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कहां हो प्रिये

कहां हो प्रिये ??

मैं यहीं हूँ 
तुम्हारे पास प्रिय 
एक जगह नहीं,
तुम्हारे भीतर फैले मौन में.

तुम्हारी सुबह की 
पहली रोशनी में,
जो तुम्हारे मन को 
रोशन करती है..

चलते चलते 
जब तुम थक जाते हो
मैं पेड़ की छांव बन जाती हूं.

रात को
आकाश देखना
मैं पूनम का चांद बन
तुम्हे देखती हूं.

मैं हर पल वहीं हूँ
जब तुम कुछ कहना चाहते हो
होंठ चुप रह जाते हैं
मैं सब समझ जाती हूं.

मैं दूर नहीं हूं
पर सामने भी नहीं
तुम्हारे दिल में रहती हूं 
तुम्हे खबर भी नहीं होती
हर कदम तुम्हे थामे रखती हूं.

प्रिय 
जब भी ढूंढोगे मुझको
अपने दिल में झांकना
मैं हमेशा वहीं रहती हूं...


मेरा चांद मुझे लौटा दो


मेरा चाँद मुझे लौटा दो

काली स्याह रातों में 
कोई सपनों-सा उतर आया है
मेरे बालकनी की खामोशी में
कोई उजाला भरने आया है...

वही हँसी, 
वही नज़र, 
वही सुकून
उसकी दुआओं का साक्षी 
आज भी चमकता है
वो करवा चौथ का चांद....

सोचता हूं 
किसने छीना होगा 
मेरा पूनम का चमकता चाँद
कोई मेरे हिस्स का 
वो चांद मुझे लौटा दो....


विरह की मधुशाला


विरह की मधुशाला

सूना साकी, 
सूना प्याला, 
सूनी ये महफिल
कोई छीन ले गया
खुशियां मेरी
सज गई मेरी मधुशाला...

मेरे घर में 
कभी छनकती थी चूड़ियां 
मुस्कुराहटें
आज विरह में जलाती है
मेरी मधुशाला.

साँझ ढलती है
बालकनी में मेरे
यादों की लालिमा बिखर आती है
यादों की घटाएँ छा जाती हैं,
सज जाती हैं मधुशाला...

तेरी ही बातें, 
तेरी ही यादें, 
मदिरा बन 
हलक से उतर जाती हैं.
ढूंढें फिर मधुशाला..

कैसे पियूं अमृत
जब आसूं हो हिस्से में 
मैं पीता हूं भर भर जाम
मदहोश कर देती है
मेरी मधुशाला..

मेज पर सजी 
श्रृंगार किए तस्वीर तुम्हारी
चमक रही बिंदिया 
ले लेती है मेरी निंदिया
ढूंढें मन की ज्वाला
कहां है मधुशाला....

हर जाम में 
दिखती है  मूरत तुम्हारी 
फिर क्यों याद आए तुम
यादों, सिसकियों में सजती है
मेरी ये मधुशाला....

वो कहते हैं
ग़म भुलाती है मदिरा
मैं कहता हूं 
यादें गहरी करती है मदिरा
कोई ये तो बताए 
कहां है मेरी मधुशाला..

किस किस को बताऊं 
विरह का नशा 
पल-पल हमें रुलाता है,
तुम क्या जानो बाबू
विरह में ही काम आती है
ये मेरी मधुशाला...

कविता : गणतंत्र दिवस


गणतंत्र दिवस.....

लहराता है तिरंगा 
हर गली चौराहे पर
कोई बैठा है, 
भूखे पेट
झंडे की छांव...

ओ संविधान की
कसमें खाने वालो
ग़रीब को रोटी 
पहुंचाने की भी
कसमें खा लो...

काग़ज़ों में अधिकार लिखे हैं 
भाषणों ने सपने पाले हैं,
आज भी किसी की 
रातभर झुग्गी टपकती है,
कोई रेन बसेरों में सोता है
बच्चे भूखे सोते हैं
और 
किसी को नर्म गद्दों में भी
नींद नहीं आती 

वोट की कीमत 
समझी जाती है
रोटी की कीमत 
कौन समझाए.....

गणतंत्र तो आता है
हर साल
हर पाँच साल,
गरीबी कैसे हटेगी
ये कौन समझाए....

उम्मीदें आज भी जिंदा है
एक दिन गणतंत्र 
और भी चमकेगा
फिर कोई भी
भूख से नहीं सोएगा...

जय हिंद
अमर रहे गणतंत्र हमारा




शीशे का शहर


ये शहर : शीशे का 

वो जमाना लद गया
जब ईंट गारे से
घर बना करते थे
अब तो चारों तरफ
शीशे से बनी स्क्रीन ही स्क्रीन 
नजर आती है.

मैं अब 
शहर का नागरिक हूं
जेब में स्मार्टफोन,
कलाई में स्मार्टवॉच,
और दिल में अजीब-सी 
ख़ामोशी रखता हूं.

अब सुबहों को अलार्म नहीं, 
मोबाइल जगाता है
सब ऑनलाइन रहते हैं
कोई शोर नहीं होता
नोटिफिकेशन सब याद दिलाते है..

मैने एक दिन सोचा
गाँव में चलते हैं
ये क्या , यहां भी
गांव शहर हो गया
पुराने मकान पक्के 
खिड़की दरवाजे 
शीशे के हो गए

फिर एक दिन 
मोबाइल अचानक बंद हो गया
बैटरी खत्म हो गई
मैं घबरा गया
जैसे रुक गई हो सांसें..

सोचा खिड़की के बाहर झांकूँ 
पेड़ अब भी हरे भरे हैं,
आसमान अब भी नीला है,
कुछ लोग अब भी इंसान हैं,

ओह
मोबाइल फिर से चल पड़ा,
मैं सपनों से बाहर निकला
खो गया फिर से 
उन शीशे की दीवारों के पीछे

शहर वही है
मैं भी वही हूं
बस जिंदगी
शीशे के पीछे 
धकेल दी गई है...



मेरी मधुशाला


मैं और मेरी मधुशाला

मेरी मधुशाला 
कोई शराबखाना तो नहीं 
ना कोई कैद है
मेरे मन का वो कोना है
जहाँ मेरे भावों का
भावनाओं का आईना है.

मैं यहाँ शराब
बोतलों में नहीं भरता,
ये वो यादें हैं, जो जाम बनकर
छलकती रहती है
फिर दिल में उतर जाती हैं...

कभी,  
हँसी से छलकते थे
खुशी के जाम, उनको साथ लिए
मधुशाला सी जिंदगी में 
कई तैरते हुए 
सपनों के जाम पिए हुए..

अब कौनसा जाम उठाऊं
बुझे बुझे से शब्दों का 
कविताओ ने पी लिया है
जहर मेरे जज्बात का...

कभी मधुशाला थी जिंदगी
प्रेम था नशा
बिन शराब के 
आज विरह ने रंग दिखाया है
उन रंगीन प्यालों का.

जिसे समझा था 
अमृत मैं
वही यादों का 
नशा बन गया...

यहाँ आँसू भी नशा है
हम फिर भी पिये जाते हैं,
किसी की याद में 
जी को जलाते हैं
हम बन गये शराबी 
अब तो मधुशाला में ही 
दीप जलते हैं...

ना कोई नियम, 
ना कोई पहरा,
अब कोई नहीं पूछता 
मेरा नाम पता
सबको मालूम है
महखाना ही है 
मेरा असली पता..

दिन छोटा सा
ऊंघता रहता है
और ये लंबी रातें 
जागती रहती हैं
नशे में करती रहती हैं
इंतजार उनका...

ये मेरी मधुशाला है
यादों वादों की
इसका कोई समय नहीं होता
जब प्यास लगे 
जाम छलक ही जाता है
आँखें में या प्यालों में...

यह वो नशा नहीं है दोस्त
जिसको सब को तलब होती है
ये तो किसी की याद का 
पैमाना होता है...

एक दिन जिंदगी की 
ये बोतल भी टूट जायेगी
देह पहचान सब छूट जाएगा,
मेरी यादों की मधुशाला रहेगी
उसमें एक नाम और जुड़ जाएगा...



My beloved wife


मेरी स्वर्गीय पत्नी के नाम

इस घर की खामोशी में 
आज भी तुम 
चहकती नजर आती हो
घर के हर कोने में 
तुम्हारी ही हँसी गूंजती है...

रसोई से खुशबू, 
आँगन की धूप 
तुम्हारी वजह से ही
अच्छी लगती थी....

साथ नहीं हो, 
फिर भी साथ हो 
मेरी हर साँस में 
आबाद हो 
दुख में ढाल हो
सुख में उजाला बनकर,
आज भी मेरे करीब हो

तुम दूर चली तो गईं हो
पर छोड़ा नहीं तुमको मैने 
तुम्हे थाम के रखा है
ढेर सारी यादों में...

तुम जहां भी हो
स्वर्ग में हो या देव लोक में 
आज भी मेरी प्रार्थनाओं में हो
देह से दूर, मेरी आत्मा में हो
तुम्हीं तो मेरे जीवन की
कविता हो, भावना हो
दूर हो फिर भी करीब हो...



My beloved wife

मेरी पत्नी के लिए...

तुम्हारी मुस्कान
आज भी मेरी सुबह है
और शाम भी.

तुम्हारी 
गहन खामोशी 
हर शाम 
मौन होकर बोलती है.

तुम चली तो गईं हो
पर स्नेह के बंधन
यहीं छोड़ गई हो
जो बस गई है
मेरी रूह में 
मेरी साँसों में,
मेरी दुआओं में..

क्या कहूं 
तुम्हारे बिना ये घर
एक कमरा बन गया है
और मेरा जीवन
एक कविता
और एक
अधूरी सी कहानी.

मेरे हर शब्द में
इन सांसों में 
यादों में 
तुम ही तो हो..




यादों की बारिश

यादों की बारिश

सुनसान रातों के
रात के सन्नाटे में 
तारों की बारात
और यादों की बारिश 

हँसी की शहनाई,
आँसुओं की ढोलक,
कुछ पल रुठे हुए,
बाहों में सिमटे हैं

पुराने खुशबू वाले खत,
कुछ ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें 
अधूरे सपनों की पोटली,
वक़्त की गठरी में  बंधे लम्हे 
कभी बूढ़े नहीं होते

रात के सन्नाटों में 
जब दिल का दरवाज़ा खुलता है
फिर से यादों की बारात
चुपचाप भीतर तक 
उतर आती है.....


My beloved wife

रात और यादें...

बालकनी की रेलिंग से
रात के गहन अंधकार में 
कुछ अधूरे ख़्वाब नजर आए 

ये रात का साया 
रोशनी से नहाया ये शहर
दूर तक चमकता रहता है

आँखों में थकी रोशनी,
और खामोश हवा कहती है
सब तो ठीक है, 
बस थोड़ी सी 
आंखों में नमी है

मेरे दिल में 
गहन अंधेरा है
मेरा खोया नूर अब
कहीं तारा बन के चमकता है
मैं यादों में सिसकता हूं.

यह रात 
मेरे कान में धीरे से फुसफुसाई 
जीना भी एक कला है, 
तू बस जीने का तरीका देख





My beloved wife


चैन नहीं किताबों में....

नहीं मिलता चैन, किताबों में
जब से आई हो तुम, मीठे ख्यालों में

हर लफ़्ज़ में, बस तेरा ही असर है,
खो गया हूँ मैं तो, तेरे ख़यालों में

नींद भी अब,  रुठी हुई है 
ये रात नहीं कटती है,
उलझ जाती है, बस यादों में 
या उलझे सवालों में

आईना भी पूछता है, 
अब हाल मेरा 
जब में दिखता हूँ 
उसको टूटे ख़्वाबों में

लोग कहते हैं,  वक़्त मरहम है,
ज़ख़्म गहरे हैं तेरे , 
अब भी यादों में


My beloved wife

तुम्हारी खूबसूरत यादें और ये धुंध....

आज धुंध उतरी है 
चुपचाप मेरे शहर की राहों पर,
मैंने भी ओढ़ ली है
सपनों की चादर.

जो दिखा नहीं, 
वही पास लगा
ख़ामोशी ने आज फिर 
मुझसे बात की है..

शुभ प्रातः मित्रों 
आज का दिन मंगलमय हो 

gkkidiary.blogspot.com

My beloved wife


यादों के पंख....

मेरी आंखों के सामने 
उनको जला दिया गया 
वो एक आत्मीय पहचान 
अब धुएँ में बदल गई थी
और मैं इसी जमीं पर रह गया
इन भीगी हुई आंखों में 
एक गहरा सन्नाटा लिए हुए .

राख बन गया 
उनका शरीर,
मेरे भीतर अब भी
बहुत कुछ जल रहा है
जो सोने नहीं देता
उसकी आवाज़ आती है.

वो तो चली गई है
बहुत दूर इस देह से भी परे
इतनी दूर जहाँ 
मेरे शब्द नहीं पहुँचते,

अब तो यादें भी खामोश हैं
और ये खामोशी एक संवाद 
समय की राख टटोलता हुआ
मैं एक बुझा सा इंसान
और वो अनंत की गोद में 
चिर लीन विलीन.






My beloved wife


कोरा काग़ज़ 

ये जीवन मेरा 
कोरा काग़ज़ सा
जो भी लिखा 
मिटता चला गया

कुछ सपने स्याही बनकर 
कागज पर उतारे थे 
कोई उन सपनों को 
उड़ा ले गया.

लिखी थी कभी 
धूप में कुछ सुनहरी पंक्तियाँ,
बारिश के धब्बों ने
सब धो दिया.

इस जिंदगी के
कोरे पन्नों की किताब का
मैं ही लेखक हूं
मैं ही पाठक हूं

क्या करूं 
गलतियाँ से सीखता हूं
फिर भी गलती करता हूं
कल भी कोरा कागज था
आज भी कोरा कागज ही हूं.






कविताएं


बारिशों का मौसम..........

ये बारिशों का मौसम है
लफ्जों में पिरो दूँ तुम्हें, 
या एहसासों में रहने दूँ. ... 
साँसो में बहने दूँ तुम्हें, 
या फ़िजाओ में बिखेर दूँ... ....
पलकों में छुपा लूँ तुम्हें, 
या रूह में बसा लूँ... ....
 इस बारिश के मौसम में, 
तुम्हे क्या सज़ा दूँ,...


ये शाम मस्तानी.....

कभी शाम को मिलो 
अदरक वाली चाय पीयेंगे 
हम अपने "मन की बात" कहेंगे
तुम कोई किस्सा सुनाना
इसी तरह ये शाम गुजारेंगे..


ओल्ड मोंक और मैं.....

Old Monk Has Followers... 
Not Fans
🙂🙂🙂
Two monks together
Follower of each other....
दो संन्यासी, साथ साथ
एक दूसरे का थामें हाथ....
😀😀😀😀

हिन्दी दिवस


हिंदी दिवस...

आज 14 सितंबर है इस दिन को हम हिंदी दिवस के रूप में मनाते आ रहे हैं. लेकिन हिंदी को जो सम्मान मिलना चाहिए वो आज भी नहीं मिल पाया है और इसके लिए सरकार के साथ हम सब भी जिम्मेदार हैं.

हर वर्ष भाषण होते है, घोषणाएं होती है और फिर वही पुराना हाल. हमारे देश में घोषणाएं तो तेजी से होती हैं लेकिन उनपर अमल नहीं होता है आज भी भारत में अंग्रेजी हिंदी पर हावी रहती है. हमारे नेता लोग, लेखक, शिक्षक, उपन्यासकार, साहित्यकार और विभिन्न राज्यों के लोग अंग्रेजियत अपनाने लगे हैं और इसे अपनी शान भी समझते है. बड़ी हंसी आती है जब हिंदी भाषी हिंदी को भी अंग्रेजी स्टाइल से बोलते हैं जैसे अभी अभी भारत में प्रवेश किया हो.

हिंदी को प्रभावी बनाने के लिए सरकार को हर राज्य में हिंदी विश्वविद्यालय खोलने चाहिए और प्रकाशन विभाग को हिंदी में सस्ता साहित्य उपलब्ध कराना चाहिए. विदेशी साहित्यों का अनुवाद भी उपलब्ध कराना चाहिए. हिंदी काव्य पाठ और हिंदी लेखकों का सम्मान करना चाहिए. सरकारी कार्यालयों, बैंकों और निजी क्षेत्रों में हिन्दी को प्रोत्साहन देना चाहिए. हिन्दी पत्र पत्रिकाएं जो धीरे धीरे लुप्त हो रहीं है इनको वित्तीय सहायता देकर दुबारा चलाना चाहिए. सरकारी पत्रिकाओं का हिंदी संस्करण का प्रचार प्रसार करना चाहिए. हिंदी लेखन, इबुक्स, पीडीएफ बुक्स और पठन सामग्री के सॉफ्टवेयर बनाने चाहिए और उनका प्रचार प्रसार करना चाहिए.

कुछ भी हो लेकिन मुझे तो मेरी मातृभाषा सबसे महान लगती है और में अपने ब्लॉग, लेखों और कविताओं में हिंदी को ज्यादा महत्व देता हूं. मेरी हिंदी मेरी मात्रभाषा ही नहीं मेरी भावनाओं को व्यक्त करने का माध्यम भी है.

आओ हिंदी अपनाएं.........

भारत के माथे की शान है हिन्दी
भावनाओं से भरी अनूठी है हिंदी
तुम भी पढ़ो हम भी पढ़ें हमारी हिंदी
हम सबको साथ लेकर चलती है हिन्दी
पंत, तुलसी, कबीर को भी थी प्यारी हिंदी
किसी भी भाषा की बैरी नहीं है ये हिंदी
बल्कि सभी को सीखने बुलाती हिंदी
मुझे तो प्यारी लगती है मेरी प्यारी हिंदी
यही तो है भारत माता के माथे की बिंदी
हे मातृभाषा सदा आपकी जय हो जय हो...