदारो के साथ अटेंशन दें, इनके ड्रामा को रिवॉर्ड ना दें, व्यवहार की स्पष्ट सीमाएँ तय करें और ज़रूरत पड़े तो सहानुभूति के साथ पेशेवर मदद सुझाएँ . उन्हें ये भी समझाएं कि यह कमजोरी नहीं है एक संकेत है जो यह चाहता है कि इनके भीतर जो चल रहा है उसे सुना जाय.

मेरे विचार से ऐसे लोग आत्म-संवाद बढ़ाएँ, रचनात्मक अभिव्यक्ति (लेखन, कला) को अपनाएं, प्रकृति से जुड़ें, यात्रा करें, अध्ययन करें, स्वस्थ रिश्ते रखें और दूसरों का सम्मान रखे तभी इनको भी सम्मान मिलेगा.


कहानी : मतलबी दुनियां


मतलबी दुनियां 

नीरज के फोन में हज़ारों कॉन्टैक्ट थे, जिनमें उसके रिश्तेदार और बहुत से दोस्त शामिल थे. लेकिन एक बार जब उसे उनकी जरूरत पड़ी सब नदारद थे.

वैसे तो वॉट्सएप ग्रुप पर वह बहुत काम का लड़का कहलाता था... किसी का रेज्यूमे बना देता, किसी का फार्म भर देता, किसी को पढ़ाई में गाइड कर देता और कोई ना की बहाने सभी का कुछ ना कुछ काम कर ही देता था. यानी यूं कहो कि सोशल मीडिया की दुनियां में छाया रहता था.

एक रात जब उसकी नौकरी चली गई, सुबह उसने स्टेटस लगाया
“कुछ दिनों से मुश्किल में हूँ।”

उसके स्टेटस पर व्यूज़ तो बढ़े, लेकिन मैसेज बॉक्स खाली ही रहा. जिसने कल तक कहा था
“भाई तू है तो सब आसान है”
आज वही बोले 
“यार अभी टाइम नहीं है।”

नीरज ने तब समझा, ऑनलाइन दुनिया में लोग डाटा की तरह होते हैं. ज़रूरत हो तो डाउनलोड,काम खत्म तो डिलीट.

उस दिन उसने एक चीज़ बदल ली, नया स्टेटस नहीं लगाया, बस एक नया रास्ता चुना. कम लोगों से बात करने लगा और पर सच्ची लेकिन कम मदद करने लगा,
वो भी बिना लाग लपेट के, निस्वार्थ.

समय के साथ उसके फोन के कॉन्टैक्ट कम हुए, लेकिन ज़िंदगी में शांति बढ़ गई. आज नीरज के पास फॉलोअर्स कम हैं पर जो भी हैं अपने है.

आज उसने एक सबक सीख लिया, आधुनिक मतलबी दुनिया में सबसे बड़ी समझदारी है, खुद को “ऑफलाइन” रखकर सही लोगों से जुड़ना और आगे बढ़ना.


कहानी : अलविदा

अलविदा

“हैलो… बेटा कैसे हो ?”
मां की आवाज में कंपन था
“सुन रहा हूं, जल्दी बोलो मम्मा. मैं अभी मीटिंग में हूं बाद में कॉल करता हूं"
हिमांशु फुसफुसाते हुए बोला
“कुछ नहीं बेटा… बस यूँ ही।”
उसकी मां की आवाज में बेबसी थी
“चलो मम्मा बाद में बात करता हूँ।”
हिमांशु ने तुरंत फोन काट दिया

कुछ घंटे ही बीते थे कि अस्पताल से फोन आया
“आपकी माँ…”
ऑफिस का काम छोड़ हिमांशु दौड़ता हुआ हॉस्पिटल पहुँचा, देखा माँ बेड पर आँखें मूंदे लेटी हुई थी

नर्स ने हिमांशु के हाथ में मोबाइल पकड़ाया और बोली 
“आपकी माता जी ने बस इतना ही कहा
"इसे मेरे बेटे को दे देना”

हिमांशु ने फोन खोला, स्क्रीन पर आख़िरी कॉल चमक रही थी
"Duration : 11 seconds"
हिमांशु को याद आया अभी कुछ समय पहले ही उसकी माँ ने कहा था, 
"कुछ नहीं… बस यूँ ही"
जैसे वो कहना चाह रही हो
“बेटा अब ज़्यादा समय नहीं है”

हिमांशु ने सिसकते हुए फोन को सीने से लगाया. उसको समझ आ गया था कभी कभी ‘बस यूँ ही’ कॉल अलविदा की भी हो सकती है..


मेरा चांद मुझे लौटा दो


मेरा चाँद मुझे लौटा दो

काली स्याह रातों में 
कोई सपनों-सा उतर आया है
मेरे बालकनी की खामोशी में
कोई उजाला भरने आया है...

वही हँसी, 
वही नज़र, 
वही सुकून
उसकी दुआओं का साक्षी 
आज भी चमकता है
वो करवा चौथ का चांद....

सोचता हूं 
किसने छीना होगा 
मेरा पूनम का चमकता चाँद
कोई मेरे हिस्स का 
वो चांद मुझे लौटा दो....


विरह की मधुशाला


विरह की मधुशाला

सूना साकी, 
सूना प्याला, 
सूनी ये महफिल
कोई छीन ले गया
खुशियां मेरी
सज गई मेरी मधुशाला...

मेरे घर में 
कभी छनकती थी चूड़ियां 
मुस्कुराहटें
आज विरह में जलाती है
मेरी मधुशाला.

साँझ ढलती है
बालकनी में मेरे
यादों की लालिमा बिखर आती है
यादों की घटाएँ छा जाती हैं,
सज जाती हैं मधुशाला...

तेरी ही बातें, 
तेरी ही यादें, 
मदिरा बन 
हलक से उतर जाती हैं.
ढूंढें फिर मधुशाला..

कैसे पियूं अमृत
जब आसूं हो हिस्से में 
मैं पीता हूं भर भर जाम
मदहोश कर देती है
मेरी मधुशाला..

मेज पर सजी 
श्रृंगार किए तस्वीर तुम्हारी
चमक रही बिंदिया 
ले लेती है मेरी निंदिया
ढूंढें मन की ज्वाला
कहां है मधुशाला....

हर जाम में 
दिखती है  मूरत तुम्हारी 
फिर क्यों याद आए तुम
यादों, सिसकियों में सजती है
मेरी ये मधुशाला....

वो कहते हैं
ग़म भुलाती है मदिरा
मैं कहता हूं 
यादें गहरी करती है मदिरा
कोई ये तो बताए 
कहां है मेरी मधुशाला..

किस किस को बताऊं 
विरह का नशा 
पल-पल हमें रुलाता है,
तुम क्या जानो बाबू
विरह में ही काम आती है
ये मेरी मधुशाला...

शीतला माता मंदिर



शीतला माता मंदिर, 
चाकसू (राजस्थान) 

प्रसिद्ध शीतला माता जी का मंदिर राजस्थान के जयपुर जिले के चाकसू कस्बे में शील डूंगरी (Sheel ki Dungri) नामक पहाड़ी पर स्थित है.  यह जयपुर शहर से करीब 35 किलोमीटर दूर, टोंक रोड पर स्थित है.


शीतला माता जी का मंदिर एक प्रसिद्ध हिन्दू देवी स्थान है. शीतला माता जी, जो चेचक, खसरा और अन्य महामारी-संबंधित रोगों से रक्षा करने वाली देवी हैं.

पर्यटन की दृष्टि से भी यह जगह बहुत मशहूर है. मंदिर एक पहाड़ी टॉप पर स्थित है जहाँ से सुंदर प्राकृतिक दृश्य, झील और अन्य पहाड़ियां भी दिखाई देती हैं. श्रद्धालु मंदिर सीढ़ियों से या पहाड़ काटकर बनाए रस्ते से जाते हैं.  

एक बार यहाँ सीढ़ियों पर "करण अर्जुन" नाम की फिल्म भी शूट की गई थी.

माता मंदिर 500 साल से भी अधिक पुराना माना जाता है और स्थानीय लोगों की आस्था का मुख्य केंद्र है, यहां साल में एक बार शीतला अष्टमी को मेले का भी आयोजन होता हैं मेले में दूर-दराज से श्रद्धालु आते हैं, माता को ठंडे पकवानों का भोग अर्पित करते हैं और पूरे दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है. 

कहते हैं माता शीतला को प्रसाद अर्पण करने से या प्रसाद खाने से चेचक और अन्य बीमारियों से रक्षा मिलती है.  यहां भक्तों की अन्य मनोकामनाएँ भी पूरी होती हैं. 

यह मंदिर सड़क और रेल मार्ग से जुड़ा हुआ है, रुकने के लिए बहुत सी धर्मशालाएं उपलब्ध हैं जहां रुका जा सकता है.