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कहानी: पूनम का चाँद




कहानी: पूनम का चाँद

लोकेश की आँखों में आँसू चमक रहे थे.. उसने आकाश की ओर देखा... आज पूनम का चाँद कुछ अलग सा था, संपूर्ण, उजला और निर्विकार जैसे उसे दीन दुनिया से कोई सरोकार न हो. आँगन में दूधिया रोशनी फैल रही थी, मगर लोकेश के भीतर अँधेरा गहराता चला जा रहा था... उसे कुछ सूझ नहीं रहा था. उसकी पत्नी इस दुनियां को अलविदा कह चुकी थी.

अस्पताल की सफ़ेद दीवारें और चादरें उसकी आँखों में चुभ रहीं थीं.. मशीनों की आवाज़, डॉक्टरों की औपचारिक बातें, लापरवाह नर्सिंग स्टाफ, पीला होता उसका चेहरा और उसकी ठंडी होती उसकी हथेली... सब कुछ उसको धीरे धीरे फिल्मी सीन की तरह नज़र आ रहा था... 

उसने महसूस किया ... सफेद चादर में लिपटी उसकी पत्नि मानो कह रही हो...
“लोकेश प्लीज रोना मत, ये मौत किसी की सगी नहीं होती.... क्या पता कब किसका साथ छोड़ दे”  
लोकेश रोया तो नहीं… लेकिन आंसुओं को छिपा भी नहीं पाया... लोग आते गये ... समझाते गये. कुछ मौन रूप से सहानुभूति जताते गये.. कुछ तो ज्ञान भी बांट गये “रोने से कोई फायदा नहीं.. ये समय है... सब ठीक कर देगा.. धैर्य रखना” उन नादानों को क्या मालूम समय क्या जानता है और वो क्या ठीक करेगा.. क्या बीता वक्त लौट के आयेगा???

लोकेश ने फिर चांद की तरफ देखा... रातों का राजा पूनम का चाँद, उसे अब बैरी लगने लगा था...