वह बोलती नहीं है
उसकी आँखों में प्यार होता है
सदियों से मानव जाति पर
उसका अटूट विश्वास होता है...
आज भी हम
उसे “माता” कहते हैं
आस्था के दीप भी जलते हैं
कभी कभी उसकी थाली में
पुण्य के लिए
कुछ खास भी परोस भी देते हैं..
देखते हैं
हर गली मोहल्ले के
अंजान मोड़ों पर
वीरान सड़कों पर
व्यस्त चौराहों पर
वह खड़ी रहती है
चुपचाप देखती रहती है
इधर उधर टुकुर टुकुर
काश कोई खाने को दे जाये..
उसको भी लगती है
सुबह शाम भूख
मुँह में कचरा दबाए
आँखों में उम्मीद लिए
फिरती रहती है मारे मारे
काश कोई बेटा बनकर आये..
उसने दी
खेतों को हरियाली दी,
घर को दिया अन्न
बचपन में दूध दिया,
बीमार को दी औषधि
पर बदले में क्या पाया?
कचरा और पॉलीथिन की पीड़ा,
दर दर की ठोकरें,
और भूख से भरी
लंबी रातें ..
कचरे में रोटी खोजती है
वो एक गाय नहीं रोती
धरती का हृदय रोता है,
मानवता की आत्मा रोती है...
यदि सच में
उसे “माँ” कहते हो,
तो उसकी रक्षा
नारों से नहीं
अपने हाथों से करो
एक मुट्ठी चारा,
स्वच्छ जल का पात्र,
एक सुरक्षित आश्रय
यही उसकी पूजा होगी
तेरी आत्मा भी तृप्त होगी.....
चलो संकल्प लेते हैं
गाय का उत्थान करेंगे
केवल शब्दों से नहीं,
संवेदनाओं से होगा;
राजनीति से नहीं,
मानवता से होगा
जब उसकी आँखों में
भूख नहीं संतोष चमकेगा,
तभी तो हमारी सभ्यता
बची रहेगी
बची रहेगी....