शिक्षित बहू
चौबेपुर गाँव में पंडित हरि नारायण शर्मा का परिवार अपनी परंपराओं और संस्कारों के लिए जाना पहचाना जाता था. वैसे तो घर के मुखिया पंडित हरि नारायण शर्मा पुराने विचारों के थे. वो ऐसा मानते थे कि बहू जितनी कम पढ़ी-लिखी हो, उतनी ही आज्ञाकारी, संस्कारी और ग्रह कार्य में दक्ष होती है.
लेकिन फिर भी कुछ सोचकर उन्होंने अपने बेटे रोमेश की शादी शहर की पढ़ी-लिखी, साधारण परिवार में पली निधि नाम की लड़की से करा दी. निधि अच्छे अंकों से बी एस सी., बी.एड. पास थी.
रोमेश की शादी साधारण रीति रिवाज के साथ हो गई. बहु घर भी आ गई. बहू के घर आते ही गांव के लोगों के बीच कानाफूसी भी शुरू हो गई.
"अरे इतनी पढ़ी-लिखी बहू, घर कैसे संभालेगी? पंडितजी ने ये क्या कर किया ?”
“ पढ़ी लिखी है अगर कहीं नौकरी की ज़िद पकड़ ली तो पंडित जी के संस्कारों का क्या होगा”
कुछ चटकारे ले रहे थे कुछ चिंता में थे तो कुछ थे सोच रहे थे,
"छोड़ो यार... हमे क्या लेना देना, पंडित जी जाने और उनका परिवार"
निधि के कानों तक भी ये बात पहुंची, वो जानकर अनजान बनी रही और अपना काम सुरुचिपूर्ण तरीके से करती रही जैसे सुबह सबसे पहले उठकर पूजा, रसोई और सास-ससुर की सेवा. वह सब काम पूरे मन से करती थी. यहां तक कि वह घर परिवार के बच्चों को पढ़ाती भी थी, सास की दवाइयों को समय पर खिलाना याद रखती थी और यहां तक कि घर के खर्चों का हिसाब भी समझदारी से संभालती थी. पंडित जी ऐसी बहू पाकर फूले नहीं समाते थे.
एक दिन अचानक निधि की सास की तबीयत बिगड़ गई. गाँव में डॉक्टर नहीं था. निधि ने बिना घबराए और समय गवाएं प्राथमिक उपचार कर किया, एम्बुलेंस बुलवाई गई और समय रहते सास की जान बच गई. डॉक्टर ने बोला
“अगर थोड़ी देर हो जाती, तो हालात बिगड़ सकते थे लेकिन अब घबराने की कोई बात नहीं है ”
पहली बार पंडित जी को लगा कि पढ़ाई कितनी जरूरी है और उनका लिया हुआ निर्णय कितना सही रहा.
कुछ दिनों के बाद निधि की सास के पूर्ण रूप से ठीक हो गई , निधि ने सास ससुर से अनुमति लेकर गाँव की लड़कियों के लिए शाम की पाठशाला शुरू कर दी. धीरे धीरे वही लोग, जो कानाफूसी करते थे, अपनी बेटियों को निधि के पास पढ़ने भेजने लगे.
एक दिन भरी पंचायत में हरि नारायण शर्मा गर्व से बोले
“मुझे गर्व है ; हमारी बहू पर और आज , मैं ये मानता हूं की पढ़ाई संस्कारों की दुश्मन नहीं होती बल्कि उनकी साथी होती है"
दूर खड़ी निधि यह सब सुनकर मुस्कुरा रही थी मानो कह रही हो पढ़ी लिखी सुसंस्कृत बहू घर तोड़ती नहीं है, उसे और भी मज़बूत बनाती है.

