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मेरा चांद मुझे लौटा दो


मेरा चाँद मुझे लौटा दो

काली स्याह रातों में 
कोई सपनों-सा उतर आया है
मेरे बालकनी की खामोशी में
कोई उजाला भरने आया है...

वही हँसी, 
वही नज़र, 
वही सुकून
उसकी दुआओं का साक्षी 
आज भी चमकता है
वो करवा चौथ का चांद....

सोचता हूं 
किसने छीना होगा 
मेरा पूनम का चमकता चाँद
कोई मेरे हिस्स का 
वो चांद मुझे लौटा दो....


विरह की मधुशाला


विरह की मधुशाला

सूना साकी, 
सूना प्याला, 
सूनी ये महफिल
कोई छीन ले गया
खुशियां मेरी
सज गई मेरी मधुशाला...

मेरे घर में 
कभी छनकती थी चूड़ियां 
मुस्कुराहटें
आज विरह में जलाती है
मेरी मधुशाला.

साँझ ढलती है
बालकनी में मेरे
यादों की लालिमा बिखर आती है
यादों की घटाएँ छा जाती हैं,
सज जाती हैं मधुशाला...

तेरी ही बातें, 
तेरी ही यादें, 
मदिरा बन 
हलक से उतर जाती हैं.
ढूंढें फिर मधुशाला..

कैसे पियूं अमृत
जब आसूं हो हिस्से में 
मैं पीता हूं भर भर जाम
मदहोश कर देती है
मेरी मधुशाला..

मेज पर सजी 
श्रृंगार किए तस्वीर तुम्हारी
चमक रही बिंदिया 
ले लेती है मेरी निंदिया
ढूंढें मन की ज्वाला
कहां है मधुशाला....

हर जाम में 
दिखती है  मूरत तुम्हारी 
फिर क्यों याद आए तुम
यादों, सिसकियों में सजती है
मेरी ये मधुशाला....

वो कहते हैं
ग़म भुलाती है मदिरा
मैं कहता हूं 
यादें गहरी करती है मदिरा
कोई ये तो बताए 
कहां है मेरी मधुशाला..

किस किस को बताऊं 
विरह का नशा 
पल-पल हमें रुलाता है,
तुम क्या जानो बाबू
विरह में ही काम आती है
ये मेरी मधुशाला...

एक जाम शाम के नाम


कविता : एक जाम शाम के नाम

जब भी शाम ढलती है
घर में ख़ामोशी सी छा जाती है
शराब के हर जाम में
यादों की परछाईंयां उतर आती हैं...

एक घूंट में 
बीता कल याद आता है,
दूसरे में अधूरी बातें 
हर जाम में याद आती है
बीते हुए लम्हों की बातें.

ये शाम, जब भी 
ओढ़ लेती है तन्हाई,
होंठों तक आती है हँसी,
और आँखों में दर्द बहक जाता है

खिड़की के बाहर
कांपती सर्द रातों मे 
दिल उनकी याद में 
नम आंखे लिए कहता है
अब तो हाथ में 
शराब का जाम हो
बस मैं रहूं या मेरा खुदा 
गवाह रहे.....


कविता : गणतंत्र दिवस


गणतंत्र दिवस.....

लहराता है तिरंगा 
हर गली चौराहे पर
कोई बैठा है, 
भूखे पेट
झंडे की छांव...

ओ संविधान की
कसमें खाने वालो
ग़रीब को रोटी 
पहुंचाने की भी
कसमें खा लो...

काग़ज़ों में अधिकार लिखे हैं 
भाषणों ने सपने पाले हैं,
आज भी किसी की 
रातभर झुग्गी टपकती है,
कोई रेन बसेरों में सोता है
बच्चे भूखे सोते हैं
और 
किसी को नर्म गद्दों में भी
नींद नहीं आती 

वोट की कीमत 
समझी जाती है
रोटी की कीमत 
कौन समझाए.....

गणतंत्र तो आता है
हर साल
हर पाँच साल,
गरीबी कैसे हटेगी
ये कौन समझाए....

उम्मीदें आज भी जिंदा है
एक दिन गणतंत्र 
और भी चमकेगा
फिर कोई भी
भूख से नहीं सोएगा...

जय हिंद
अमर रहे गणतंत्र हमारा




शीशे का शहर


ये शहर : शीशे का 

वो जमाना लद गया
जब ईंट गारे से
घर बना करते थे
अब तो चारों तरफ
शीशे से बनी स्क्रीन ही स्क्रीन 
नजर आती है.

मैं अब 
शहर का नागरिक हूं
जेब में स्मार्टफोन,
कलाई में स्मार्टवॉच,
और दिल में अजीब-सी 
ख़ामोशी रखता हूं.

अब सुबहों को अलार्म नहीं, 
मोबाइल जगाता है
सब ऑनलाइन रहते हैं
कोई शोर नहीं होता
नोटिफिकेशन सब याद दिलाते है..

मैने एक दिन सोचा
गाँव में चलते हैं
ये क्या , यहां भी
गांव शहर हो गया
पुराने मकान पक्के 
खिड़की दरवाजे 
शीशे के हो गए

फिर एक दिन 
मोबाइल अचानक बंद हो गया
बैटरी खत्म हो गई
मैं घबरा गया
जैसे रुक गई हो सांसें..

सोचा खिड़की के बाहर झांकूँ 
पेड़ अब भी हरे भरे हैं,
आसमान अब भी नीला है,
कुछ लोग अब भी इंसान हैं,

ओह
मोबाइल फिर से चल पड़ा,
मैं सपनों से बाहर निकला
खो गया फिर से 
उन शीशे की दीवारों के पीछे

शहर वही है
मैं भी वही हूं
बस जिंदगी
शीशे के पीछे 
धकेल दी गई है...



मेरी मधुशाला


मैं और मेरी मधुशाला

मेरी मधुशाला 
कोई शराबखाना तो नहीं 
ना कोई कैद है
मेरे मन का वो कोना है
जहाँ मेरे भावों का
भावनाओं का आईना है.

मैं यहाँ शराब
बोतलों में नहीं भरता,
ये वो यादें हैं, जो जाम बनकर
छलकती रहती है
फिर दिल में उतर जाती हैं...

कभी,  
हँसी से छलकते थे
खुशी के जाम, उनको साथ लिए
मधुशाला सी जिंदगी में 
कई तैरते हुए 
सपनों के जाम पिए हुए..

अब कौनसा जाम उठाऊं
बुझे बुझे से शब्दों का 
कविताओ ने पी लिया है
जहर मेरे जज्बात का...

कभी मधुशाला थी जिंदगी
प्रेम था नशा
बिन शराब के 
आज विरह ने रंग दिखाया है
उन रंगीन प्यालों का.

जिसे समझा था 
अमृत मैं
वही यादों का 
नशा बन गया...

यहाँ आँसू भी नशा है
हम फिर भी पिये जाते हैं,
किसी की याद में 
जी को जलाते हैं
हम बन गये शराबी 
अब तो मधुशाला में ही 
दीप जलते हैं...

ना कोई नियम, 
ना कोई पहरा,
अब कोई नहीं पूछता 
मेरा नाम पता
सबको मालूम है
महखाना ही है 
मेरा असली पता..

दिन छोटा सा
ऊंघता रहता है
और ये लंबी रातें 
जागती रहती हैं
नशे में करती रहती हैं
इंतजार उनका...

ये मेरी मधुशाला है
यादों वादों की
इसका कोई समय नहीं होता
जब प्यास लगे 
जाम छलक ही जाता है
आँखें में या प्यालों में...

यह वो नशा नहीं है दोस्त
जिसको सब को तलब होती है
ये तो किसी की याद का 
पैमाना होता है...

एक दिन जिंदगी की 
ये बोतल भी टूट जायेगी
देह पहचान सब छूट जाएगा,
मेरी यादों की मधुशाला रहेगी
उसमें एक नाम और जुड़ जाएगा...



My beloved wife

मेरी पत्नी के लिए...

तुम्हारी मुस्कान
आज भी मेरी सुबह है
और शाम भी.

तुम्हारी 
गहन खामोशी 
हर शाम 
मौन होकर बोलती है.

तुम चली तो गईं हो
पर स्नेह के बंधन
यहीं छोड़ गई हो
जो बस गई है
मेरी रूह में 
मेरी साँसों में,
मेरी दुआओं में..

क्या कहूं 
तुम्हारे बिना ये घर
एक कमरा बन गया है
और मेरा जीवन
एक कविता
और एक
अधूरी सी कहानी.

मेरे हर शब्द में
इन सांसों में 
यादों में 
तुम ही तो हो..




यादों की बारिश

यादों की बारिश

सुनसान रातों के
रात के सन्नाटे में 
तारों की बारात
और यादों की बारिश 

हँसी की शहनाई,
आँसुओं की ढोलक,
कुछ पल रुठे हुए,
बाहों में सिमटे हैं

पुराने खुशबू वाले खत,
कुछ ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें 
अधूरे सपनों की पोटली,
वक़्त की गठरी में  बंधे लम्हे 
कभी बूढ़े नहीं होते

रात के सन्नाटों में 
जब दिल का दरवाज़ा खुलता है
फिर से यादों की बारात
चुपचाप भीतर तक 
उतर आती है.....


My beloved wife

रात और यादें...

बालकनी की रेलिंग से
रात के गहन अंधकार में 
कुछ अधूरे ख़्वाब नजर आए 

ये रात का साया 
रोशनी से नहाया ये शहर
दूर तक चमकता रहता है

आँखों में थकी रोशनी,
और खामोश हवा कहती है
सब तो ठीक है, 
बस थोड़ी सी 
आंखों में नमी है

मेरे दिल में 
गहन अंधेरा है
मेरा खोया नूर अब
कहीं तारा बन के चमकता है
मैं यादों में सिसकता हूं.

यह रात 
मेरे कान में धीरे से फुसफुसाई 
जीना भी एक कला है, 
तू बस जीने का तरीका देख





My beloved wife


चैन नहीं किताबों में....

नहीं मिलता चैन, किताबों में
जब से आई हो तुम, मीठे ख्यालों में

हर लफ़्ज़ में, बस तेरा ही असर है,
खो गया हूँ मैं तो, तेरे ख़यालों में

नींद भी अब,  रुठी हुई है 
ये रात नहीं कटती है,
उलझ जाती है, बस यादों में 
या उलझे सवालों में

आईना भी पूछता है, 
अब हाल मेरा 
जब में दिखता हूँ 
उसको टूटे ख़्वाबों में

लोग कहते हैं,  वक़्त मरहम है,
ज़ख़्म गहरे हैं तेरे , 
अब भी यादों में


My beloved wife

तुम्हारी खूबसूरत यादें और ये धुंध....

आज धुंध उतरी है 
चुपचाप मेरे शहर की राहों पर,
मैंने भी ओढ़ ली है
सपनों की चादर.

जो दिखा नहीं, 
वही पास लगा
ख़ामोशी ने आज फिर 
मुझसे बात की है..

शुभ प्रातः मित्रों 
आज का दिन मंगलमय हो 

gkkidiary.blogspot.com

My beloved wife


धुंध 
(तुम्हारी स्मृति में ढली हुई)

आज सुबह की धुंध
कुछ ज़्यादा ठहरी हुई थी,
जैसे उसे भी मेरी तरह
किसी का इंतज़ार हो.

मंजिले वही हैं
और रास्ते भी
पर एक पहचान खो बैठे हैं
पेड़ भी आज नज़रें चुराने लगे हैं
हर चीज़ धुंधली नजर आती है
सिवाय तुम्हारी यादों के.

तुम्हारी खूबसूरत हँसी
धुंध के बीच से उभर आई,
फिर मैं उसी में खो गया
मैंने तुम्हें जोर से पुकारा
मेरी आवाज़ दूर कहीं खो गई.

आज इस धुंध ने 
मुझे झकझोंर कर कहा
जो चला जाता है
वह पूरी तरह नहीं जाता,
बस छोड़ देता है हर जगह
अपनी उपस्थिति.

कभी-कभी
धुंध मुझे अच्छी लगती है,
क्योंकि इसमें 
तुम्हारा न होना भी
साफ़ नहीं दिखता.

धुंध भी छँट जाती है
सूर्य निकल आता है
मैं रोशनी से घिर जाता हूं
तुम्हारा साया लुप्त हो जाता है.

जाते-जाते ये धुंध 
कुछ तो दे जाती है
एक पल के लिए
मैं फिर से तुम्हारे साथ हो लेता हूँ.



My beloved wife


यादों के पंख....

मेरी आंखों के सामने 
उनको जला दिया गया 
वो एक आत्मीय पहचान 
अब धुएँ में बदल गई थी
और मैं इसी जमीं पर रह गया
इन भीगी हुई आंखों में 
एक गहरा सन्नाटा लिए हुए .

राख बन गया 
उनका शरीर,
मेरे भीतर अब भी
बहुत कुछ जल रहा है
जो सोने नहीं देता
उसकी आवाज़ आती है.

वो तो चली गई है
बहुत दूर इस देह से भी परे
इतनी दूर जहाँ 
मेरे शब्द नहीं पहुँचते,

अब तो यादें भी खामोश हैं
और ये खामोशी एक संवाद 
समय की राख टटोलता हुआ
मैं एक बुझा सा इंसान
और वो अनंत की गोद में 
चिर लीन विलीन.






My beloved wife


कोरा काग़ज़ 

ये जीवन मेरा 
कोरा काग़ज़ सा
जो भी लिखा 
मिटता चला गया

कुछ सपने स्याही बनकर 
कागज पर उतारे थे 
कोई उन सपनों को 
उड़ा ले गया.

लिखी थी कभी 
धूप में कुछ सुनहरी पंक्तियाँ,
बारिश के धब्बों ने
सब धो दिया.

इस जिंदगी के
कोरे पन्नों की किताब का
मैं ही लेखक हूं
मैं ही पाठक हूं

क्या करूं 
गलतियाँ से सीखता हूं
फिर भी गलती करता हूं
कल भी कोरा कागज था
आज भी कोरा कागज ही हूं.






बारिश की सुबहें


जीके कहता है.....
बारिशों की
ये सुहानी सुबहें 
इनमें अलसाए हम
गुम है सूरज
चंचल है मन
फिर वही
यादों का सिलसिला
क्या करें हम ???
🕉️🙏🕉️
क्यों ना
एक चाय हो जाये..
😁😁😃😃

विदा 2024


31.12.2024.....

शुरुवात है साल की
इसे कहते हैं : जनवरी.....
प्यार के फल को कहते हैं
प्यारी फरवरी ......
अकाउंटेंट की आफत  बनती है
ये मार्च हर साल बड़ी .....
फिर से टैक्स का नया साल
ये है अप्रैल कहती है tax बचाओ घड़ी घड़ी
प्लानिंग का नाम है
ये मई की गरम दोपहरी
मेरी जिंदगी की धड़कन है वो
ये जून है मुझे जश्न मनाने की है पड़ी....
मिलन का महीना है
ये हसीन जुलाई
देश आजादी का महीना है
अगस्त की सुहानी सुबह बड़ी
मेरे यार की जुदाई का महीना है
यादगारें सितंबर दुख भरी
ठंड की शुरुवात होती है
ये अक्टूबर की ठंडी बड़ी
दुनिया करती है स्वागत हमारा
हम हैं नवंबर की शुभ घड़ी
बसी हुई है यादों की हर घड़ी
फिर से आ गई है ये दिसंबर मरी मरी
🙂🙂🙂🙂🙂

Enjoy the day

एक सुबह जयपुर की

सवाई जय सिंह सर्किल: जयपुर के संस्थापक का स्टेच्यू 

कुल्हड़ वाली चाय के बिना यह शहर अधूरा है 

चाय की कचोरी की टपरी पर

आमेर घाटी से दिखता हुआ जल महल

जयपुर की शान : आमेर का किला...


एक सुबह जयपुर की...

ये शहर गुलाबी
सुबह उठाती है सबको
खुद नहीं सोती
यहां की हर सुबह होती है
श्री गोविंद देव जी के नाम
मंगल काले हनुमान जी
बुध प्यारे गणेश जी महाराज
यही शोहरत है
शान है और पहचान है
इस शहर की 
बस क्या कहूं
दिन- रात चलती रहती है
जयपुर की सुबह शाम
कभी बदनाम तो
हर समय होता है नाम...