कहानी : पुस्तक प्रेमी


पुस्तक प्रेमी...

शहर की सबसे पुरानी और व्यस्थ रहने वाली लाइब्रेरी आजकल सुनसान नजर आने लगी थी.. कभी यहाँ बच्चों की मुस्कुराहट देखी जाती थी.. विद्यार्थी नोट्स बनाते थे और बुज़ुर्ग अख़बार व पत्रिकाओं मे ऐसे खोए रहते थे मानो सबको पढ़ने का नशा लग गया हो...

लाइब्रेरियन कामता प्रसाद अब रोजाना इन किताबों को देखते रहते थे... सोचते थे अब इन्हें कोई नहीं पढ़ने आयेगा...

शाम को घर जाते हुए कामता नाथ ने दुखी होकर किताबों से कहा..
“ये इंटरनेट का जमाना है.. तुम्हें पढ़ने वाला अब कोई नहीं आने वाला" 

कामता प्रसाद लाइब्रेरी बंद करने वाले थे कि एक नवयुवक हांफता हुआ बोला...
"अंकल ये लाइब्रेरी कल कितने बजे खुलेगी.. मुझे कुछ किताबें यहां बैठकर पढ़नी हैं "
कामता प्रसाद उस युवक की तरफ देख रहे थे.. और आश्चर्य से बोले 
"तुम किताबें पढ़ोगे वो भी यहाँ लाइब्रेरी में बैठ कर "

“हां अंकल.. टैब और लैपटॉप में पढ़ने में मज़ा नहीं आता… किताब की खुशबू ही अलग होती है, जो मुझे किताब खत्म होने तक बांधे रखती हैं ”

"ठीक है बेटा ... कल प्रातः 10 बजे आ जाना.., इस लाइब्रेरी में तुम्हारा स्वागत रहेगा." 

कामता प्रसाद ने अलमारी की तरफ देखा... किताबें चुपचाप मुस्कुराने लगीं थी... मानो कह रही हों... दुनिया चाहे कितनी भी डिजिटल हो जाए, कुछ पाठक आज भी इन किताबों के लिए जिंदा मिलेंगे...

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