प्रिय वरिष्ठ नागरिकों
खासकर उनके लिए जिनका जन्म 1960, 1961, 1962, 1963, 1964, 1965, 1966, 1967, 1968, 1969, 1970, 1971, 1972, 1973, 1974, 1975, 1976, 1977, 1978, 1979, 1980 में हुआ है, अर्थात यह वो पीढ़ी है जो अब 45 से ऊपर की ओर बढ़ रही है.
जैसा कि आपको मालूम होगा इस पीढ़ी की सबसे बड़ी सफलता यह है कि इसने ज़िंदगी में बहुत से बड़े बड़े बदलाव देखे और उन्हें आत्मसात भी किया है.
1, 2, 5, 10, 20, 25, 50 पैसे देखने वाली यह पीढ़ी इन पैसों का महत्व समझती थी और बिना झिझक के मेहमानों से पैसे ले भी लिया करती थी.
कलम और स्याही से लेकर पेन पेंसिल तक और उसके बाद आज यह पीढ़ी स्मार्टफोन, लैपटॉप, पीसी को भी बखूबी चला रही है.
जिनके लिए बचपन में साइकिल भी एक विलासिता थी, वही पीढ़ी आज बखूबी स्कूटर, बाइक और कार चला रही है.
ये वो पीढ़ी है जो कभी चंचल तो कभी गंभीर लेकिन संस्कारों में पली है
टेप रिकॉर्डर, पॉकेट ट्रांजिस्टर, ये सब कभी बड़ी कमाई का प्रतीक थे. रेडियो और टीवी के आने से जिनका बचपन बरबाद नहीं हुआ, वही पीढ़ी है ये.
कुकर की रिंग्स से रिंग बॉल और टायर से “गाड़ी–गाड़ी खेलना” इन्हें कभी छोटा नहीं लगता था. कपड़े की गेंद से बहुत खेले हैं.
“सलाई को ज़मीन में गाड़ते जाना” – यह भी उस जमाने का खेल था और मज़ेदार भी.
“कैरी (कच्चे आम) तोड़ना” इनके लिए चोरी नहीं था.
किसी भी वक्त किसी के भी घर की कुंडी खटखटाना गलत नहीं माना जाता था.
“दोस्त की माँ ने खाना खिला दिया” – इसमें कोई उपकार का भाव नहीं, और “उसके पिताजी ने डांटा” तो इसमें कोई ईर्ष्या भी नहीं होती थी.…
घर के पास दोस्तों की या स्कूल मके दोस्तों की बहन को अपनी ही बहन समझा जाता था.
दो दिन अगर कोई दोस्त स्कूल न आया तो स्कूल छूटते ही बस्ता लेकर उसके घर पहुँच जाते थे.
किसी भी दोस्त के पिताजी स्कूल में आ जाएँ तो मित्र कहीं भी खेल रहा हो, दौड़ते हुए जाकर खबर देना:
“तेरे पापा आ गए हैं, चल जल्दी” – यही उस समय की ब्रेकिंग न्यूज़ हुआ करती थी.
मोहल्ले में किसी भी घर में कोई कार्यक्रम हो तो बिना संकोच के काम कर दिया करते थे.
कपिल, सुनील गावस्कर, वेंकट, प्रसन्ना की गेंदबाज़ी देखी, स्टेफी ग्राफ, अगासी का टेनिस देखा, राज, दिलीप, धर्मेंद्र, जितेंद्र, अमिताभ, राजेश खन्ना, आमिर, सलमान, शाहरुख, माधुरी और इन पर फिदा रहना. कापी को गानों और फिल्मी नामों से भर देना.
पैसे मिलाकर भाड़े पर VCR लाकर 4–5 फिल्में एक साथ देखना.
“शिक्षक से पिटना” इसमें कोई बुराई नहीं थी, बस डर यह रहता था कि घरवालों को न पता चले, वरना वहाँ भी पिटाई होगी और शिक्षक से ऊंची आवाज में बात नहीं करने वाली और उनका आदर करना, उन्हें प्रणाम करना.
कॉलेज में छुट्टी हो तो यादों में सपने बुनने वाली पीढ़ी और बिना मोबाइल, SMS, व्हाट्सऐप के रहना, केवल मिलने की आतुर प्रतीक्षा करना.
पंकज उधास की ग़ज़ल “तूने पैसा बहुत कमाया, इस पैसे ने देश छुड़ाया” सुनकर भावुकता से आँखें पोंछना
लिव–इन तो छोड़िए, लव मैरिज भी बहुत बड़ा “डेरिंग” समझना और कॉलेज में लड़कियों से बात करने वाले लड़के भी एडवांस कहलाते थे.
दोस्तों गुज़रे दिन तो नहीं आते, लेकिन यादें हमेशा साथ रहती हैं और उन यादों को सुनहरी यादें समझना.
अपना भी वो ज़माना था जब प्ले स्कूल जैसा कोई कॉन्सेप्ट ही नहीं था बस सीधे 6–7 साल पूरे होते ही सीधे स्कूल भेज दिया जाता था.
पैदल, साइकिल से या बस से भेजने पर चाहे बच्चे अकेले स्कूल जाएँ या दोस्तों के साथ, इससे कोई अनहोनी होगी ऐसा डर माता–पिता को कभी नहीं होता था. उस समय हम दो हमारे दो का कांसेप्ट ही नहीं था.
पास/फेल यही सब चलता था और प्रतिशत (%) से हमारा कोई वास्ता नहीं होता था. उस जमाने में ट्यूशन लगाना शर्मनाक माना जाता था क्योंकि यह कमजोर बच्चों की निशानी होती थी.
किताब में पत्तियाँ और मोरपंख रखकर पढ़ाई में तेज हो जाएँगे यह हमारा दृढ़ विश्वास होता था.
कपड़े की थैली में किताबें रखकर पीठ में लादकर स्कूल जाया करते थे स्कूल की टंकी से पानी पीया करते थे.
हर साल नई कक्षा के लिए किताब कॉपी पर कवर चढ़ाते थे और नई किताबों की खुशबू का आनंद लिया करते थे.
कई बार तो साल के अंत में पुरानी किताबें बेचना और साल के शुरू में नई किताबें खरीदना होता था वो भी बिना शर्म के, पैसे जो बचते थे.
दोस्त की साइकिल के डंडे पर एक बैठता, कैरियर पर दूसरा और इधर उधर घूमन बस यही हमारी मस्ती हुआ करती थी.
स्कूल में सर से पिटाई खाना, धूप में खड़ा होना, अपनी अपनी कक्षाओं की रोल नंबरवाइज सफाई करना. टाट पट्टी पर बैठकर डेस्क पर लिखना और थैला अर्थात बस्ता डेस्क में ही रहना.
घर में स्कूल में, मार खाना तो रोज़मर्रा का हिस्सा होता था और मारने वाला और खाने वाला दोनों ही खुश रहते थे, खाने वाला इसलिए कि “चलो, आज कल से कम पड़ा” मारने वाला इसलिए कि “आज फिर मौका मिला”
नंगे पाँव, लकड़ी की बैट और कपड़े की बॉल से
गली–गली क्रिकेट खेलना वही असली सुख होता था.
उस जमाने में पॉकेट मनी नहीं होता था और जो माता–पिता ने दिया वही बहुत होता था क्योंकि हमारी ज़रूरतें बहुत छोटी थीं जो परिवार पूरा कर देता था.
दिवाली में फ़टाकों और फुलझड़ी की लड़ी खोलकर
फोड़ना और चलाना हमें बिल्कुल भी छोटा नहीं लगता था अगर कोई और पटाखे फोड़ रहा हो तो उसके पीछे–पीछे भाग जाना यही हमारी मौज हुआ करती थी.
हमने कभी अपने माता–पिता से यह नहीं कहा कि
“हम आपसे बहुत प्यार करते हैं” क्योंकि उस जमाने में हमें “I Love You” कहना आता ही नहीं था.
आज हम जीवन में संघर्ष करते हुए इस विशाल दुनिया का एक अहम हिस्सा बने हैं. हम में से कुछ ने बहुत कुछ पाया तो कुछ संतुष्ट रहे.
हम दुनिया के किसी भी कोने में रहें लेकिन सच यह है कि हमने हकीकत में जीया और हकीकत में बड़े हुए. दुनिया देखी और समझी. औपचारिकता और बनावटी दुनिया से से दूर भी रहे.
हमने कभी अपनी किस्मत को दोष नहीं दिया क्योंकि हम मेहनत के सपनों में जीते थे और शायद वही सपने हमें जीने की ताक़त देते हैं. हमारी पीढ़ी ने जितने बदलाव देखे उतने शायद ही कोई और पीढ़ी देखेंगी.
ये हमारा जीवन वर्तमान से कभी तुलना नहीं कर सकता क्योंकि वो दुनियां अलग थी आज की दुनियां से बेहतर थी.
ये तो उस जमाने की बानगी है, इससे ज्यादा बहुत कुछ गुजरा है वो अच्छा भी था या सबक था. लेकिन उन पलों को याद कर आज भी चेहरे पर मुस्कान आ ही जाती है.
मित्रों आप ने और क्या क्या अनुभव किए मुझे बतलाना, अनुभव लिखना और मुझे गाइड भी करना, मैं उन्हें अगले पार्ट में अवश्य शामिल करूंगा.
जय श्री कृष्णा
आपका मित्र
डॉ गणेश