कहानी : दहेज


कहानी : दहेज 

देश की राजधानी दिल्ली की एक पॉश एरिया की ऊँची इमारत की तीसरी मंज़िल पर रहने वाले राजीव भट्ट हर चीज़ को पैसे से तोलकर अपनी हैसियत दिखाते रहते है. चाहे मामला कार, बंगले, रिश्ते और यहां तक … शादी में भी हैसियत.

उसी शहर में डीडीए के एलआईजी मकान में रहते हैं उमेश बाबू ; एक ईमानदार सरकारी क्लर्क और उनकी बेटी माधवी. माधवी एक पढ़ी-लिखी, आत्मसम्मानी और सपनों से भरी हुई तेजस्वी कन्या है. विवाह के बारे में उसका विचार बहुत ही अच्छा था. उसके अनुसार शादी दो दिलों के विचारों का मिलन है, लेन-देन का नहीं.

राजीव का बेटा अभिनव और माधवी एक ही कॉलेज में पढ़ते थे. अभिनव धनवान और अय्याश किस्म छात्र था, उसका दिल माधवी पर था लेकिन माधवी उसे पसंद नहीं करती थी. अभिन ने अपने दोस्तों से कहा था
"एक ना एक दिन वो माधवी को अपनी रानी बना के मानेगा"

कॉलेज खत्म जो गये बातें बीती जो गयी लेकिन अभिनव इस बात को भुला नहीं था. उसने अपने बाप को अपनी मंसा बताई. बाप ने पैसे का दम और हैसियत के साथ बोला 
"माधवी को तेरे लिए ले आते हैं और दहेज भी मांग लेंगे"
बाप बेटे दोनों हँस रहे थे.

एक दिन राजीव ने अपने बेटे अभिनव के लिए माधवी के पिता उमेश बाबू को रिश्ते के लिए सन्देश भिजवाया. उमेश बाबू को लगा ये रिश्ता तो बहुत बढ़िया है. उन्हें लगा शायद इस रिश्ते से उसको बेटी की किस्मत बदल जाए.

उमेश बाबू के घर पहली ही बैठक में अभिनव के पिता ने मुस्कुराते हुए कहा—
“ देखो उमेश बाबू, हम दहेज वगैरह कुछ नहीं लेते… बस आपसे थोड़ी-सी मदद की उमीद है जैसे इन बच्चों के लिए एक बड़ी कार, 4 बीएचके का फ्लैट और शादी का सारा खर्च."

यह सब सुनकर उमेश बाबू चुप हो गये. इन्होंने क्या सोचा था और क्या हो गया. उनको अपने आप शर्मिंदगी महसूस हुई.

माधवी दरवाजे की ओट से ये सब सुन रही थी, उसे क्रोध भी आया लेकिन उसने शालीनता बनाए रखी और बाहर आकर बोली
“मेरी योग्यता और मेरे संस्कार आपकी दहेज की मांग से ज्यादा मूल्यवान हैं. मुझे यह रिश्ता नापसंद है, आप जा सकते हैं"

अनुभव को यह उम्मीद नहीं थी. उसको ये बात चुभ गई. पहली दफ़ा एक गरीब लड़की ने उसे ना कहा. वो भी एक अमीरजादे लड़के को. उसका ख़ून खौल उठा पर कुछ कर नहीं सकता था. बाप पर भी दहेज की बात पर गुस्सा आया.

कुछ समय बाद माधवी ने एक बड़े निजी स्कूल में नौकरी जॉइन कर ली. वह बच्चों को पढ़ाती और उनको ऊंचे सपनो के साथ उन्हें आत्मसम्मान की रक्षा और बराबरी की भी शिक्षा देती थी.

उसे यह भी मालूम चल चुका था कि अभिनव ने किसी धनवान लड़की से शादी कर ली. भारी दहेज, बड़ी कर, बड़ा घर, आये दिन बड़ी बड़ी पार्टियां और दिखावे की व्यस्त ज़िंदगी.

कुछ ही महीनों में रिश्तों की दरारें आने लगीं. उसकी पत्नी हर समय उस पर रोब जमा के रखती थी अपनी हैसियत उसे जातलाती रहती थी.. अभिनव को अब समझ आ गया था की जहाँ पैसों से सौदा होता है, वहाँ अपनापन, प्यार और रिश्ता नहीं टिकता है.

कई सालों के बाद, माधवी अब स्कूल की प्रिंसिपल बन चुकी थी. उसके स्कूल के वार्षिक समारोह में अभिनव और माधवी का आमना सामना हुआ. अभिनव मंच का सभापति था.  

स्कूल की प्रिंसिपल होने के नाती माधवी का मंच पर भाषण था. नंदिनी नंदिनी बोल रही थी
“दहेज गरीबी की नहीं, हमारे सोच की बीमारी है, हमे अपनी सोच बदलनी चाहिए”
"दहेज एक कोढ़ है जिसके कारण कई लड़कियां अविवाहित रहती हैं या शादी के बाद जला दी जाती है"

माधवी की हर बात उसके दिल पर हथौड़े की तरह पड़ रही थी ओर माधवी बोले जा रही थी. अभिनव सिर झुकाए बैठा था. तालियों की गड़गड़ाहट दूर दूर तक गूंज रही थी...











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