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एक जाम शाम के नाम


कविता : एक जाम शाम के नाम

जब भी शाम ढलती है
घर में ख़ामोशी सी छा जाती है
शराब के हर जाम में
यादों की परछाईंयां उतर आती हैं...

एक घूंट में 
बीता कल याद आता है,
दूसरे में अधूरी बातें 
हर जाम में याद आती है
बीते हुए लम्हों की बातें.

ये शाम, जब भी 
ओढ़ लेती है तन्हाई,
होंठों तक आती है हँसी,
और आँखों में दर्द बहक जाता है

खिड़की के बाहर
कांपती सर्द रातों मे 
दिल उनकी याद में 
नम आंखे लिए कहता है
अब तो हाथ में 
शराब का जाम हो
बस मैं रहूं या मेरा खुदा 
गवाह रहे.....


My beloved wife


मेरी स्वर्गीय पत्नी के नाम

इस घर की खामोशी में 
आज भी तुम 
चहकती नजर आती हो
घर के हर कोने में 
तुम्हारी ही हँसी गूंजती है...

रसोई से खुशबू, 
आँगन की धूप 
तुम्हारी वजह से ही
अच्छी लगती थी....

साथ नहीं हो, 
फिर भी साथ हो 
मेरी हर साँस में 
आबाद हो 
दुख में ढाल हो
सुख में उजाला बनकर,
आज भी मेरे करीब हो

तुम दूर चली तो गईं हो
पर छोड़ा नहीं तुमको मैने 
तुम्हे थाम के रखा है
ढेर सारी यादों में...

तुम जहां भी हो
स्वर्ग में हो या देव लोक में 
आज भी मेरी प्रार्थनाओं में हो
देह से दूर, मेरी आत्मा में हो
तुम्हीं तो मेरे जीवन की
कविता हो, भावना हो
दूर हो फिर भी करीब हो...



My beloved wife


चैन नहीं किताबों में....

नहीं मिलता चैन, किताबों में
जब से आई हो तुम, मीठे ख्यालों में

हर लफ़्ज़ में, बस तेरा ही असर है,
खो गया हूँ मैं तो, तेरे ख़यालों में

नींद भी अब,  रुठी हुई है 
ये रात नहीं कटती है,
उलझ जाती है, बस यादों में 
या उलझे सवालों में

आईना भी पूछता है, 
अब हाल मेरा 
जब में दिखता हूँ 
उसको टूटे ख़्वाबों में

लोग कहते हैं,  वक़्त मरहम है,
ज़ख़्म गहरे हैं तेरे , 
अब भी यादों में


My beloved wife


यादों के पंख....

मेरी आंखों के सामने 
उनको जला दिया गया 
वो एक आत्मीय पहचान 
अब धुएँ में बदल गई थी
और मैं इसी जमीं पर रह गया
इन भीगी हुई आंखों में 
एक गहरा सन्नाटा लिए हुए .

राख बन गया 
उनका शरीर,
मेरे भीतर अब भी
बहुत कुछ जल रहा है
जो सोने नहीं देता
उसकी आवाज़ आती है.

वो तो चली गई है
बहुत दूर इस देह से भी परे
इतनी दूर जहाँ 
मेरे शब्द नहीं पहुँचते,

अब तो यादें भी खामोश हैं
और ये खामोशी एक संवाद 
समय की राख टटोलता हुआ
मैं एक बुझा सा इंसान
और वो अनंत की गोद में 
चिर लीन विलीन.






वरिष्ठ नागरिकों के लिये

प्रिय वरिष्ठ नागरिकों 

खासकर उनके लिए जिनका जन्म 1960, 1961, 1962, 1963, 1964, 1965, 1966, 1967, 1968, 1969, 1970, 1971, 1972, 1973, 1974, 1975, 1976, 1977, 1978, 1979, 1980 में हुआ है, अर्थात यह वो पीढ़ी है जो अब 45 से ऊपर की ओर बढ़ रही है.

जैसा कि आपको मालूम होगा इस पीढ़ी की सबसे बड़ी सफलता यह है कि इसने ज़िंदगी में बहुत से बड़े बड़े बदलाव देखे और उन्हें आत्मसात भी किया है.

1, 2, 5, 10, 20, 25, 50 पैसे देखने वाली यह पीढ़ी इन पैसों का महत्व समझती थी और बिना झिझक के मेहमानों से पैसे ले भी लिया करती थी.

कलम और स्याही से लेकर पेन पेंसिल तक और उसके बाद आज यह पीढ़ी स्मार्टफोन, लैपटॉप, पीसी को भी बखूबी चला रही है.

जिनके लिए बचपन में साइकिल भी एक विलासिता थी, वही पीढ़ी आज बखूबी स्कूटर, बाइक और कार चला रही है.

ये वो पीढ़ी है जो कभी चंचल तो कभी गंभीर लेकिन संस्कारों में पली है

टेप रिकॉर्डर, पॉकेट ट्रांजिस्टर, ये सब कभी बड़ी कमाई का प्रतीक थे. रेडियो और टीवी के आने से जिनका बचपन बरबाद नहीं हुआ, वही पीढ़ी है ये.

कुकर की रिंग्स से रिंग बॉल और टायर से “गाड़ी–गाड़ी खेलना” इन्हें कभी छोटा नहीं लगता था. कपड़े की गेंद से बहुत खेले हैं.

“सलाई को ज़मीन में गाड़ते जाना” – यह भी उस जमाने का खेल था और मज़ेदार भी.

“कैरी (कच्चे आम) तोड़ना” इनके लिए चोरी नहीं था.

किसी भी वक्त किसी के भी घर की कुंडी खटखटाना गलत नहीं माना जाता था.

“दोस्त की माँ ने खाना खिला दिया” – इसमें कोई उपकार का भाव नहीं, और “उसके पिताजी ने डांटा” तो इसमें कोई ईर्ष्या भी नहीं होती थी.… 

घर के पास दोस्तों की या स्कूल मके दोस्तों की बहन को अपनी ही बहन समझा जाता था. 

दो दिन अगर कोई दोस्त स्कूल न आया तो स्कूल छूटते ही बस्ता लेकर उसके घर पहुँच जाते थे.

किसी भी दोस्त के पिताजी स्कूल में आ जाएँ तो मित्र कहीं भी खेल रहा हो, दौड़ते हुए जाकर खबर देना:
“तेरे पापा आ गए हैं, चल जल्दी” – यही उस समय की ब्रेकिंग न्यूज़ हुआ करती थी.

मोहल्ले में किसी भी घर में कोई कार्यक्रम हो तो बिना संकोच के काम कर दिया करते थे.

कपिल, सुनील गावस्कर, वेंकट, प्रसन्ना की गेंदबाज़ी देखी, स्टेफी ग्राफ, अगासी का टेनिस देखा, राज, दिलीप, धर्मेंद्र, जितेंद्र, अमिताभ, राजेश खन्ना, आमिर, सलमान, शाहरुख, माधुरी और इन पर फिदा रहना. कापी को गानों और फिल्मी नामों से भर देना.

पैसे मिलाकर भाड़े पर VCR लाकर 4–5 फिल्में एक साथ देखना.

“शिक्षक से पिटना” इसमें कोई बुराई नहीं थी, बस डर यह रहता था कि घरवालों को न पता चले, वरना वहाँ भी पिटाई होगी और शिक्षक से ऊंची आवाज में बात नहीं करने वाली और उनका आदर करना, उन्हें प्रणाम करना.

कॉलेज में छुट्टी हो तो यादों में सपने बुनने वाली पीढ़ी और बिना मोबाइल, SMS, व्हाट्सऐप के रहना, केवल मिलने की आतुर प्रतीक्षा करना.

पंकज उधास की ग़ज़ल “तूने पैसा बहुत कमाया, इस पैसे ने देश छुड़ाया” सुनकर भावुकता से आँखें पोंछना 

लिव–इन तो छोड़िए, लव मैरिज भी बहुत बड़ा “डेरिंग” समझना और कॉलेज में लड़कियों से बात करने वाले लड़के भी एडवांस कहलाते थे.

दोस्तों गुज़रे दिन तो नहीं आते, लेकिन यादें हमेशा साथ रहती हैं और उन यादों को सुनहरी यादें समझना.

अपना भी वो ज़माना था जब प्ले स्कूल जैसा कोई कॉन्सेप्ट ही नहीं था बस सीधे 6–7 साल पूरे होते ही सीधे स्कूल भेज दिया जाता था.

पैदल, साइकिल से या बस से भेजने पर  चाहे बच्चे अकेले स्कूल जाएँ या दोस्तों के साथ, इससे कोई अनहोनी होगी ऐसा डर माता–पिता को कभी नहीं होता था. उस समय हम दो हमारे दो का कांसेप्ट ही नहीं था.

पास/फेल यही सब चलता था और प्रतिशत (%) से हमारा कोई वास्ता नहीं होता था. उस जमाने में ट्यूशन लगाना शर्मनाक माना जाता था क्योंकि यह कमजोर बच्चों की निशानी होती थी.

किताब में पत्तियाँ और मोरपंख रखकर पढ़ाई में तेज हो जाएँगे यह हमारा दृढ़ विश्वास होता था.

कपड़े की थैली में किताबें रखकर पीठ में लादकर स्कूल जाया करते थे स्कूल की टंकी से पानी पीया करते थे.

हर साल नई कक्षा के लिए किताब कॉपी पर कवर चढ़ाते थे और नई किताबों की खुशबू का आनंद लिया करते थे.
कई बार तो साल के अंत में पुरानी किताबें बेचना और साल के शुरू में नई किताबें खरीदना होता था वो भी बिना शर्म के, पैसे जो बचते थे.

दोस्त की साइकिल के डंडे पर एक बैठता, कैरियर पर दूसरा और इधर उधर घूमन बस यही हमारी मस्ती हुआ करती थी.

स्कूल में सर से पिटाई खाना, धूप में खड़ा होना, अपनी अपनी कक्षाओं की रोल नंबरवाइज सफाई करना. टाट पट्टी पर बैठकर डेस्क पर लिखना और थैला अर्थात बस्ता डेस्क में ही रहना.

घर में स्कूल में, मार खाना तो रोज़मर्रा का हिस्सा होता था और मारने वाला और खाने वाला  दोनों ही खुश रहते थे, खाने वाला इसलिए कि “चलो, आज कल से कम पड़ा” मारने वाला इसलिए कि “आज फिर मौका मिला”

नंगे पाँव, लकड़ी की बैट और कपड़े की बॉल से
गली–गली क्रिकेट खेलना वही असली सुख होता था.

उस जमाने में पॉकेट मनी नहीं होता था और जो माता–पिता ने दिया वही बहुत होता था क्योंकि हमारी ज़रूरतें बहुत छोटी थीं जो परिवार पूरा कर देता था.

दिवाली में फ़टाकों और फुलझड़ी की लड़ी खोलकर
फोड़ना और चलाना हमें बिल्कुल भी छोटा नहीं लगता था अगर कोई और पटाखे फोड़ रहा हो तो उसके पीछे–पीछे भाग जाना यही हमारी मौज हुआ करती थी.

हमने कभी अपने माता–पिता से यह नहीं कहा कि
“हम आपसे बहुत प्यार करते हैं” क्योंकि उस जमाने में हमें “I Love You” कहना आता ही नहीं था.

आज हम जीवन में संघर्ष करते हुए इस विशाल दुनिया का एक अहम हिस्सा बने हैं. हम में से कुछ ने बहुत कुछ पाया तो कुछ संतुष्ट रहे.

हम दुनिया के किसी भी कोने में रहें लेकिन सच यह है कि हमने हकीकत में जीया और हकीकत में बड़े हुए. दुनिया देखी और समझी. औपचारिकता और बनावटी दुनिया से से दूर भी रहे.

हमने कभी अपनी किस्मत को दोष नहीं दिया क्योंकि हम मेहनत के सपनों में जीते थे और शायद वही सपने हमें जीने की ताक़त देते हैं.  हमारी पीढ़ी ने जितने बदलाव देखे उतने शायद ही कोई और  पीढ़ी देखेंगी.

ये हमारा जीवन वर्तमान से कभी तुलना नहीं कर सकता क्योंकि वो दुनियां अलग थी आज की दुनियां से बेहतर थी.

ये तो उस जमाने की बानगी है, इससे ज्यादा बहुत कुछ गुजरा है वो अच्छा भी था या सबक था. लेकिन उन पलों को याद कर आज भी चेहरे पर मुस्कान आ ही जाती है.

मित्रों आप ने और क्या क्या अनुभव किए मुझे बतलाना, अनुभव लिखना और मुझे गाइड भी करना, मैं उन्हें अगले पार्ट में अवश्य शामिल करूंगा.

जय श्री कृष्णा 

आपका मित्र
डॉ गणेश


कविताएं


बारिशों का मौसम..........

ये बारिशों का मौसम है
लफ्जों में पिरो दूँ तुम्हें, 
या एहसासों में रहने दूँ. ... 
साँसो में बहने दूँ तुम्हें, 
या फ़िजाओ में बिखेर दूँ... ....
पलकों में छुपा लूँ तुम्हें, 
या रूह में बसा लूँ... ....
 इस बारिश के मौसम में, 
तुम्हे क्या सज़ा दूँ,...


ये शाम मस्तानी.....

कभी शाम को मिलो 
अदरक वाली चाय पीयेंगे 
हम अपने "मन की बात" कहेंगे
तुम कोई किस्सा सुनाना
इसी तरह ये शाम गुजारेंगे..


ओल्ड मोंक और मैं.....

Old Monk Has Followers... 
Not Fans
🙂🙂🙂
Two monks together
Follower of each other....
दो संन्यासी, साथ साथ
एक दूसरे का थामें हाथ....
😀😀😀😀

कविताऐं

कविताऐं

एक नज़र देख लूं
उन बीते हुए लम्हो को
ए लम्हो
कुछ पल ठहरो..
🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂


आओ गीत गाएँ
आनंद लें संगीत के सात स्वरों का
संगीत तो है कृष्ण की बंसी
माँ सरस्वती का सितार
भगवान शिव जी का डमरू
आओ संगीत का आनंद लें
संगीत बिन सब सून..
🙂🙂🌞🌞🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂


तृष्णा..

आपके पास मारुति हो या बीएमडब्ल्यू -
रोड वही रहेगी.
आप इकॉनामी क्लास में सफर करे या बिज़नस में, -
आपका वक्त तो उतना ही कटेगा.
आप टाइटन पहने या रोलेक्स, -
समय वही रहेगा.
आपके पास एप्पल हो या सेमसंग - आपको कॉल लगाने वाले
लोग नहीं बदलेंगे..!
भव्य जीवन की लालसा रखने या जीने में कोई बुराई नहीं हें,
लेकिन सावधान रहे
क्योंकि जरूरते पूरी हो सकती हें,
तृष्णा ( इच्छा )नहीं..

नोट : और इसी तृष्णा को पूरी करने के लिए इंसान गलत कदम उठाने लगता है.. सादा जीवन उच्च विचार.. सुखी जीवन का आधार😊😊
साभार : फेसबुक
🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂