फूलदेई


फूलदेई .....

आज फूलदेई लोकपर्व है, यह उत्तराखंड का एक पारंपरिक लोकपर्व है, जो चैत्र मास की संक्रांति अर्थात मार्च के मध्य में बसंत ऋतु के स्वागत में मनाया जाता है. 

इस लोकपर्व पर बच्चे सुबह-सुबह घर-घर जाकर घर की दहलीजों पर ताजे फूल जैसे बुरांस और प्योंली के फूल रखते हैं, साथ ही सुख-समृद्धि की कामना करते हुए बच्चे गाते हैं:
“फूल देई, छम्मा देई,
दैणी द्वार भर भकार,
ये देली सौं बारंबार नमस्कार" 
जिसके बदले में बच्चों को गुड़, चावल और मिठाई मिलती है.

इस लोक पर्व का सांस्कृतिक महत्व यह है कि यह त्योहार प्रकृति से प्रेम, नई फसल का स्वागत और भाईचारे का संदेश देता है.

फूलदेई लोकपर्व उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने और नई पीढ़ी को पर्यावरण से जोड़ने का एक माध्यम है.

आप सभी को उत्तराखंड के फूलदेई लोकपर्व पर हार्दिक शुभकामनाएं 

आज का दिन मंगलमय हो .


कविता : यादों के दीप


कविता : यादों के दीप

जब सूरज ढलता है
रंग बिखर जाते हैं,
विशाल सूने से आकाश में
और जल जाते हैं
दीप यादों के..

दिखाई देते है
कुछ चेहरे मुस्कुराते हुए,
कुछ आवाज़ें पुकारती हुई,
कुछ रास्ते फिर से बुलाते हुए
जिन पर हम कभी साथ चला करते थे...

ये वक्त है
सब कुछ बदल देता है
या बदला लेता है
ये तो खुदा ही जाने...

सोचता हूं
याद करता हूँ,
उन बीते दिनों की
तो लगता है
ये ज़िंदगी दरअसल
यादों और वादों की
एक लंबी कहानी है
जिसके कुछ पन्ने
खुशियों के,
आँसुओं के,
जुदाई के
हर पन्ने की
अलग कहानी है...

अब तो दिन ढलते ही
यादों के दीप जलता हूँ
ताकि जिंदगी की अंधेरी राहों में
यादों की रोशनी बनी रहे...

कविता : ए लम्हों ज़रा ठहरो

कविता : ए लम्हों जरा ठहरो 

एक बार देखा मैने 
ज़िंदगी को कुछ पल ठहर 
सबको भागते हुए ही देखा 
किसी को सपनों के पीछे
किसी को अपनों के लिए 
किसी को नाम के लिए
किसी को जाम के लिए
किसी को पहचान के लिए....

जब शाम ढली 
यादों ने अलख जगाई
खूबसूरत बीते पलों की याद आई 
सोचने लगा; वो भी एक पल था 
जब बिना वजह मुस्कुराया करते थे
और अब ये पल है 
जब वजह ढूंढने चले हैं हम
मुस्कुराने की ...

वो भी एक जमाना था
ना कोई दौड़ थी,
ना मंज़िल की बेचैनी,
बस चैन ही चैन था
दिल में सुकून था, 
मुहब्बत की बस्ती थी..

ज़िंदगी ने हँस के कहा
"जीके" थोड़ा रुको.. 
अरे सम्हलो जरा
क्योंकि ये वक्त है
किसी के लिए नहीं ठहरा...


कविता : सिवाय तुम्हारे


कविता : सिवा तुम्हारे 

कुछ नहीं बदला
घर भी वही है
बालकनी भी वही है
सिवा तुम्हारे...

वही सुबह है
वही कुर्सियां है
खिड़की से झांकती 
सुबहें भी वही हैं..
सिवा तुम्हारे....

मैं भी वही हूँ
कमरे से दिखता
नजारा भी वही है
सिवा तुम्हारे...

बस बदल गई हैं
कुछ तस्वीरें
हमारे घर में
सिवा तुम्हारे..

तुम्हारी तस्वीरें 
अवशेष हैं उन यादों की
जिन्हें देख देख कर
हम फिर से जी लेते हैं...






कविता : अँधेरों से शिकायत


कविता : अंधेरे से शिकायत 

मुझे शिकायत है
इन अँधेरों से 
चुपके से आते हैं 
सवालों को गहरा कर जाते है
चेहरे के रंग मिटा जाते हैं....

फिर सोचता हूं 
ये अंधेरा 
दुश्मन नहीं है,
एक मौन दर्पण है
अनगिनत सच का,
जिसमें झाँककर
इंसान खोजता है
सत्य की रोशनी......


कहानी : दहेज


कहानी : दहेज 

देश की राजधानी दिल्ली की एक पॉश एरिया की ऊँची इमारत की तीसरी मंज़िल पर रहने वाले राजीव भट्ट हर चीज़ को पैसे से तोलकर अपनी हैसियत दिखाते रहते है. चाहे मामला कार, बंगले, रिश्ते और यहां तक … शादी में भी हैसियत.

उसी शहर में डीडीए के एलआईजी मकान में रहते हैं उमेश बाबू ; एक ईमानदार सरकारी क्लर्क और उनकी बेटी माधवी. माधवी एक पढ़ी-लिखी, आत्मसम्मानी और सपनों से भरी हुई तेजस्वी कन्या है. विवाह के बारे में उसका विचार बहुत ही अच्छा था. उसके अनुसार शादी दो दिलों के विचारों का मिलन है, लेन-देन का नहीं.

राजीव का बेटा अभिनव और माधवी एक ही कॉलेज में पढ़ते थे. अभिनव धनवान और अय्याश किस्म छात्र था, उसका दिल माधवी पर था लेकिन माधवी उसे पसंद नहीं करती थी. अभिन ने अपने दोस्तों से कहा था
"एक ना एक दिन वो माधवी को अपनी रानी बना के मानेगा"

कॉलेज खत्म जो गये बातें बीती जो गयी लेकिन अभिनव इस बात को भुला नहीं था. उसने अपने बाप को अपनी मंसा बताई. बाप ने पैसे का दम और हैसियत के साथ बोला 
"माधवी को तेरे लिए ले आते हैं और दहेज भी मांग लेंगे"
बाप बेटे दोनों हँस रहे थे.

एक दिन राजीव ने अपने बेटे अभिनव के लिए माधवी के पिता उमेश बाबू को रिश्ते के लिए सन्देश भिजवाया. उमेश बाबू को लगा ये रिश्ता तो बहुत बढ़िया है. उन्हें लगा शायद इस रिश्ते से उसको बेटी की किस्मत बदल जाए.

उमेश बाबू के घर पहली ही बैठक में अभिनव के पिता ने मुस्कुराते हुए कहा—
“ देखो उमेश बाबू, हम दहेज वगैरह कुछ नहीं लेते… बस आपसे थोड़ी-सी मदद की उमीद है जैसे इन बच्चों के लिए एक बड़ी कार, 4 बीएचके का फ्लैट और शादी का सारा खर्च."

यह सब सुनकर उमेश बाबू चुप हो गये. इन्होंने क्या सोचा था और क्या हो गया. उनको अपने आप शर्मिंदगी महसूस हुई.

माधवी दरवाजे की ओट से ये सब सुन रही थी, उसे क्रोध भी आया लेकिन उसने शालीनता बनाए रखी और बाहर आकर बोली
“मेरी योग्यता और मेरे संस्कार आपकी दहेज की मांग से ज्यादा मूल्यवान हैं. मुझे यह रिश्ता नापसंद है, आप जा सकते हैं"

अनुभव को यह उम्मीद नहीं थी. उसको ये बात चुभ गई. पहली दफ़ा एक गरीब लड़की ने उसे ना कहा. वो भी एक अमीरजादे लड़के को. उसका ख़ून खौल उठा पर कुछ कर नहीं सकता था. बाप पर भी दहेज की बात पर गुस्सा आया.

कुछ समय बाद माधवी ने एक बड़े निजी स्कूल में नौकरी जॉइन कर ली. वह बच्चों को पढ़ाती और उनको ऊंचे सपनो के साथ उन्हें आत्मसम्मान की रक्षा और बराबरी की भी शिक्षा देती थी.

उसे यह भी मालूम चल चुका था कि अभिनव ने किसी धनवान लड़की से शादी कर ली. भारी दहेज, बड़ी कर, बड़ा घर, आये दिन बड़ी बड़ी पार्टियां और दिखावे की व्यस्त ज़िंदगी.

कुछ ही महीनों में रिश्तों की दरारें आने लगीं. उसकी पत्नी हर समय उस पर रोब जमा के रखती थी अपनी हैसियत उसे जातलाती रहती थी.. अभिनव को अब समझ आ गया था की जहाँ पैसों से सौदा होता है, वहाँ अपनापन, प्यार और रिश्ता नहीं टिकता है.

कई सालों के बाद, माधवी अब स्कूल की प्रिंसिपल बन चुकी थी. उसके स्कूल के वार्षिक समारोह में अभिनव और माधवी का आमना सामना हुआ. अभिनव मंच का सभापति था.  

स्कूल की प्रिंसिपल होने के नाती माधवी का मंच पर भाषण था. नंदिनी नंदिनी बोल रही थी
“दहेज गरीबी की नहीं, हमारे सोच की बीमारी है, हमे अपनी सोच बदलनी चाहिए”
"दहेज एक कोढ़ है जिसके कारण कई लड़कियां अविवाहित रहती हैं या शादी के बाद जला दी जाती है"

माधवी की हर बात उसके दिल पर हथौड़े की तरह पड़ रही थी ओर माधवी बोले जा रही थी. अभिनव सिर झुकाए बैठा था. तालियों की गड़गड़ाहट दूर दूर तक गूंज रही थी...











कहानी : दहेज एक परंपरा



कहानी : दहेज एक परंपरा 

आधुनिकता के दौर में... शादी की बातचीत वीडियो कॉल पर हो रही थी. लैपटॉप की स्क्रीन पर दो दुनिया आमने-सामने बातचीत के लिए तैयार थी..

एक तरफ़.... एसी कमरे में खूबसूरत पेंटिंग से सजी दीवार के सामने, सोफे में धंसे.. ब्रांडेड कपड़ों में सजे बनावटी मुस्कुराहट के साथ धनी परिवार के लोग.

दूसरी तरफ़.. साफ सुथरा छोटा-सा कमरा, दीवार पर राम दरबार का कलेंडर, एक पुरानी सी अलमारी और पिता की आँखों में छिपी घबराहट.

लड़की का नाम था प्रतिज्ञा... एम ए बी एड.. पिता एक मामूली दर्जी...सुई, धागा और ईमानदारी. बस यही थी उनकी पूँजी.

लड़के के पिता ने बात शुरू की
“देखो जी वैसे तो आजकल दहेज कौन लेता है ?”
फिर गला खकार कर हल्की आवाज़ में बोलने लगे...
“बस… शादी के बाद आपकी बेटी को कोई असुविधा ना हो, इसके लिए थोड़ी रकम का इंतज़ाम तो आपको करना ही पड़ेगा”

“कितना?” 
यह सवाल प्रतिज्ञा ने आंखे तरेर कर पूछा तो दोनों तरफ
सन्नाटा सा छा गया.

लड़के वालों ने फिर भी बेशर्मी दिखाते हुए रकम बताई .. 
रकम इतनी थी कि दर्जी के हाथ काँपने लगे... इतनी बड़ी रकम कि सालों मेहनत करूँ तो भी कम पड़ जाए.

प्रगति कैमरे के सामने सीधी बैठी थी, उसने अपने पिता की ओर नहीं देखा क्योंकि वह जानती थी, उनकी आँखों में लाचारी ओर आँसुओं के सिवा कुछ नहीं होगा.

उसने अपने मन को शांत करते हुए कहा 
“आप मेरे पिता की हैसियत की नहीं, मेरी कीमत तय कर रहे हैं”

अब लड़के ने पिता की बात को आगे बढ़ाते हुए बोलने का प्रयास किया..
“देखिये जी, हम तो दहेज की नहीं उन पुरानी परंपरों की बात कर रहे हैं जो सदियों से चली आ रही है…”

लड़के की बात पर प्रगति मुस्कराई और बोली 
“परंपराएँ वही ठीक होती हैं,जो रिश्तों के नाम पर किसी मजबूर की रीढ़ ना तोड़ें” 

दोनों तरफ फिर सन्नाटा छा गया...

लैपटॉप बंद करने से पहले गुस्से वाले लहजे में प्रगति बोलने लगी
"मुझे सुख दुख का साथी चाहिए ना कि दहेज लोभी पति... और वो परिवार भी नहीं चाहिए जो खुद भिखारी हो.... जाइये आप लोग अपना माल कहीं और बेचिए" 

एक गहरे सन्नाटे के साथ वीडियो कॉल वहीं समाप्त हो चुकी थी.... 



कहानी : जैसे को तैसा

कहानी : जैसे को तैसा

राजधानी की एक पॉश कॉलोनी. इसी कॉलोनी में रहते हैं विनय बाबू, एक रिटायर्ड टीचर जिनकी पत्नी का देहांत अभी कुछ माह पहले हो चुका था और बच्चे सभी विदेश रहते हैं... मित्रता पूर्ण व्यवहार शांत स्वभाव, सुबह टहलना, किताबें पढ़ना, पौधों को पानी देना और कभी-कभी मोबाइल पर कविता और कहानी लिखना उनका शौक था.

उनके पड़ोस में एक नालायक लड़का रहता था, नाम था तारा सिंह जो आवारा किस्म का लड़का था. उसके शौक थे... देर रात जोर जोर से लाउड म्यूज़िक बजाना, दारू पार्टियाँ और सोशल मीडिया के लिये रील्स बनाना. और हां सुबह देर तक सोना.

अड़ोसी पड़ोसी बहुत दुखी थे. यही सोचकर चुप हो जाते थे गुंडे के मुंह कौन लगे अगर उल्टा पड़ गया तो, सुना था उसका बाप क्रिमिनल लॉयर है..

लेकिन एक दिन तो हद हो गई। वह रात एक बजे बालकनी में खड़ा तेज़ म्यूजिक के साथ भद्दे गाने गा रहा था. विनय जी को नींद नहीं आ रही थी... वे उठे... तारा सिंग का घर खटखटाया 

“धम… धम… धम…”
तारा सिंह ने दरवाजा खोला और चिल्लाया
"कौन है बे"
 विनय जी को देखते हुए थोड़ा नरम होकर बोला
"जी अंकल"

विनय जी प्यार से बोले 
“बेटा, थोड़ा आवाज़ कम कर लो… मुझे नींद नहीं आ रही है”

तारा सिंह कुटिल मुस्कान मारते हुए बोला
“अंकल, रिलैक्स… ये तो अपुन का लाइफस्टाइल है, आपने भी तो अपने जमाने में धूम मचाई होगी” यह कहते हुए उसने झट से दरवाजा बंद कर दिया.

विनय जी को गुस्सा आया लेकिन पी गए... उन्होंने ठान लिया था ... वो तारा सिंग को सबक जरूर सिखाएंगे..

अगले दिन ही सुबह 4 बजे विनय जी ने भी अपना नया “लाइफस्टाइल” दिखाना शुरू कर दिया... मोबाइल स्पीकर पर भजन और मंत्र पूरे वॉल्यूम पर चला दिए.

"हरे रामा, हरे रामा.. रामा रामा हरे हरे"
“ॐ शांति… शांति… शांति…” 
"गायत्री मंत्र"
चारों ओर गूंजने लगी 

तारा सिंह माथा पीटते हुए उठा.. उसकी आँखें लाल और बाल बिखरे हुए थे...
वह भागकर विनय जी के घरआया 
“अंकल जी.. ये क्या है सुबह-सुबह?... आपने तो मेरी नींद ही खराब कर दी”

विनय जी मुस्कुराए औरबोले
“बेटा… ये भी अपुन का लाइफस्टाइल है।” 
"अंकल प्लीज़ बंद कर दो ना... अब में आगे आपकी बातों को ध्यान में रखूंगा" 
हाथ जोड़ते हुआ तारा बोले जा रहा था
विनय जी ने कहा 
"ठीक है अगर फिर से ये सब होगा तो अपुन भी अपनी लाइफ स्टाइल दिखा देंगा... समझे बच्चू"

उस दिन के बाद मोहल्ले वालों ने चैन की साँस ली .... किसी ने एक दिन विनय जी से पूछा 
"ये अब कैसे शांत हो गया...?"
विनय जी हंसते हुए बोले 
"कभी-कभी नालायक पड़ोसी को समझाने के लिए थोड़ा स्मार्ट पड़ोसी बनना पड़ता है, श्री मान जी”


कहानी: डूबती साँसे


कहानी : डूबती साँसें

बहुत तेज बारिश हो रही थी, ऐसा लगता था, ये बारिश अपने साथ सब कुछ बहा कर ले जाएगी. पुल के किनारे खड़ा राजेश इस तेज रफ्तार से बहते पानी को एकटक देख रहा था. उसके मन में भी उथल पुथल चल रही थी. उसके चेहरे पर उदासी ओर बेचैनी की रेखाएँ साफ नजर आ रही थीं. अभी कुछ दिन पहले उसकी नौकरी चली गई थी. दोस्तों ने भी दूरी बना ली और घर में भी उसकी खामोशी सबको खलने लगी थी.

राजेश पुल से उस बहती हुई नदी को देख रहा था… तेज़ रफ्तार से पानी उफान के साथ बह रहा था. उसे लगा जैसे उसकी जिंदगी की साँसें भी इसी पानी के साथ बह रही हों.  

अपने ही ख्यालों में खोये राजेश को किसी अनजान व्यक्ति की आवाज सुनाई दी
" बचाओ... बचाओ..." 
लगता है कोई मदद के लिए चिल्ला रहा है राजेश ने पीछे मुड़कर देखा, एक बुजुर्ग व्यक्ति पूल के नीचे जाने वाले ढलान पर अटके हुए थे उन्होंने अपने बचाव के लिए पेड़ की जड़ को पकड़ रखा था. और मदद की गुहार लगा रहे थे.. राजेश को देखते हुए बोले..
“बेटा, ज़रा मेरा हाथ पकड़ना, बारिश की वजह से यहां बहुत फिसलन हो रही है"
राजेश ने फुर्ती दिखाई और पूरी ताकत से उस बूढ़े व्यक्ति को ऊपर की ओर खींच लिया था. दोनों हांफने लगे थे.

बुजुर्ग ने धन्यवाद कहा और मुस्कराते हुए बोले 
“बेटा... आज तुमने मेरी डूबती साँसें बचा लीं”
राजेश भी मुस्कुराया लेकिन चुप रहा. इस ताजा घटना ने उसे हिला दिया था. उसे जिंदगी में एक एक पल का महत्व समझ में आ रहा था.

चुप्पी तोड़ते हुए बुजुर्ग व्यक्ति ने धीरे से कहा 
“जानते हो बेटा, जिंदगी भी कभी-कभी हमे इतना थका देती है कि हम खुद को ही डूबता हुआ महसूस करने लगते हैं. पर सच यह है कि जब हम किसी और को बचाते हैं… तो उसी पल हम खुद भी बच जाते हैं”

राजेश की आँखें भर आईं थीं. उसने पहली बार महसूस किया कि उसकी साँसें सच में डूब नहीं रही थीं… 

बारिश अब भी तेज हो रही थी. लेकिन रवि को लगा जैसे अब सबकुछ पहले से ज्यादा बेहतर है… उसकी डूबती साँसें फिर से धीरे-धीरे जिंदा हो रही हैं., एक नई उमीद के साथ...



माल्लेश्वर महादेव

फोटो: शिव मंदिर का बाहरी दृश्य

मालेश्वर महादेव मंदिर...
मालेश्वर महादेव मंदिर, राजस्थान के जयपुर शहर से करीब 40 किमी दूर ऐतिहासिक जगह सामोद के पास महार कलां गाँव में स्थित है. यहां भगवान शिव का प्रसिद्ध और प्राचीन मंदिर है. यह मंदिर अरावली पर्वतमालाआँ के बीच शांत और प्राकृतिक वातावरण में स्थित है. 

फोटो: शिव मंदिर के पास स्थित कुंड 

लोककथा और मान्यताओं के अनुसार.. बहुत समय पहले यह पूरा इलाका घने जंगलों से भरा होता था. आसपास के गाँवों से चरवाहे अपनी गाय-भैंसें चराने यहाँ आया करते थे.. एक दिन उन चरवाहों ने देखा कि एक गाय रोज़ एक ही स्थान पर खड़ी होकर अपने आप दूध गिरा देती है. जब गाँव वालों ने सोचा यह कोई दैविक जगह हो सकती है तो उन्होंने उस स्थान को खोदा तो वहाँ से एक स्वयंभू प्राकृतिक शिवलिंग प्रकट हुआ. लोगों ने इन्हें भगवान शिव का चमत्कार माना और वहीं मंदिर की स्थापना कर दी और फिर धीरे-धीरे यह स्थान मालेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हो गया.

फोटो: अरावली पर्वतमाला की श्रृंखलाएं  और पुराने किले के खंडहर

शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग के बारे में स्थानीय मान्यता है कि वह सूर्य की गति के अनुसार हर छह महीने में अपनी दिशा बदलता है, यानी उत्तरायण और दक्षिणायन के समय उसका झुकाव बदल जाता है. इसी कारण इसे अदभुद और चमत्कारी माना जाता है.

महाशिवरात्रि और सावन के महीने में हजारों श्रद्धालु यहां दर्शन करने आते हैं. उस समय यहाँ एक छोटा सा मेला भी लगता है और पूरा क्षेत्र “हर-हर महादेव” के जयकारों से गूंज उठता है.

मंदिर के पास ही एक पवित्र कुंड है और ठीक सामने एक छोटा सा झरना भी है जो खासकर बरसात और सावन के महीने में ही बहता रहता है. 

फोटो: सामोद  हेरिटेज होटल का प्रवेश द्वार

पर्यटन के हिसाब से यह जगह प्राकृतिक सौंदर्य से घिरी हुई है. यहां कई फिल्मों की शूटिंग भी होती रहती है. फिल्म कारण अर्जुन, कोयला, सोल्जर, बीस साल बाद और मेहंदी जैसी फिल्मों की शूटिंग भी यहीं हुई है. महार कलाँ के आस पास समोद में भी कई घूमने लायक जगह है...

फोटो: मंदिर के पास पुराने महलों के खंडहर

सामोद पैलेस : ऐतिहासिक किला है जो राजपूत शैली के हिसाब से बना है. इसे अब हेरिटेज होटल में परिवर्तित कर दिया गया है. 
सामोद बाग होटल : ऐतिहासिक किले के अंदर  मुगल गार्डन शैली में बना यह होटल विदेशियों की पहली पसंद होता है.
सामोद कस्बा : समोद कस्बे के अंदर आप पुरानी हवेलियों को अपने मूल रूप में देख सकते हैं. 
सामोद किला : पहाड़ी पर बना यह किला अब खंडहर में तब्दील हो चुका है लेकिन यहां से सामोद कस्बे का और अरावली पर्वत मालाओं का अदभुद नजारा देखने को मिलता है.
सामोद में ही नांगल भरड़ा नामक गांव में पहाड़ी के ऊपर वीर हनुमान जी का एक शानदार मंदिर है जहां करीब 1100 सीढ़ियां चढ़कर जाना पड़ता है.
सामोद के पास ही प्रसिद्ध महामाया माताजी का भी एक मंदिर है.
इसके अलावा यहां छोटे छोटे बहुत से मंदिर भी हैं जो स्थानीय लोगों की आस्था के प्रतीक हैं.

जयपुर से करीब होने के कारण और सीकर रोड के नजदीक यह जगह बहुत ही सुंदर है, खासकर सावन और बारिश के समय यह जगह बहुत मनमोहक हो जाती है. पहाड़, हरियाली, झरना और मंदिर का शांत वातावरण मन को प्रफुल्लित कर देता है.

ॐ नमः शिवाय 



लेख : वरिष्ठ नागरिक और हॉबी


वरिष्ठ नागरिक और हॉबी 

अक्सर देखा जाता है कि रिटायरमेंट के बाद इंसान अपने आपको गया गुजरा और नकारा समझने लगता है. लेकिन ऐसा नहीं है. बल्कि ये मान के चलिए की अब आपका स्वर्ण युग  शुरू हो गया है. आप अपनी मर्जी के मालिक है, चाहे जैसे समय व्यतीत करें. ना बॉस की चिक चिक ना ही समय की कमी.

समय व्यतीत करने के लिए क्या करें जिससे व्यस्त भी रहें और मानसिक विकास भी होता रहे.. इसके लिए आपको कोई शौक़ अपनाना पड़ेगा जो आपके मन को शांत रखें, दिमाग को सक्रिय रखें और आनंद भी दें. आइये कुछ सुझाव मेरी तरफ से आपके लिए....

1. डायरी लेखन :  
एक डायरी लीजिए उसमें अपने जीवन के अनुभव, यात्रा अनुभव, आध्यात्मिक अनुभव, विशेष लोगों से मुलाकातें और उनके अनुभव, कोई पुराने किस्से ओर अपने विचार भी लिख सकते हैं.
 
2. कविता, कहानी और लेख रचना : 
अगर आपको लेखन में रुचि है और आप अपनी भावनाएँ कहानी, कविता और लेख के माध्यम से व्यक्त करना चाहते हैं तो छोटी-छोटी कविताएँ, लेख, कहानियां लिखिये, सच में आपको आनंद आएगा.

3.यात्रा करिए:
अब आपके पास समय ही समय है तो क्योँ ना अपनी मनपसंद जगह की यात्रा की जाय. यात्रा मनोरंज के लिए हो या आध्यात्मिक; दोनों ही आपको आनंद की अनुभूति कराएंगी.

4.फोटोग्राफी:
आजकल सबके पास आधुनिक और स्मार्ट फ़ोन है. तो मोबाइल फोटोग्राफी कीजिए. सुबह और शाम का दृश्य, किसी प्राकृतिक जगह का दृश्य, किसी गार्डन के फोटो और कई सुंदर और प्रसिद्ध जगहों के फोटो लीजिये.  इन फोटो को वाटसऐप, फेसबुक और अन्य माध्यम से शेयर कीजिए. सच में आपको बड़ा मजा आएगा.

5. अन्य हॉबी : और भी बहुत सी हॉबी है जो आप अपनी रुचि के हिसाब से अपना सकते है जैसे ...
   ** ड्राइंग और स्केच बनाना
   ** प्रकृति को करीब से देखना महसूस करना
   ** आध्यात्मिक अध्ययन जैसे गीता रामायण
   **  दर्शनशास्त्र का अध्ययन 
   ** ज्वाइन, ऑनलाइन फ्री और पेड कोर्सेज 
   ** ओपन यूनिवर्सिटी से पसंद विषय का अध्ययन
   ** पहेली और दिमागी खेल खेलना

अंत में मेरी एक महत्व्पूर्ण सलाह: 
आप अपना एक ब्लॉग बना सकते हैं, (जैसे अभी आप मेरा ब्लॉग www.gkkidiary.blogspot.com पढ़ रहे हैं.) वो भी फ्री में, जीमेल में एक ईमेल अकाउंट बनाएं फिर www.blogspot.com पर जाकर लॉगिन करें, वेब पेज बनाएं और लिखना शुरू करें.  
विस्तृत जानकारी के लिए या सीखने के लिए गूगल सर्च करें ब्लॉगिंग कोर्स ज्वाइन करे और ब्लॉगर बनकर नाम कमाएँ, अच्छा लिखोगे तो पैसा भी कमा सकते हो.

तो फिर देर किस बात की…......



कहानी: डायरी के पन्ने


कहानी : डायरी के पन्ने

रमा कॉलेज की छुट्टियों में घर आई थी. लेकिन यहां भी वह छुट्टियां बिताने के बजाय मोबाइल, लैपटॉप और असाइनमेंट के बीच हमेशा व्यस्त रहने लगी थी. 

एक दिन अपने कमरे की सफाई करते वक्त उसकी नज़र एक डायरी पर पड़ी. उसने उत्सुकतावश उस डायरी को खोला. उसके पहले पन्ने पर नीली स्याही से लिखा था ...

“प्रिय बेटी रमा 
तुम्हारे लिए"
"जब कभी तुम्हें अकेलापन सताने लगे, 
इस डायरी को खोल कर पढ़ लेना"
"पापा"

रमा अपने पापा की लिखावट पहचानती थी, पापा की लिखावट देखकर उसको रोना आ गया... उसके पापा अब इस दुनिया में नहीं थे और आज उनका लिखा यह छोटा सा नोट उसे रुला गया.. उसने डायरी को ध्यान से खोला, यह कोई प्रसिद्ध किताब और उपन्यास नहीं थी, बल्कि उसके पापा की हस्तलिखित छोटी-छोटी कहानियों, विचारों, अनुभवों और कविताओं का एक संग्रह थी. उसके पापा को डायरी, कहानी और कविता लिखने का बहुत शौक था, जिसे वे पुरानी डायरियों में लिखा करते थे.

रमा ने डायरी में लिखी पहली कहानी पढ़ी. उसे अच्छा लगा कुछ प्रेरणा मिली, उसने अन्य कहानियां भी पढ़ने की सोची.... उसने देखा हर कहानी में एक संदेश होता था जैसे संघर्ष से कभी डरना नहीं, असफलता से कभी हार ना मानकर बल्कि उससे सीखना और रिश्तों को समय जरूर देना. 

एक कहानी में उसके पापा ने लिखा था ....
“जब रास्ते धूल भरे हों, तो हिम्मत ना हारना.. खुद पर भरोसा रखना”
दूसरी में लिखा था
“सफलता का अर्थ केवल पैसा नहीं होता, मन की शांति भी जरूरी होती है”
तीसरी में लिखा था
"इंसान को पढ़ते लिखते रहना चाहिए़, इससे आत्मविश्वास बढ़ता है"
डायरी के अन्य पृष्ठों को पलटते और पढ़ते रमा की आँखें नम हो जाती थीं. उसे बचपन के दिन याद आने लगे जब उसके पापा हर रात सोने से पहले उसको कहानीयां सुनाया करते थे... तब उसे लगता था कि ये कहानियां सिर्फ मन बहलाने के लिए उसे सुनाया करते थे. लेकिन उसने आज ये महसूस किया की ये कहानियां नहीं हैं बल्कि जीवन को बेहतर ढंग से जीने के तरीके थे...

उस रात रमा ने असाइनमेंट, मोबाइल, टैब और लैपटॉप सब साइड में रख दिए और पूरी डायरी एक ही रात में पढ़ डाली... उसे ऐसा लगा जैसे उसके पापा उसके सामने बैठे हों और हर शब्द मुस्कुराते हुए उसे समझा रहे हो...

डायरी से रमा बहुत प्रभावित हुई ... उसने निर्णय लिया वह किताब लिखेगी जिसमें वो अपने अनुभवों को, अपनी भावनाओं को और अपने विचारों को कहानी या कविता के रूम में प्रस्तुत करेगी... वह चाहती है कि उसकी कहानियां सबके लिए मार्गदर्शक बने जैसे उसके पापा की लिखीं कहानियां..

रमा के हाथ में एक नई कलम और कुछ सफेद कागज थे ... उसकी जिंदगी में एक नया अध्याय जो शुरू हो चुका था...






कहानी: दहेज

कहानी : दहेज

रमा तीन भाई बहिनों में सबसे बड़ी थी... गृह कार्य में दक्ष और पढ़ाई में अव्वल... सिलाई कढ़ाई करके अपना पढ़ाई का खर्चा भी निकाल लेती थी.

आज रमा को देखने लड़के वाले आए है.  घर साफ़ और सलीके से रखा था जो गरीबी छुपाने एक प्रयास  था. चाय साधारण थी साथ में कुछ बिस्किट्स शालीनता से रखे हुए थे.

लड़के बालों ने घर में इधर उधर नजर घुमाई फिर रमा की तरफ देखा, उससे घर परिवार और पढ़ाई लिखाई के बारे में पूछा. जो सब सामान्य बातचीत का हिस्सा था.

इधर उधर की बातों को विराम देते हुए... लड़के के पिता ने गला साफ करते हुए कहा
“देखिए वर्मा जी आजकल खर्चे बहुत बढ़ गए हैं...  मैं जानना चाहता हूँ कि शादी थोड़ा अच्छी हो जाय... तो आपने कुछ खर्च का सोचा होगा मेरा मतलब आजकल के चलन के अनुसार लेनदेन के रिवाज के बारे में”
लड़के का बाप अप्रत्यक्ष तरीके से दहेज की बात कर रहा था. रमा की मां उनकी मंशा समझ गई थी.. पिता भी निरुत्तर हो गए थे. एक चुप्पी सी छाई हुई थी.

दरवाजे की पीछे रमा ये सब सुन रही थी ओर समझ भी रही थी.. बिना समय गंवाए हाथ में खर्चों की फाइल लेकर आई और उसने लड़के वालों के सामने फाइल रख कर बोली...
"ये है हमारे लालन पालन और पढ़ाई का खर्चों की फाइल, हमने ज़िंदगी का हर खर्च खुद उठाया है और हम ये नहीं चाहती कि कोई हमारा खर्चा उठाए... मैं अपने माता पिता पर बोझ नहीं हूं... उनकी जिम्मेदार संतान हूं... मैं यह भी नहीं चाहती ... मेरे माता पिता मेरी शादी कोई तकलीफ उठाकर करें"

कमरे सन्नाटा सा छा गया... लड़के वाले निरुत्तर हो गए थे... उन्होंने जाना ही बेहतर समझा... चाय प्याले में अब भी वैसी की वैसी राखी थी... लड़के के पिता ने वर्मा जी से बिना नजरें मिलाए कहा
"जी अब हम चलते हैं"

लड़के वालों के जाने के बाद रमा के माता पिता अपने आप को कोस रहे थे... अपनी गरीबी को कोस रहे थे... रमा की शादी फिर तय होते होते रह गई.

रमा को दहेज के नाम से घिन होने लगी थी... उसने कुछ करने की ठानी... रमा को पढ़ाई में अव्वल आने की वजह से वजीफा मिलना तय हुआ...

रमा अब शहर आ गई थी...  वो अब पीछे मुड़कर नहीं देखेगी... माता पिता का नाम रोशन करेगी... जीवन पथ पर  आगे बढ़ेगी और अपने सपनो को साकार जरूर करेगी...

होली पर शायरी


होली पर शायरी....

आज रंग चढ़ा है
या नशे का कमाल है
पीने वालों की महफिल में 
हर दोस्त बेमिसाल है
भर भर के जाम पियो 
और जम के उड़ाओ गुलाल....
😃😃😃😄😄😄😄😄😄😄😄😄

ना कम पियो, 
ना ज्यादा मेरे दोस्तों 
रंगीन होली है 
तो रंग भी रहे, 
ढंग भी रहे,
खुमारी भी बनी रहे 
और याद रहे बरसों 
ये होली का त्यौहार...
😃😃😃😃😃😃😃😃😃😃😃😃

रंग-ओ-नूर से सजी है 
ये महफिल-ए-बहार,
जाम-से इश्क़ है 
होली से खुमार
निगाहों में शरारत
और लबों पे मुस्कुराहट है...
😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄😄

आज साक़ी ने भर दिया है
सोमरस से जो जाम-ए-रंगीन,
महफ़िल हो गई है गुलज़ार
आज को फिजा भी रंगीन है
रंगों से हो गया है प्यार....
😃😃😃😃😃😃😃😃😃😃😃😃

रंगों की जवानी, 
मय की कहानी,
हर जाम में सजी है
होली के 
जश्न की निशानी...
😄😄😄😄😄😄😄😄😄😜😄😄

ना इसकी अदा में कमी, 
ना खुमारी में खलल,
होली का मौसम है
बहते जज्बात हैं
बन गई कोई गजल है..
😃😃😃😃😃😂😂😂😂😂😂😂

जब प्रेम रंग मिला मय में 
तो अजब रंग पैदा हुआ,
जैसे हर दर्द की दवा 
खनकता जाम हुआ...
😄😄🤣🤣🤣🤣😃😃😃😃😃😃

एक गजल है..
दिल ने किया है याद 
आज उनको इस होली में,
वो तो चले गए रूह बनके 
उनका रब से हो गया 
सीधा सरोकार होली में...
जब से चढ़ा है 
उनसे इश्क़ का रंग दिल पर,
धुलने लगे हैं दिल के ज़ख्म 
हो गया ईश्क रंगों से इस होली में....
साक़ी भी तू है
मय भी तू, 
पैमाना भी तू ही है,
मैं क्या हूँ ए रब तुझसे
देखा है तेरा ही किरदार 
इस होली में...
रंगों में ढूँढता था 
जिसे मैं बरसों से
ए रब तू मिला भी तो कहां
इस कदर होली में....
वही नूर है तेरा ए रब 
बस गया है तू 
जलवा-ए-यार बनके मेरे दिल में 
करता हूं हर इकरार इस होली में...
एक “गणेश” जो डूबा 
तेरे ही दरिया में, ए रब 
तन्हा ना रहा अब मैं 
सजा है तेरा दरबार होली में....
😄😄😄☺️☺️☺️☺️☺️☺️☺️☺️☺️☺️

होली आई
रंगों का मौसम आया, 
दिल अपना बे-रंग रहा,
तेरे बिना हर जश्न 
अधूरा ही रहा...
लोगों ने उड़ाई गुलाल
मैने तन्हाई में 
तेरा ही नाम लिया....
ये होली 
इस बार भी
मेरे लिए कुछ खास नहीं
जिसको रंग लगाना था
वो अब पास नहीं.....
😃😃🙂🙂🙂🙂🙂😃😃😃😃😃




कविता : होली


कविता : होली 

मैं नहीं मानता होली
रूठे रहते हैं, मुझसे रंग
लोगों रखते हैं, अपने हाथों में अबीर 
मैं रखता हूं, जाम, अपने हाथों में ...

बहुत बेरहम है, ये पूनम की रात 
मुझ पर चाँद हंसता है 
तेरी सूरत दिखती है,
हर घूँट तेरा नाम लेती है...

लोग कहते हैं
होली मिलन का त्यौहार है,
माफ़ करना, 
ये मैं नहीं कहता ....

क्योंकि चांदनी फैली है 
सबके आंगन में 
क्यों मेरी रात बस तन्हाई है?????...

लेख : होली के रंग


होली के रंग 

होली तो हर साल आती है और आती ही रहेगी. हर होली पर कुछ बिछुड़ेंगे और कुछ नए मिलेंगे. हमारी जिंदगी में कुछ होलियाँ तारीख़ ही नहीं, एक याद बन जाती है. होली के रंग तो शरीर से उतर जाते हैं लेकिन कुछ रंग हमारी आत्मा रंगीन कर जाते हैं.

होली सिर्फ एक सामाजिक उत्सव नहीं, यह एक अवसर है ....
रूठों को मनाने का,
पुरानी शिकायतों को मिटाने का,
और उन लोगों को याद करने का जो अब साथ नहीं, पर हर रंग में मौजूद हैं

जहां तक रंगों की बात है. कुछ रंग हमे हर वक्त याद रहते हैं.....
लाल रंग शादी की याद दिलाता है,
हरा रंग हरे भरे खलियानों की याद दिलाता है.
पीला रंग आध्यात्मिक रंग है, ईश्वर से मिलाता है
और नीला.... वो आसमानी रंग है, जिसके नीचे हमने जीवन का हर क्षण बिताते हैं.

आज भी होली हमें फिर से बच्चा बना देती है, हमारी एक मुट्ठी गुलाल में छिपी होती है मासूमियत और गले मिलने में छिपी होती है माफी.

इस बार जब भी रंग लगाएँ, तो सिर्फ चेहरे पर नहीं, लोगों के दिलों पर भी लगाइए क्योंकि सच्ची होली वही होती है, जहाँ रंगों से ज्यादा आत्मीय भावनाएँ गहरी हो जाती हैं.




कहानी: पूनम का चांद


कहानी : पूनम का चांद

निशा की मृत्यु उसी दिन हुई थी, जब पूनम का चाँद अपने पूरे यौवन पर था.. खुली हुई खिड़की से झांकती चाँदनी उसे अपने साथ ले जा रही थी.

नितेश को पहली बार ये पूनम का चांद और उसकी चांदनी बैरी नजर आ रहे थे. उसे लगा इसी उजले चांद ने उसके साथ छल किया है... यही निशा को उससे छीन के ले गया है...

नितेश वक्त काट रहा था, उसके दोस्त लोग समझते रहते थे 
"निशा की मृत्यु दुखद है लेकिन किया क्या जा सकता है ये समय का चक्र है और ये समय ही एक दिन सब ठीक कर देगा" 
लेकिन नितेश आज भी यही सोचता है.. ये समय कुछ भी ठीक नहीं करता है...

हर महीने जब भी पूर्णिमा आती है, नितेश रात को घर के बाहर ही नहीं निकलता बल्कि घर की खिड़कियाँ और दरवाजे सब बंद कर देता, चांद और चाँदनी को अपना दुश्मन मानने लगा था.

उसने नदी किनारे जाना छोड़ दिया, बरगद के पेड़ के नीचे बैठना छोड़ दिया और उस पहाड़ी मंदिर के पास जाना छोड़ दिया जहां वो पहली बार निशा से मिला था...

उसे बस इंतजार रहता था... पर किसका ये उसको खुद को भी नहीं मालूम. निशा का भी नहीं जो उसको इन चांदनी रातों में, नदी के किनारे पुकारा करती थी.. 

निशा को गए  पूरा एक साल हो गया... आज उसकी  पहली बरसी थी... नितेश देख रहा था.. वही पूनम का चांद आज भी पूरे यौवन के साथ चमक रहा है.... 

नितेश कहने को तो आडंबर रहित एक आधुनिक व्यक्ति है फिर भी वह जमाने के साथ चलता है. वह आत्मा और पुनर्जन्म जैसी विचारधाराओं में विश्वास रखता है..

नितेश पानी में पैर डाले बैठा था... चांद का प्रतिबिंब पानी पर साफ और सुंदर दिखाई दे रहा था... पूरे एक साल के बाद  आज वह चांद को फिर से निहार रहा था... मानो कह रहा हो 
“ओ चांद तुम जीत गए हो और मैं हार गया” उसकी आंखों में अब निशा का इंतजार भी खत्म होता सा प्रतीत हो रहा था... यहां तक कि वह अपने अकेलेपन से भी घबरा रहा था. उसके आंसू भी सूख चुके थे.. उसने चांद की तरफ देखा और भावनाओं में बहकते हुए कहने लगा
"ए चांद तुम निशा को तो ले गए हो ... अब उसका ध्यान तुम ही रखना" यह कहते हुए वो जोर जोर से रोने लगा.. 

उसे लगा, प्रेम कभी मरता नहीं है, बस अधूरा रह जाता है और ये अधूरापन ही उसका बैरी है.. इसमें इस बिचारे चांद का क्या दोष..

नितेश अब चाँद की चांदनी में निशा को ढूंढने लगा था... उसे लगने लगा निशा चांद में समा गई है और उसकी चांदनी प्यार बन कर बरस रही है.. 

अब नितेश के लिए चांद बैरी नहीं रहा.. उसने फिर से चांद की तरफ देखा और लड़खड़ाते कदमों से घर की ओर जाने लगा.....



कविता : रंगों का त्यौहार


कविता : होली का उत्सव

रंगों की बौछार 
उमंगों का त्यौहार 
चेहरे पर हँसी का हार 
गुलाल की खुशबू से
महका है घर द्वार...

लाल से अनुराग
हरे से विश्वास
पीला सपनों का संसार 
नीला अम्बर से झांके 
रंगों का सजा है दरबार..

रूठे मन भी 
गले मिल जाते,
हार जाता है अहंकार 
रंगों का खेल ही नहीं होली
ये उत्सव है जीवन का 
जो बांटे प्यार ही प्यार...


ताजा सुबह


ताजा सुबह...

ये सुहानी सुबह
खिड़की से झांकता उजाला
एक नई उम्मीद की
रौशनी बिखर रही है

तुम भी
हँसी बिखेर दो,
सुकून अपना लो,
हर पल अपने नाम कर लो 
जीवन के मधुर संगीत का
आनंद भी लीजिए...

जो बीत गया 
उसे उसे भूल जाओ
जो आने वाला है 
उसका स्वागत करो
याद रखो 
हर क्षण खास है.....

☺️☺️☺️☺️☺️☺️

कहानी: संगम


कहानी : संगम 


शाम ढलने लगी थी ... गहरी सुनहरी किरणें राणा प्रताप सागर की बहती जलधारा की सतह पर बिखर रही थी.. दोनो का मिलन, ऐसा लगता था जैसे शाम को दो प्रेमी मिल रहे हों... और जल की मधुर आवाज जैसे कोई गीत गुनगुना रहा हो..

सागर किनारे खड़ा नीलेश ये नजारा देख रहा था... ऊंचे ऊंचे पर्वत... दूर दूर फैला सागर का शांत जल, जिसमें दिखाई देती थीं पहाड़ियों की परछाइयाँ और कहीं दूर ढलता हुआ सुनहरी सूरज. 

ऐसे में किसी ने पुकारा
"हेलो नीलेश" 
नीलेश एक क्षण चौंका फिर पलट कर बोला
"ओ हाय नीलम"
दोनों ने एक दूसरे को देखा और मुस्कुराने लगे.
"आप बोर तो नहीं हो रहे थे" नीलम ने नीलेश के चेहरे के भावों को पढ़ते हुए कहा..
"नहीं तो मैं तो इन सुंदर नज़ारों का आनंद ले रहा था"
नीलेश ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया.

ये दोनों की पहली मुलाकात थी. दोनों के मन में असंख्य प्रश्न थे. दोनों के दिल धड़क भी रहे थे.
"बहुत सुंदर जगह है" नीलेश ने चुप्पी तोड़ी.
"मै अक्सर यहां आती रहती हूँ.. मुझे यहां ढलता हुआ सूरज देखना बहुत अच्छा लगता है" नीलम ने अपने मन की बात कह दी.
"चलो वहां उस पत्थर पर बैठते है" नीलेश ने आग्रह किया तो नीलम ने उसे स्वीकार कर लिया.

शादी डॉट कॉम के जरिये ये उन दोनों की पहली मुलाकात थी... शाम अब गहराने लगी थी...  दोनों के लिये अब ये शाम रोमांटिक होती जा रही थी... थोड़ी देर में दोनों ने अपने अपने विचारों का आदान प्रदान किया... ढेर सारी बातें हुई... शंकाओं का समाधान हुआ... भविष्य की बाते हुई... कुछ काम की बाते भी हुई... और फ़िर उनकी ये बातें कब प्यार में बदल गई.
"मुझे तुम पसंद हो, क्या मैं तुम्हें ?? " 
नीलेश ने रोमांटिक होते हुए पूछा 
"हां" 
इतना बोलते ही नीलम शरमा गई, उसके गाल शरम से लाल हो गये थे.

नीलेश ने नीलिमा का हाथ पकड़ा और गाने लगा
“चाँद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था… हां तुम बिल्कुल वैसी हो जैसा मैने सोचा था"

दोनों एक दूसरे का हाथ थामे... सागर किनारे किनारे चलने लगे... नीचे अथाह जल ... ऊपर अनंत आकाश...   इनके बीच ये दो अंजान अपना छोटा-सा संसार रच रहे थे...  बातचीत साधारण थी पर हर शब्द में एक नई शुरुआत की स्वीकारोक्ति थी.

सूरज अब पूरी तरह ढल चुका था...  आकाश में असंख्य तारे उतर आये थे... हल्की चाँदनी भी उतर आई थी... नीलेश का गया गीत सार्थक हो रहा था. 
दोनों वापसी की तैयारी में थे. दोनों जाना नहीं चाह रहे थे. अब कोई औपचारिकता भी नहीं थी,  एक नए बंधन की तैयारी थी. 
नीलेश ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा
"नीलू चलते हैं... जल्दी ही .. फिर मिलेंगे" 
"हां नीलेश" 
कहते हुए नीलम धीरे धीरे घर की तरफ मुड़ने लगी... बिछुड़ने का ग़म दोनों को ही हो रहा था.
उस दिन राणा प्रताप सागर के जल में उनका प्रतिबिंब एक संगम बन गया था..

 

जिंदगी : एक खुली किताब


जिंदगी : एक खुली किताब 

हमारी जिंदगी एक खुली किताब है. हर सुबह एक नया पन्ना हमारे सामने खुलता है. ये पन्ने कुछ सुनहरे अक्षरों से लिखे होते हैं, जिनमें खुशियां, उपलब्धियां और प्रेम की कहानियाँ दर्ज होती हैं. लेकिन वहीं कुछ पन्नों पर धुंधले शब्द होते हैं, संघर्ष, असफलता और इंतजार के. देखा जाय तो जिंदगी में सब तरह के पन्ने होने चाहिए़ क्योंकि यही पन्ने हमारी जिंदगी की कहानी को पूर्ण बनाते हैं.

इस जिंदगी वाली किताब की सबसे रोचक बात यह है कि इसके लेखक भी हम हैं और पाठक भी हम ही हैं. हमारे निर्णय, हमारी सोच, हमारे कर्म , यही इस कहानी की स्याही हैं. अगर हम शिकायत की भाषा चुनते हैं तो पन्ने भारी हो जाते हैं; यदि हम आशा और सकारात्मकता की कलम उठाते हैं तो यही पन्ने हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाते हैं.

जिंदगी में, कभी-कभी हम पुराने पन्नों में अटक जाते हैं. बीती हुई गलतियाँ, टूटे रिश्ते, अधूरे सपने, ये सब हमें पीछे की ओर खींचते हैं. लेकिन किताब की खूबसूरती इसी में है कि हर अध्याय के बाद नया अध्याय आता है. कोई भी पन्ना अंतिम नहीं होता, जब तक हम खुद उसे अंतिम ना मान लें.

हमारे जीवन की इस खुली किताब के कुछ पन्ने हम स्वयं लिखते हैं, और कुछ परिस्थितियाँ हमारे लिए लिख देती हैं. परंतु शीर्षक और निष्कर्ष हमेशा हमारे हाथ में ही होते हैं. यदि हम धैर्य, विश्वास और कर्म को आधार बनाएं, तो यह किताब प्रेरणा की एक गाथा बन सकती है.

जिंदगी को पढ़ने से अधिक उसे समझना और महसूस करना बहुत जरूरी है. हर अनुभव एक सीख है, हर मुलाकात एक नए विचार को जन्म देती है और हर संघर्ष एक नया अध्याय लिख देती है. 

आओ कलम को थामे रखते हैं, जिंदगी के पन्नों को किस्से कहानियों से रंगने के लिए....

Poem: Until I hold you again


Until I Hold You Again

You know 
My home is quiet now…
but your silence 
is the loudest sound.

Your beautiful face, 
your lovely smile,
the way you called my name
"Gee kay"
they linger still in the air.

Every morning 
I still speak to you
Every night 
I feel you with me.

People say time heals
but time only teaches me
how much of my heart
went with you.

Oh My love 
Wait for me 
beyond the stars,
When the journey ends,
I will find you again…


शिव क्या हैं ?


शिव क्या हैं ?
“शिव” शब्द का अर्थ है ;  कल्याण, मंगल, शुभता. 
इस दृष्टि से शिव कोई देवता मात्र नहीं हैं, बल्कि अस्तित्व का परम कल्याणकारी सिद्धांत हैं. भारतीय दर्शन में शिव को परम चेतना (Pure Consciousness) माना गया है.  शिव पुराण और लिंग पुराण में शिव को सृष्टि के मूल कारण के रूप में वर्णित किया गया है. चेतना और ऊर्जा का अद्वैत मिलन ही सृष्टि है.

पुराणों के अनुसार शिव को त्रिदेवों में “संहारकर्ता” कहा गया है, परंतु यह संहार विनाश नहीं, बल्कि रूपांतरण (Transformation) है.
त्रिदेव की अवधारणा में:
ब्रह्मा – सृष्टि
विष्णु – पालन
शिव – संहार और परिवर्तन
शिव का तांडव नृत्य सृष्टि और प्रलय की लयात्मक गति का प्रतीक है.

शिव जी के प्रतीक चिन्ह है...
त्रिनेत्र → भूत, वर्तमान, भविष्य का बोध
नीलकंठ → विष धारण कर भी संतुलन रखना
जटा से बहती गंगा → ज्ञान की धारा
चंद्रमा → मन और शीतलता
डमरू → सृष्टि की आद्य ध्वनि (स्पंदन सिद्धांत)
शिवलिंग → निराकार ब्रह्म का प्रतीक

उपनिषदों में शिव को ब्रह्म का ही एक नाम माना गया है. ईशोपनिषद की भावना के अनुसार , सब कुछ उसी एक चेतना से व्याप्त है. अर्थात शिव कोई बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि:“जो भीतर साक्षी है, वही शिव है।”

योग परंपरा में शिव को “आदियोगी” कहा जाता है अर्थात प्रथम योगी. वे ध्यान, समाधि और तंत्र के मूल प्रवर्तक माने जाते हैं.

शिव केवल एक देवता नहीं  हैं 
वे शून्य भी हैं और पूर्ण भी,
वे विनाश भी हैं और सृजन भी,
वे मौन भी हैं और नाद भी

ॐ नमः शिवाय 

गायत्री माता और मंत्र


माता गायत्री और गायत्री मंत्र
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में गायत्री माता को वेदों की जननी और ज्ञान की अधिष्ठात्री शक्ति माना गया है. माता गायत्री,  केवल एक देवी स्वरूप नहीं हैं, बल्कि प्रकाश, चेतना और विवेक की प्रतीक भी हैं.

गायत्री माता का स्वरूप
धार्मिक ग्रंथों में देवी गायत्री को पाँच मुख और दस भुजाओं वाली दिव्य शक्ति के रूप में चित्रित किया गया है. माता के पाँच मुख पाँच प्राण और पाँच तत्वों का प्रतीक माने जाते हैं. उनका संबंध विशेष रूप से ऋग्वेद से बताया जाता है, जहाँ गायत्री छंद में अनेक ऋचाएँ रची गई हैं. 

गायत्री मंत्र
गायत्री मंत्र को वेदों का सार कहा गया है। यह मंत्र ऋग्वेद  के मंडल 3, सूक्त 62, मंत्र 10 से प्राप्त हुआ है.

ॐ भूर्भुवः स्वः
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्.........
अर्थात 
ॐ – परम ब्रह्म का प्रतीक
भूः, भुवः, स्वः – तीन लोक (पृथ्वी, अंतरिक्ष, स्वर्ग)
तत् सवितुः – उस परम दिव्य प्रकाश (सूर्य स्वरूप) का
वरेण्यं – जो वरण करने योग्य है
भर्गः – पाप और अज्ञान का नाश करने वाला तेज
धीमहि – हम ध्यान करते हैं
धियो यो नः प्रचोदयात् – वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे.

विभिन्न दृष्टिकोण
गायत्री मंत्र में “सविता” शब्द सूर्य देव के लिए प्रयुक्त हुआ है.सूर्य यहाँ  प्रकाश का प्रतीक है. आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार, नियमित मंत्र-जप से:
     1. मन की एकाग्रता बढ़ती है
     2. तनाव कम होता है
     3. सकारात्मक विचारों का विकास होता है
     4. न्यूरोलॉजिकल स्थिरता में सुधार देखा गया है
         यह प्रभाव ध्वनि-तरंगों, लयबद्ध श्वसन और             ध्यान की अवस्था के कारण होता है.

आध्यात्मिक महत्व
गायत्री मंत्र को “वेदमाता” कहा जाता है क्योंकि यह आत्म-शुद्धि और चेतना-विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। अनेक संतों और विचारकों ने इसे सार्वभौमिक प्रार्थना बताया है. पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने गायत्री साधना को युग-परिवर्तन की आधारशिला माना है.

हम कह सकते हैं  कि गायत्री मंत्र वस्तुतः बुद्धि-प्रकाश और विवेक-जागरण की एक प्रार्थना है. यह मंत्र एक सार्वभौमिक प्रार्थना है , न किसी जाति की, न किसी पंथ की... यह मनुष्य की बुद्धि को प्रकाशमान करने की साधना है. क्योंकि “जब भीतर प्रकाश जलता है, तभी बाहर का अंधकार मिटता है।”


कहानी: निंदिया और बिंदिया

कहानी: निंदिया में बिंदिया 

गजेंद्र अपने बेड रूम में लेटा अपनी पत्नी प्रिया की फोटो को निहार रहा था. मुस्कुराती हुई प्रिया के माथे पर लाल लाल गोल बिंदी बहुत प्यारी लग रही थी. गजेंद्र अक्सर गुनगुनाया करता था
"आय हाय तेरी बिंदिया रे"
और वो कहती थी 
"तेरी निंदिया ले लेगी मेरी बिंदिया रे"
सच में जब से वो गई है, गजेंद्र की निंदिया में बिंदिया छाई रहती है"

उसे याद आया प्रिया को तो बिंदी बहुत पसंद थी, चाहे शादी फंक्शन हो या पीहर जाना हो उसके मेक अप बॉक्स में तरह तरह की मैचिंग बिंदिया जरूर होती थीं. कई बार तो हॉस्पिटल भर्ती होने से पहले अपने समान में बिंदी रखना नहीं भूलती थी. अगर भूल भी जाती तो कहती " जी मैं बिंदी भूल आई हूँ लेते आना" 
जब गजेंद्र बिंदिया ले कर जाता तो कहती थी
"अरे जी ये वाली नहीं चाहिए थी, तुम भी ना एक भी काम ढंग से नहीं करते हो" 
ये सब सोचते सोचते उनकी आँखों कुछ गीली हो जाती थीं.

प्रिया को गये करीब 4 वर्ष बीत गए. उसके जाने के बाद
घर में कई चीज़ें बदलीं, नहीं बदली तो उसकी बिंदी वाली फोटो और उसकी जगह. 

गजेंद्र अब भी प्रिया के साथ उसी कमरे में अपने आप को कैद कर लिया है, मानो प्रिया कह रही हो जी तुम मेरे सामने रहो और रोज़ मेरी बिंदी निहारा करो. जी मैडम, उसने तस्वीर की तरफ देखा और मुस्कुरा उठा.. 

एक छोटी सी बिंदी ने उसका जीवन अभी भी थाम के रखा है...


कविताएँ : ये जो है जिंदगी

ये जो है जिंदगी.....

ज़िंदगी 
सीधी लकीर तो नहीं 
हर मोड़ एक कहानी है
कभी धूप में जलती हैं साँसें,
तो कभी छाँव मौजों की कहानी है..
🙂🙂🙂🙂😀😀😀😀😀😀


हर सुबह 
एक सवाल है,
हर शाम 
ढेरों सवाल छोड़ जाती है
क्या, क्यों कैसे में 
जिंदगी उलझ जाती है...
🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂


ज़िंदगी ने सिखाया 
मुस्कुराना और रोना भी
कोई हंसता हुआ रोता है
किसी के आंसू सूख जाते हैं 
फिर भी जिंदगी चलती है
बिन पते की चिट्ठी लिए ..
😊😊😊😊😊😊😊😊


ये जिंदगी है दोस्तो
जीत में हर कोई 
मुस्कुराता रहता है
कुछ ऐसे भी हैं
जो हार में भी 
जिंदगी खोज लेती है...
☺️☺️☺️☺️☺️☺️☺️




कहानी: अकेलापन

अकेलापन 

रात के करीब ग्यारह बज रहे थे. शहर की एक आलीशान बिल्डिंग के तीसरे माले पर खड़ा आरव नीचे की ओर देख रहा था.. इतनी रात को भी गाड़ियों का मेला सा लगा हुआ था... कुछ गाड़ियां थमी थीं.. कुछ भाग रही थीं, लोग भाग रहे थे, समय भी भाग रहा था. वह उदास सा इन सबको देख रहा था. उसके कमरे में ठहरा हुआ सन्नाटा सा था.

आरव की दिनचर्या मे दिन भर दफ्तर में लोगों से घिरा रहना, मीटिंग, ईमेल, फोन कॉल औरभी बहुतकुछ. शाम जब वो फ्लैट का दरवाज़ा खोलता, सारा शोर बाहर रह जाता और उसके भीतर एक खालीपन आ जाया करता था.

अक्सर चाय का कप लिए वह बालकनी से बड़ी बड़ी इमारतों की खिड़कियां की जलती बुझती रोशनी देखता जैसे हर फ्लैट की अपनी कोई कहानी चल रही हो. उसे लगता था कि इतनी भीड़ के बीच भी वह अकेला कैसे है?

एक रात उसने चाय वाले को देखा. कुछ लोग उस ठेले के पास खड़े हँस हँस कर बतियारहे थे और चाय सिगरेट का आनंद ले रहे थे. उसकी हिम्मत नहीं हुई उनकी बातों में शामिल होने की. चाय का गिलास खत्मकर आरव अपने फ्लैट पर आ गया.

आरव दफ्तर से लौटते वक्त रूटीन से उसके ठेले से चाय पीता. उसकी चाय वाले से बातचीत भी शुरू होने लगी, कभी मौसम की, काम की, शहर की और भी चीज़ों की. अब ये ठेला आरव की शाम का हिस्सा बन गया था. उसे लगने लगा था उसकी तरह ही यहाँ कॉलेज के छात्र , ऑटो चालक , ऑफिस के लोग औरभी लोग.. सब अपने अपने अकेलेपन को दो घूँट चाय में घोल रहे थे.

आरव महसूस करने लगा कि शहर में अकेलापन भीड़ की कमी से नहीं, जुड़ाव की कमी से होता है. उसने सोचा अब अकेलेपन को हराया जाय ... अब आरव ने कुछ नया करने की सोची उसने स्केच बनाना, पार्क में बैठकर लोगों के चेहरे पढ़ना, फोटोग्राफी करना, छुट्टी के दिन किसी नजदीक जगह घूमने चले जाना और व्यस्त रहना शुरू कर दिया.

अब उसका कमरा पहले जैसा खाली नहीं रहता था. 
खिड़की से दिखती रोशनियाँ भी अब अनजानी नहीं थीं. 
उसे समझ आ गया था... अकेलापन कोई दीवार नहीं है बल्कि एक पुल है जो उस पार क्या है.. दिखाता है..

आरव अब अकेला नहीं था उसे शहर में धड़कन महसूस होने लगी थी...

कहानी : मैं फिर लौटूंगा


मैं फिर लौटूंगा
 

वरुणेश एक कॉल सेंटर में काम करता है .. कुछ दिनों से उसे अच्छा नहीं लग रहा था... वह कुछ थका और असहाय सा महसूस कर रहा था.. काम के बोझ से, इस देश की राजधानी के पोल्यूशन से, भीड़ से और ऊंची ऊंची बिल्डिंग से वह घुटन महसूस कर रहा था. वह अक्सर सोचा करता था पैसों की चाहत ने इंसान को मशीन ही बना डाला.

वरुणेश को अब शांति की जरूरत महसूस हुई. उसने सोचा दो दिन की छुट्टी पर कहीं शांत और एकांत वाली जगह चला जाय. शुक्रवार की शाम का दिन था उसने फटाफट जरूरी सामान के साथ बैंग पैक किया और निकल पड़ा बस अड्डे की तरफ, बिना किसी तय मंज़िल के.

विशाल बस अड्डा... ... जहाँ देखो बसें ही बसे, चिल्ल पों मची हुई थी, कन्डेक्टर अपनी अपनी बसों को भरने में लगे थे... वरुणेश के सामने एक बस वाला चिल्ला रहा था 
"नॉन स्टॉप... ऋषिकेश... ऋषिकेश"

बारुणेश ने क्षण भर के लिए सोचा फिर फटाफट बस के अंदर प्रवेश किया... बस भर चुकी थी... थोड़ी देर में कंडक्टर ने टिकट भी बना दिया.. बस चल रही थी ... हवा के ठंडे झोंको ने उसे सुला दिया...

सुबह हो चुकी थी. कंडक्टर ने उसे जगाया 
"सर .. ऋषिकेश आ गया है"
"ओह" उसने कंडक्टर को धन्यवाद दिया.

शांत सुबह... हरी भरी पहाड़ीयों के किनारे माँ गंगा तीव्र गति से बह रही थी. असीम शांति थी, मनोरम दृश्य था और नदी के किनारे एकांत था. वरुणेश ने बिना समय गवाएं नदी के तट की ओर बढ़ा... घाट की सीढ़ियों पर बैठा नदी के बहाव को देख रहा था. सोच रहा था.. जीवन में इंसान को भी को इसी तरह चलते रहना चाहिए... सतत.

उसने महसूस किया ... पहाड़ों की गोद में बसा यह छोटा सा स्थान किसी दैविक जगह से कम नहीं है. उसे हवा में ठंडक और ताज़गी महसूस हुई... दूर किसी मंदिर से घंटी की आवाज उसे एक मधुर संगीत की तरह महसूस होने लगी. वह इस अनुपम सौंदर्य का आनंद लेने लगा. उसे लगा प्रकृति उसे प्यार कर रही है छोटे बच्चे की तरह दुलार रही है.

पास खड़े एक वृद्ध साधु ने मुस्कुराकर कहा
“बेटा, यहाँ लोग सवाल लेकर आते हैं और शांति लेकर जाते हैं।”
"जी बाबा आप सही कह रहे हैं" 
वरुणेश ने आँखें बंद कर लीं, उसे देख शहर की भागती सड़कें, अधूरे काम, उलझी बातें सब धीरे-धीरे धुँधली हो रहीं थीं.

उसे सब समझ आ गया था. प्रकृति समाधान नहीं देती है बल्कि वह मन को इतना शांत कर देती है कि समाधान स्वयं दिखाई देने लगते हैं.

दिनभर वह गंगा के किनारे घूमता रहा.. शाम को जब सूरज पहाड़ों के पीछे उतर रहा था, आकाश का रंग गहरा पीला हो रहा था. वरुणेश मन ही मन आनंदित होकर बोला,
“जब भी मेरा मन उदास होगा" 
फिर माँ गंगा की तरफ मुखातिब होकर बोला..
"माँ ... मैं फिर लौटूँगा, आपसे मिलने" 
सूरज ढल रहा था, फिर एक नई सुबह के लिए...



कविता : गाय माता


गाय माता...

वह बोलती नहीं है
उसकी आँखों में प्यार होता है
सदियों से मानव जाति पर 
उसका अटूट विश्वास होता है...

आज भी हम
उसे “माता” कहते हैं
आस्था के दीप भी जलते हैं
कभी कभी उसकी थाली में
पुण्य के लिए 
कुछ खास भी परोस भी देते हैं..

देखते हैं
हर गली मोहल्ले के 
अंजान मोड़ों पर
वीरान सड़कों पर
व्यस्त चौराहों पर
वह खड़ी रहती है
चुपचाप देखती रहती है
इधर उधर टुकुर टुकुर 
काश कोई खाने को दे जाये..

उसको भी लगती है
सुबह शाम भूख 
मुँह में कचरा दबाए
आँखों में उम्मीद लिए 
फिरती रहती है मारे मारे
काश कोई बेटा बनकर आये..

उसने दी  
खेतों को हरियाली दी,
घर को दिया अन्न 
बचपन में दूध दिया,
बीमार को दी औषधि 
पर बदले में क्या पाया?
कचरा और पॉलीथिन की पीड़ा,
दर दर की ठोकरें,
और भूख से भरी
लंबी रातें ..

कचरे में रोटी खोजती है
वो एक गाय नहीं रोती
धरती का हृदय रोता है,
मानवता की आत्मा रोती है...

यदि सच में 
उसे “माँ” कहते हो,
तो उसकी रक्षा
नारों से नहीं
अपने हाथों से करो
एक मुट्ठी चारा,
स्वच्छ जल का पात्र,
एक सुरक्षित आश्रय
यही उसकी पूजा होगी
तेरी आत्मा भी तृप्त होगी.....

चलो संकल्प लेते हैं
गाय का उत्थान करेंगे 
केवल शब्दों से नहीं,
संवेदनाओं से होगा;
राजनीति से नहीं,
मानवता से होगा

जब उसकी आँखों में
भूख नहीं संतोष चमकेगा,
तभी तो हमारी सभ्यता 
बची रहेगी
बची रहेगी....


कहानी: पूनम का चाँद




कहानी: पूनम का चाँद

लोकेश की आँखों में आँसू चमक रहे थे.. उसने आकाश की ओर देखा... आज पूनम का चाँद कुछ अलग सा था, संपूर्ण, उजला और निर्विकार जैसे उसे दीन दुनिया से कोई सरोकार न हो. आँगन में दूधिया रोशनी फैल रही थी, मगर लोकेश के भीतर अँधेरा गहराता चला जा रहा था... उसे कुछ सूझ नहीं रहा था. उसकी पत्नी इस दुनियां को अलविदा कह चुकी थी.

अस्पताल की सफ़ेद दीवारें और चादरें उसकी आँखों में चुभ रहीं थीं.. मशीनों की आवाज़, डॉक्टरों की औपचारिक बातें, लापरवाह नर्सिंग स्टाफ, पीला होता उसका चेहरा और उसकी ठंडी होती उसकी हथेली... सब कुछ उसको धीरे धीरे फिल्मी सीन की तरह नज़र आ रहा था... 

उसने महसूस किया ... सफेद चादर में लिपटी उसकी पत्नि मानो कह रही हो...
“लोकेश प्लीज रोना मत, ये मौत किसी की सगी नहीं होती.... क्या पता कब किसका साथ छोड़ दे”  
लोकेश रोया तो नहीं… लेकिन आंसुओं को छिपा भी नहीं पाया... लोग आते गये ... समझाते गये. कुछ मौन रूप से सहानुभूति जताते गये.. कुछ तो ज्ञान भी बांट गये “रोने से कोई फायदा नहीं.. ये समय है... सब ठीक कर देगा.. धैर्य रखना” उन नादानों को क्या मालूम समय क्या जानता है और वो क्या ठीक करेगा.. क्या बीता वक्त लौट के आयेगा???

लोकेश ने फिर चांद की तरफ देखा... रातों का राजा पूनम का चाँद, उसे अब बैरी लगने लगा था... 





कहानी: बिंदी


कहानी : बिंदी

प्रिया को रंग बिरंगी बिंदीयां बहुत पसंद थी.. उसके बैग में बहुत सी बिंदियों के पैकेट हुआ करते थे... उसके माथे पे गोल गोल बिंदी चांद की तरह दिखती थी.. उसे लगता था ये बिंदियां जैसे उसके माथे पर ठहरा हुआ आत्मविश्वास हो. 

जब भी वह आईने के सामने खड़ी होती तो अपने आप से ही पूछने लगती "मैं ठीक तो लग रही हूँ ना ?” और हँस पड़ती..

एक दिन वो चली गई... बहुत दूर... चांद के पास.. पूनम के चांद ने उसे छीन लिया था. उसकी बिंदियों का डिब्बा अब भी अलमारी में रखा हुआ है... उसकी याद के तौर पर... अलग-अलग रंग, अलग-अलग आकार और सबसे ऊपर वही लाल बिंदी जो उसने मिलन की रात लगाई थी. इसे वह सुहाग की निशानी मानती थी... हर करवा चौथ पर इसे ही लगती थी. मानो उसका व्यक्तित्व और चेहरे की सारी पहचान इस बिंदी में सिमट आई हो .... ठीक वैसे ही जैसे रात के आगोश में पूनम का चाँद..

चाँद तो आज भी आता है रोज़ आता है... लेकिन एक बिंदी के बिना उसका श्रृंगार अधूरा है... और मेरी जिंदगी का भी....

प्रकृति


प्राकृति...

ऊपर नीला आसमान
पृथ्वी पर सजी हरियाली 
कल-कल करती नदियाँ
अडिग खड़े पहाड़ 
फूलों की खुशबू 
सुंदर हरे वृक्ष 
डाल पर चिड़ियों चहकी है
कितना सुंदर है
ये प्रकृति का प्यार....