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एक जाम शाम के नाम


कविता : एक जाम शाम के नाम

जब भी शाम ढलती है
घर में ख़ामोशी सी छा जाती है
शराब के हर जाम में
यादों की परछाईंयां उतर आती हैं...

एक घूंट में 
बीता कल याद आता है,
दूसरे में अधूरी बातें 
हर जाम में याद आती है
बीते हुए लम्हों की बातें.

ये शाम, जब भी 
ओढ़ लेती है तन्हाई,
होंठों तक आती है हँसी,
और आँखों में दर्द बहक जाता है

खिड़की के बाहर
कांपती सर्द रातों मे 
दिल उनकी याद में 
नम आंखे लिए कहता है
अब तो हाथ में 
शराब का जाम हो
बस मैं रहूं या मेरा खुदा 
गवाह रहे.....