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कविता : गाय माता


गाय माता...

वह बोलती नहीं है
उसकी आँखों में प्यार होता है
सदियों से मानव जाति पर 
उसका अटूट विश्वास होता है...

आज भी हम
उसे “माता” कहते हैं
आस्था के दीप भी जलते हैं
कभी कभी उसकी थाली में
पुण्य के लिए 
कुछ खास भी परोस भी देते हैं..

देखते हैं
हर गली मोहल्ले के 
अंजान मोड़ों पर
वीरान सड़कों पर
व्यस्त चौराहों पर
वह खड़ी रहती है
चुपचाप देखती रहती है
इधर उधर टुकुर टुकुर 
काश कोई खाने को दे जाये..

उसको भी लगती है
सुबह शाम भूख 
मुँह में कचरा दबाए
आँखों में उम्मीद लिए 
फिरती रहती है मारे मारे
काश कोई बेटा बनकर आये..

उसने दी  
खेतों को हरियाली दी,
घर को दिया अन्न 
बचपन में दूध दिया,
बीमार को दी औषधि 
पर बदले में क्या पाया?
कचरा और पॉलीथिन की पीड़ा,
दर दर की ठोकरें,
और भूख से भरी
लंबी रातें ..

कचरे में रोटी खोजती है
वो एक गाय नहीं रोती
धरती का हृदय रोता है,
मानवता की आत्मा रोती है...

यदि सच में 
उसे “माँ” कहते हो,
तो उसकी रक्षा
नारों से नहीं
अपने हाथों से करो
एक मुट्ठी चारा,
स्वच्छ जल का पात्र,
एक सुरक्षित आश्रय
यही उसकी पूजा होगी
तेरी आत्मा भी तृप्त होगी.....

चलो संकल्प लेते हैं
गाय का उत्थान करेंगे 
केवल शब्दों से नहीं,
संवेदनाओं से होगा;
राजनीति से नहीं,
मानवता से होगा

जब उसकी आँखों में
भूख नहीं संतोष चमकेगा,
तभी तो हमारी सभ्यता 
बची रहेगी
बची रहेगी....


प्रकृति


प्राकृति...

ऊपर नीला आसमान
पृथ्वी पर सजी हरियाली 
कल-कल करती नदियाँ
अडिग खड़े पहाड़ 
फूलों की खुशबू 
सुंदर हरे वृक्ष 
डाल पर चिड़ियों चहकी है
कितना सुंदर है
ये प्रकृति का प्यार....


ये जीवन है


ये जीवन है....

ये जीवन
सीधी रेखा तो नहीं,
यह तो एक वृत्त है
जहाँ हर अंत
नई शुरुआत को जन्म देता है...

कभी धूप की तेजी
कभी छाँव की ठंडक
कभी प्रश्नों के गूंजते स्वर
कभी मौन होता है इनका उत्तर...

हम तो यात्री हैं,
समय की राहों पर
सीखते हुए गिरते हैं
गिरकर फिर उठ जाते हैं..


बैरी चांद


चाँद मेरा बैरी ...

ये चाँद 
बैरी है मेरा
तुमको छुपा ले गया
अपनी चांदनी में 
मेरे मन की रोशनी को
सजा ले गया 
अपने आकाश में .....

मैं छत पर खड़ा हूँ
बार बार पूछता हूँ 
इस पूनम के चांद से
क्यों छीना तुमने 
मेरा सांझ सवेरा
वो मुस्कुराता है
चुप हो जाता है,
जैसे मेरे दर्द की
इसको परवाह नहीं.....

हर पूनम की रात
अब तीर सी लगती है,
उजली किरणें भी जलाती हैं
चांद सी चमकती है
तेरे माथे की बिंदी
आँखों में यादें भर जाती हैं.....

ओ बैरी पूनम के चांद
मेरी चांदनी लौटा दे
या फिर मुझे बुला ले...

तुम कहां हो


तुम कहाँ हो प्रिये 
शायद इस सुबह की 
पहली किरण में
जो खिड़की से आकर
मेरे अकेलेपन को छू जाती है?

या फिर 
उस हवा के झोंको में
जो शाम ढले
धीरे से मेरा नाम लेती है?

या फिर 
उस चाँद की शीतलता में
या उन तारों की झिलमिल में
जो हर रात 
मेरी आँखों में उतर आते हैं?

मैं जानता हूँ,
तुम दूर नहीं हो 
मेरी धड़कनों में हो
एक संगीत की तरह...

तुम जहाँ भी हो,
मेरा गीत हो
मेरा संगीत हो
मेरी हर प्रार्थना का 
केंद्र तुम ही तो हो....


Villa no. 20


विला नं. 20 : लॉयंस डेन 
करमा रिजॉर्ट्स, 

मैं शांत खड़ा है 
सुबह की आलसाई धूप में,
जैसे मेरी यादों का
कोई पुराना घर हो
जो अब भी
मेरा नाम पुकारता हो

इनकी खिड़कियों से
हवा नहीं, यादें आती हैं
उनकी हँसी की हल्की गूंज,
जैसे चाय की भाप में 
घुली हुई हो ढेर सारी बातें......

बरामदे की कुर्सी जानती है
कितनी शामें वहाँ 
चाय के साथ निखरती हैं
और ये फूल गवाह है
उन हसीन पलों के...

ऐसा लगता है
ये विला नहीं
एक ठिकाना है
उन पलों का,
जिनको हम कभी 
घर कहा करते थे...


ये लाल रंग


ये लाल रंग.......

ये लाल रंग
एक रंग नहीं,
मेरे धड़कते हुए दिल की 
मौन भाषा है।

सूरज की आभा है,
उनके माथे की बिंदीया है
प्यार का अहसास है
एक गहरा विश्वास है।

लहू है
उनकी यादों का
जीवन के रगों का
बहता है,  
कहता है,
“जीके जीओ… पूरी गति से।” 




कविता : नादान

कविता : नादान 

कौन सी शौहरत पर,
तुझको इतना नाज़ है, 
ए नादान इंसान...

तू तो खुद ही मोहताज है
जिंदगी के अंतिम सफ़र में 
किसी और के कंधों का....

याद रख
शोहरतें भी बदल देती हें 
रिश्तों के मायने ...

कहता है जीके 
ए मुकद्दर किसी को 
इतना भी मशहूर ना कर....
🙂🙂🙂🙂🙂

कविता : शिव



शिव....

रात में 
जब चंद्रमा साधना में लीन होता है,
आकाश
मौन का वस्त्र ओढ़ लेता है
तब कहीं दूर
घंटियों की धीमी ध्वनि में
भगवान महादेव उतरते हैं
मन के एकांत आँगन में.

ना कोई आडंबर है,
ना कोई शब्दों का शोर
बस एक मंत्र,
“ॐ नमः शिवाय”
जो सांसों में घुलकर
अंतर का विष हर लेता है
बेलपत्र सा सरल हो मन,
गंगाजल सा निर्मल हो विचार
तभी समझ आता है,...

शिव मंदिरों में नहीं,
हमारी जागी हुई चेतना में 
निवास करते हैं।
उस रात को
अंधकार भी आरती बन जाता है,
और शून्य में
पूर्णता का अनुभव होता है...

ॐ नमः शिवाय 

कविता : वेलेंटाइन डे


जीके कहता है....

ना गुलाबों की चमक 
ना चॉकलेट का इज़हार 
यह तो मन का पावन उत्सव है
जहाँ समर्पण ही है, असली श्रृंगार....

राधा की पायल की रुनझुन 
कृष्ण की बांसुरी की तान 
प्रेम केवल आकर्षण नहीं
एक भक्ति है सम्मान है....

प्यार तो 
सीता का धैर्य है
राम का संकल्प,
ये बंधन नहीं, 
विश्वास का सूत्र है
जीवन का अटल विश्वास....

प्यार को प्यार ही रहने दो
इसे रिश्तों का नाम ना दो
सिर्फ एक एहसास है
रूह से महसूस करो...
 ❤️
एंजॉय एवरी डे
इंडियन वेलेंटाइन डे 
😀😀😀😀😀

रंग कौन भरेगा

रंग कौन भरेगा....

मैं चित्र बनाता हूँ, 
इनमें रंग कौन भरेगा,

जिंदगी कोरे काग़ज़ सी
कुछ यादों की लकीरें 
इन सूखे से लम्हों में 
उमंग कौन भरेगा..

मैंने तो तोड़ दी हैं
तक़दीर की सारी सीमाएँ,
इस बैरंग दुनिया में 
किस्से कौन भरेगा...

यादों की धूल जमी है 
कई बीते बरसों से 
इन फीकी सी यादों में 
तरंग कौन भरेगा।
कौन भरेगा....

🙂🙂🙂🙂🙂🙂

मेरा चांद मुझे लौटा दो


मेरा चाँद मुझे लौटा दो

काली स्याह रातों में 
कोई सपनों-सा उतर आया है
मेरे बालकनी की खामोशी में
कोई उजाला भरने आया है...

वही हँसी, 
वही नज़र, 
वही सुकून
उसकी दुआओं का साक्षी 
आज भी चमकता है
वो करवा चौथ का चांद....

सोचता हूं 
किसने छीना होगा 
मेरा पूनम का चमकता चाँद
कोई मेरे हिस्स का 
वो चांद मुझे लौटा दो....


विरह की मधुशाला


विरह की मधुशाला

सूना साकी, 
सूना प्याला, 
सूनी ये महफिल
कोई छीन ले गया
खुशियां मेरी
सज गई मेरी मधुशाला...

मेरे घर में 
कभी छनकती थी चूड़ियां 
मुस्कुराहटें
आज विरह में जलाती है
मेरी मधुशाला.

साँझ ढलती है
बालकनी में मेरे
यादों की लालिमा बिखर आती है
यादों की घटाएँ छा जाती हैं,
सज जाती हैं मधुशाला...

तेरी ही बातें, 
तेरी ही यादें, 
मदिरा बन 
हलक से उतर जाती हैं.
ढूंढें फिर मधुशाला..

कैसे पियूं अमृत
जब आसूं हो हिस्से में 
मैं पीता हूं भर भर जाम
मदहोश कर देती है
मेरी मधुशाला..

मेज पर सजी 
श्रृंगार किए तस्वीर तुम्हारी
चमक रही बिंदिया 
ले लेती है मेरी निंदिया
ढूंढें मन की ज्वाला
कहां है मधुशाला....

हर जाम में 
दिखती है  मूरत तुम्हारी 
फिर क्यों याद आए तुम
यादों, सिसकियों में सजती है
मेरी ये मधुशाला....

वो कहते हैं
ग़म भुलाती है मदिरा
मैं कहता हूं 
यादें गहरी करती है मदिरा
कोई ये तो बताए 
कहां है मेरी मधुशाला..

किस किस को बताऊं 
विरह का नशा 
पल-पल हमें रुलाता है,
तुम क्या जानो बाबू
विरह में ही काम आती है
ये मेरी मधुशाला...

एक जाम शाम के नाम


कविता : एक जाम शाम के नाम

जब भी शाम ढलती है
घर में ख़ामोशी सी छा जाती है
शराब के हर जाम में
यादों की परछाईंयां उतर आती हैं...

एक घूंट में 
बीता कल याद आता है,
दूसरे में अधूरी बातें 
हर जाम में याद आती है
बीते हुए लम्हों की बातें.

ये शाम, जब भी 
ओढ़ लेती है तन्हाई,
होंठों तक आती है हँसी,
और आँखों में दर्द बहक जाता है

खिड़की के बाहर
कांपती सर्द रातों मे 
दिल उनकी याद में 
नम आंखे लिए कहता है
अब तो हाथ में 
शराब का जाम हो
बस मैं रहूं या मेरा खुदा 
गवाह रहे.....


कविता : गणतंत्र दिवस


गणतंत्र दिवस.....

लहराता है तिरंगा 
हर गली चौराहे पर
कोई बैठा है, 
भूखे पेट
झंडे की छांव...

ओ संविधान की
कसमें खाने वालो
ग़रीब को रोटी 
पहुंचाने की भी
कसमें खा लो...

काग़ज़ों में अधिकार लिखे हैं 
भाषणों ने सपने पाले हैं,
आज भी किसी की 
रातभर झुग्गी टपकती है,
कोई रेन बसेरों में सोता है
बच्चे भूखे सोते हैं
और 
किसी को नर्म गद्दों में भी
नींद नहीं आती 

वोट की कीमत 
समझी जाती है
रोटी की कीमत 
कौन समझाए.....

गणतंत्र तो आता है
हर साल
हर पाँच साल,
गरीबी कैसे हटेगी
ये कौन समझाए....

उम्मीदें आज भी जिंदा है
एक दिन गणतंत्र 
और भी चमकेगा
फिर कोई भी
भूख से नहीं सोएगा...

जय हिंद
अमर रहे गणतंत्र हमारा




शीशे का शहर


ये शहर : शीशे का 

वो जमाना लद गया
जब ईंट गारे से
घर बना करते थे
अब तो चारों तरफ
शीशे से बनी स्क्रीन ही स्क्रीन 
नजर आती है.

मैं अब 
शहर का नागरिक हूं
जेब में स्मार्टफोन,
कलाई में स्मार्टवॉच,
और दिल में अजीब-सी 
ख़ामोशी रखता हूं.

अब सुबहों को अलार्म नहीं, 
मोबाइल जगाता है
सब ऑनलाइन रहते हैं
कोई शोर नहीं होता
नोटिफिकेशन सब याद दिलाते है..

मैने एक दिन सोचा
गाँव में चलते हैं
ये क्या , यहां भी
गांव शहर हो गया
पुराने मकान पक्के 
खिड़की दरवाजे 
शीशे के हो गए

फिर एक दिन 
मोबाइल अचानक बंद हो गया
बैटरी खत्म हो गई
मैं घबरा गया
जैसे रुक गई हो सांसें..

सोचा खिड़की के बाहर झांकूँ 
पेड़ अब भी हरे भरे हैं,
आसमान अब भी नीला है,
कुछ लोग अब भी इंसान हैं,

ओह
मोबाइल फिर से चल पड़ा,
मैं सपनों से बाहर निकला
खो गया फिर से 
उन शीशे की दीवारों के पीछे

शहर वही है
मैं भी वही हूं
बस जिंदगी
शीशे के पीछे 
धकेल दी गई है...



मेरी मधुशाला


मैं और मेरी मधुशाला

मेरी मधुशाला 
कोई शराबखाना तो नहीं 
ना कोई कैद है
मेरे मन का वो कोना है
जहाँ मेरे भावों का
भावनाओं का आईना है.

मैं यहाँ शराब
बोतलों में नहीं भरता,
ये वो यादें हैं, जो जाम बनकर
छलकती रहती है
फिर दिल में उतर जाती हैं...

कभी,  
हँसी से छलकते थे
खुशी के जाम, उनको साथ लिए
मधुशाला सी जिंदगी में 
कई तैरते हुए 
सपनों के जाम पिए हुए..

अब कौनसा जाम उठाऊं
बुझे बुझे से शब्दों का 
कविताओ ने पी लिया है
जहर मेरे जज्बात का...

कभी मधुशाला थी जिंदगी
प्रेम था नशा
बिन शराब के 
आज विरह ने रंग दिखाया है
उन रंगीन प्यालों का.

जिसे समझा था 
अमृत मैं
वही यादों का 
नशा बन गया...

यहाँ आँसू भी नशा है
हम फिर भी पिये जाते हैं,
किसी की याद में 
जी को जलाते हैं
हम बन गये शराबी 
अब तो मधुशाला में ही 
दीप जलते हैं...

ना कोई नियम, 
ना कोई पहरा,
अब कोई नहीं पूछता 
मेरा नाम पता
सबको मालूम है
महखाना ही है 
मेरा असली पता..

दिन छोटा सा
ऊंघता रहता है
और ये लंबी रातें 
जागती रहती हैं
नशे में करती रहती हैं
इंतजार उनका...

ये मेरी मधुशाला है
यादों वादों की
इसका कोई समय नहीं होता
जब प्यास लगे 
जाम छलक ही जाता है
आँखें में या प्यालों में...

यह वो नशा नहीं है दोस्त
जिसको सब को तलब होती है
ये तो किसी की याद का 
पैमाना होता है...

एक दिन जिंदगी की 
ये बोतल भी टूट जायेगी
देह पहचान सब छूट जाएगा,
मेरी यादों की मधुशाला रहेगी
उसमें एक नाम और जुड़ जाएगा...



My beloved wife

मेरी पत्नी के लिए...

तुम्हारी मुस्कान
आज भी मेरी सुबह है
और शाम भी.

तुम्हारी 
गहन खामोशी 
हर शाम 
मौन होकर बोलती है.

तुम चली तो गईं हो
पर स्नेह के बंधन
यहीं छोड़ गई हो
जो बस गई है
मेरी रूह में 
मेरी साँसों में,
मेरी दुआओं में..

क्या कहूं 
तुम्हारे बिना ये घर
एक कमरा बन गया है
और मेरा जीवन
एक कविता
और एक
अधूरी सी कहानी.

मेरे हर शब्द में
इन सांसों में 
यादों में 
तुम ही तो हो..




यादों की बारिश

यादों की बारिश

सुनसान रातों के
रात के सन्नाटे में 
तारों की बारात
और यादों की बारिश 

हँसी की शहनाई,
आँसुओं की ढोलक,
कुछ पल रुठे हुए,
बाहों में सिमटे हैं

पुराने खुशबू वाले खत,
कुछ ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें 
अधूरे सपनों की पोटली,
वक़्त की गठरी में  बंधे लम्हे 
कभी बूढ़े नहीं होते

रात के सन्नाटों में 
जब दिल का दरवाज़ा खुलता है
फिर से यादों की बारात
चुपचाप भीतर तक 
उतर आती है.....


My beloved wife

रात और यादें...

बालकनी की रेलिंग से
रात के गहन अंधकार में 
कुछ अधूरे ख़्वाब नजर आए 

ये रात का साया 
रोशनी से नहाया ये शहर
दूर तक चमकता रहता है

आँखों में थकी रोशनी,
और खामोश हवा कहती है
सब तो ठीक है, 
बस थोड़ी सी 
आंखों में नमी है

मेरे दिल में 
गहन अंधेरा है
मेरा खोया नूर अब
कहीं तारा बन के चमकता है
मैं यादों में सिसकता हूं.

यह रात 
मेरे कान में धीरे से फुसफुसाई 
जीना भी एक कला है, 
तू बस जीने का तरीका देख