कविता : सिवाय तुम्हारे


कविता : सिवा तुम्हारे 

कुछ नहीं बदला
घर भी वही है
बालकनी भी वही है
सिवा तुम्हारे...

वही सुबह है
वही कुर्सियां है
खिड़की से झांकती 
सुबहें भी वही हैं..
सिवा तुम्हारे....

मैं भी वही हूँ
कमरे से दिखता
नजारा भी वही है
सिवा तुम्हारे...

बस बदल गई हैं
कुछ तस्वीरें
हमारे घर में
सिवा तुम्हारे..

तुम्हारी तस्वीरें 
अवशेष हैं उन यादों की
जिन्हें देख देख कर
हम फिर से जी लेते हैं...






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