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कहानी : मतलबी दुनियां


मतलबी दुनियां 

नीरज के फोन में हज़ारों कॉन्टैक्ट थे, जिनमें उसके रिश्तेदार और बहुत से दोस्त शामिल थे. लेकिन एक बार जब उसे उनकी जरूरत पड़ी सब नदारद थे.

वैसे तो वॉट्सएप ग्रुप पर वह बहुत काम का लड़का कहलाता था... किसी का रेज्यूमे बना देता, किसी का फार्म भर देता, किसी को पढ़ाई में गाइड कर देता और कोई ना की बहाने सभी का कुछ ना कुछ काम कर ही देता था. यानी यूं कहो कि सोशल मीडिया की दुनियां में छाया रहता था.

एक रात जब उसकी नौकरी चली गई, सुबह उसने स्टेटस लगाया
“कुछ दिनों से मुश्किल में हूँ।”

उसके स्टेटस पर व्यूज़ तो बढ़े, लेकिन मैसेज बॉक्स खाली ही रहा. जिसने कल तक कहा था
“भाई तू है तो सब आसान है”
आज वही बोले 
“यार अभी टाइम नहीं है।”

नीरज ने तब समझा, ऑनलाइन दुनिया में लोग डाटा की तरह होते हैं. ज़रूरत हो तो डाउनलोड,काम खत्म तो डिलीट.

उस दिन उसने एक चीज़ बदल ली, नया स्टेटस नहीं लगाया, बस एक नया रास्ता चुना. कम लोगों से बात करने लगा और पर सच्ची लेकिन कम मदद करने लगा,
वो भी बिना लाग लपेट के, निस्वार्थ.

समय के साथ उसके फोन के कॉन्टैक्ट कम हुए, लेकिन ज़िंदगी में शांति बढ़ गई. आज नीरज के पास फॉलोअर्स कम हैं पर जो भी हैं अपने है.

आज उसने एक सबक सीख लिया, आधुनिक मतलबी दुनिया में सबसे बड़ी समझदारी है, खुद को “ऑफलाइन” रखकर सही लोगों से जुड़ना और आगे बढ़ना.


कहानी : अलविदा

अलविदा

“हैलो… बेटा कैसे हो ?”
मां की आवाज में कंपन था
“सुन रहा हूं, जल्दी बोलो मम्मा. मैं अभी मीटिंग में हूं बाद में कॉल करता हूं"
हिमांशु फुसफुसाते हुए बोला
“कुछ नहीं बेटा… बस यूँ ही।”
उसकी मां की आवाज में बेबसी थी
“चलो मम्मा बाद में बात करता हूँ।”
हिमांशु ने तुरंत फोन काट दिया

कुछ घंटे ही बीते थे कि अस्पताल से फोन आया
“आपकी माँ…”
ऑफिस का काम छोड़ हिमांशु दौड़ता हुआ हॉस्पिटल पहुँचा, देखा माँ बेड पर आँखें मूंदे लेटी हुई थी

नर्स ने हिमांशु के हाथ में मोबाइल पकड़ाया और बोली 
“आपकी माता जी ने बस इतना ही कहा
"इसे मेरे बेटे को दे देना”

हिमांशु ने फोन खोला, स्क्रीन पर आख़िरी कॉल चमक रही थी
"Duration : 11 seconds"
हिमांशु को याद आया अभी कुछ समय पहले ही उसकी माँ ने कहा था, 
"कुछ नहीं… बस यूँ ही"
जैसे वो कहना चाह रही हो
“बेटा अब ज़्यादा समय नहीं है”

हिमांशु ने सिसकते हुए फोन को सीने से लगाया. उसको समझ आ गया था कभी कभी ‘बस यूँ ही’ कॉल अलविदा की भी हो सकती है..


कहानी: नेता

कहानी : नेता

गाँव में पंचायत के चुनाव जोरों पर थे. भाषणों की तो बाढ़ आई हुई थी. नेता अपना अपना राग अलाप रहे थे.
उनमें से एक नेता कहता है
"सिर्फ मुझे ही वोट देना, देखना मैं गांव की तस्वीर बदल दूंगा"
दूसरा नेता कौन सा कम था, वो बोला 
"मैं इसे शहर की सुविधाओं से भर दूंगा"
सब चुनाव जीतने के लिए हर हथकंडे अपना रहे थे .

इसी गांव का  एक समाज सेवक हरिया ये सब सुनकर हंस रहा था. उसको मालूम था कि ये चुनाव जीतते ही गायब हो जायेंगे.

हरिया बहुत ही मेहनती व्यक्ति था. गांव के विकास में उसका भरपूर योगदान रहता था, श्रम से कभी नहीं घबराता था. जहां जरूरत पड़े वहां तुरंत पहुंच जाता था. गाँव की टूटी सड़क पर खुद फावड़ा चलाकर सड़क ठीक कर देता था. रात को अगर किसी स्कूल की छत टपकती थी तो बच्चों के साथ बैठकर टिन लगा देता था.

कुछ चुनिंदा लोगों के दबाव पर उसने चुनाव लड़ने की ठानी यह सोचते हुए कि वह गांव का भरपूर विकास करेगा.

चुनाव का दिन आया. लोगों ने पूछा
“अरे हरिया, तू किस पार्टी से है?”

हरिया मुस्कराया और बोला
“भाई, मैं काम की पार्टी से हूँ, और हमेशा काम की बात करता हूं, चाहे हारूं या जीतूं”

खैर चुनाव के नतीजे आए. नतीजे हरिया के लिए चौंकाने वाले थे. नतीजों में हरिया हार गया था. उसे थोड़ा बुरा जरूर लगा. उसने निर्णय लिया ओर गांव वालों से बोला
"अब वो कभी कोई चुनाव नहीं लड़ेगा"

अगले दिन हरिया फिर वही गांव की सड़कें ठीक करने के लिए सड़क पर फावड़ा चला रहा था.
ये देख गांव  का एक युवक बोला 
“हरिया काका, आप तो चुनाव हार गए थे ना ?”
हरिया मुस्कराया और  युवक  के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला 
“ बेटा चुनाव हार सकता हूँ पर गाँव नहीं ... जब तक जिऊंगा गांव की सेवा करता रहूंगा”
जोश में युवक ने भी फावड़ा थाम लिया, देखा देखी और भी युवक जुड़ने लगे.

चुनाव का मंच अब सूना पड़ा था, जीतने वाला नेता गायब था. 

अब सड़क पर कई निस्वार्थ नेता खड़े हो गए थे. वो भी बिना वादे और कुर्सी के.
सिर्फ और सिर्फ काम के लिए.


कहानी: प्लेटफार्म नंबर एक

प्लेटफ़ॉर्म नंबर एक 

नई दिल्ली स्टेशन और शाम का समय. अचानक ट्रेन आने का अनाउंसमेंट हुआ.
"चंडीगढ़ से अजमेर जाने वाली गाड़ी संख्या 12986 प्लेट फॉर्म नंबर 1 पर आने वाली है, जिन यात्रियों को जयपुर होते हुए अजमेर जाना है वो प्लेटफार्म नंबर 1 पर शीघ्र पहुंचे"

हरीश प्लेटफ़ॉर्म के पास की बेंच पर बैठा और आने जाने वाली ट्रेनों को और दौड़ते भागते इंसानों को देख रहा था. उसके हाथ में एक पुराना सा थैला था और आँखों में किसी अपने का इंतजार.

यह वही स्टेशन है जहां वह कई बार आया है कभी लेने आता तो कभी छोड़ने. उसकी बेटी पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ जो गई थी. जब भी जाती थी उदास होकर बोलती थी
“पापा,  आप चिंता मत करो मैं जल्दी ही लौटूंगी . वो भी इसी प्लेटफार्म नंबर 1 पर”

ट्रेन के अनाउंसमेंट ने हरीश के कान खड़े कर दिए, अरे इसी ट्रेन से तो मेरी बेटी आ रही है, वह प्लेटफार्म नंबर एक की तौरफ दौड़ रहा था.  ट्रेन भी पहुंच चुकी थी.  बोगी के बाहर खड़ा वो बेसब्री से बेटी का इंतजार कर रहा था.

अचानक भीड़ में एक जानी-पहचानी  मधुर आवाज़ सुनाई दी
“पापा…!”

हरीश ने सिर घुमाकर देखा. फिर वही चेहरा, वही आँखें वह कुछ कहता उसकी बेटी पिता से लिपट गई.

हरीश की आंखों में आँसू थे. उसकी बेटी अब हमेशा उसके साथ रहेगी. उसकी आवाज़ भरभरा रही थी. इतने में उसकी बेटी बोली 
“ अरे पापा अब क्यों उदास हो रहे हो,अब तो आपका इंतजार हमेशा के लिए खत्म हुआ, मेरी पढ़ाई जो पूरी हो गईं अब हम सब साथ रहेंगे"

हरीश को आज समझ आया… हर स्टेशन मंज़िल नहीं होता, बस कुछ अपनों के पास लौटने के लिए भी होते हैं. स्टेशन वही था, प्लेटफ़ॉर्म वही था… लेकिन हरीश का इंतज़ार अब ख़त्म हो गया था.

हरीश कुछ बोलता उसकी बेटी बोली 
"तो  पापा चलें ... अपने घर" 
दोनो मुस्कुरा रहे थे ... स्टेशन धीरे धीरे पीछे छूट रहा था...


कहानी: खिड़की


खिड़की

शहर के सबसे  पुराने पॉश एरिए में एक पुराना मकान. उसी मकान में एक बुजुर्ग अकेले रहते थे जो अक्सर उस मकान की खिड़की के पास सुबह से शाम बैठे नजर आते थे. उनका ध्यान बाहर आते-जाते लोगों को और बच्चों को देखने में बीतता था. लोग उन्हें देखकर सोचते हैं..
" इस उम्र में भी बेचारे, कितने अकेले हैं, इनके बच्चे इनका ध्यान क्यों नहीं रखते ?”

एक युवक जो उनको रोज देखा करता था, एक दिन वह कुछ सोचते हुए उनके पास गया और कहने लगा
“अंकल जी आप अकेले रहते हो और हर समय खिड़की के पास बैठे बाहर क्या देखते रहते हो. क्या आपको अकेलापन नहीं लगता?”

बुज़ुर्ग थोड़ा मुस्कराए और फीकी हंसी के साथ बोले,
“नहीं बेटा, मैं दिखने में अकेला हूं पर अकेला नहीं हूँ. मेरी पत्नी की यादें मेरे साथ है और इस खिड़की के पास बैठकर मैं ज़िंदगी को अनुभव करता हूं, देखता हूं और सोचता रहता हूं. इस दुनियां के नित नए बदलते स्वरूप को देखता रहता हूँ”

युवक उनकी दार्शनिक बातें सुनकर चुप हो गया.
बुजुर्ग ने युवक की तरफ देखा और बोले 
“दरवाज़े बंद करने से इंसान अपने आप को सुरक्षित तो महसूस करता है लेकिन खिड़की खुली हो तो वह अपने आपको ज़िंदा भी महसूस करता है”

युवक कुछ महीनों के लिए कैसी दूसरे शहर चल गया था. जब एक दिन  वह शहर लौटा तो उसका ध्यान उन बुजुर्ग के मकान पर गया . उसने देखा खिड़की बंद थी और दरवाजे पर एक नोटिस टँगा था
“मकान बिकाऊ है।”
यह देख युवक ठिठक गया और सोचने लगा अचानक ये क्या हुआ, वो बुजुर्ग कहां चले गए. अनहोनी की आशंका से वह थोड़ा घबरा सा गया था.

वह ये सब खड़ा देख सोच रहा था कि उसके कंधे पर किसी ने अपना हाथ रखा
"अरे भाई मोहन तुम्हे जानकर दुःख होगा, कुछ दिन पहले उन बुजुर्ग की मृत्यु हो गई. शहर से उनके बेटे बहु आए थे क्रिया कर्म की रस्म निभाई और ये बेचने का बोर्ड लगा गए "

"ओह ये बड़ा दुखद है" 
यह कहते हुए युवक उस बंद खिड़की के पास गया. उसे खोलने लगा और उसने देखा, बाहर ज़िंदगी वैसी ही थी, सब कुछ वैसे ही चल रहा था वही खेलते हुए बच्चों की हँसी, धूप और भागती हुई हवा.

ये सब देख उसे एहसास हुआ, बुज़ुर्ग तो चले गए, लेकिन ज़िंदगी को इस तरह महसूस करने की आदत यहीं छोड़ गए.

युवक ने खिड़की बंद नहीं की क्योंकि कुछ पुराने घरों की खिड़कियां बुजुर्गों के लिए जीने के सहारा और जिंदगी होती है तो कुछ लोगों के लिए विरासत या फिर सन्नाटा एक गहरा सन्नाटा.








कहानी: शिक्षित बहू


शिक्षित बहू

चौबेपुर गाँव में पंडित हरि नारायण शर्मा का परिवार अपनी परंपराओं और संस्कारों के लिए जाना पहचाना जाता था. वैसे तो घर के मुखिया पंडित हरि नारायण शर्मा पुराने विचारों के थे. वो ऐसा मानते थे कि बहू जितनी कम पढ़ी-लिखी हो, उतनी ही आज्ञाकारी, संस्कारी और ग्रह कार्य में दक्ष होती है.

लेकिन फिर भी कुछ सोचकर उन्होंने अपने बेटे रोमेश की शादी शहर की पढ़ी-लिखी, साधारण परिवार में पली निधि नाम की लड़की से करा दी. निधि अच्छे अंकों से बी एस सी., बी.एड. पास थी.

रोमेश की शादी साधारण रीति रिवाज के साथ हो गई. बहु घर भी आ गई. बहू के घर आते ही गांव के लोगों के बीच कानाफूसी भी शुरू हो गई.
"अरे इतनी पढ़ी-लिखी बहू, घर कैसे संभालेगी? पंडितजी ने ये क्या कर किया ?”
“ पढ़ी लिखी है अगर कहीं नौकरी की ज़िद पकड़ ली तो पंडित जी के संस्कारों का क्या होगा”
कुछ चटकारे ले रहे थे कुछ चिंता में थे तो कुछ थे सोच रहे थे, 
"छोड़ो यार... हमे क्या लेना देना, पंडित जी जाने और उनका परिवार"

निधि के कानों तक भी ये बात पहुंची, वो जानकर अनजान बनी रही और अपना काम सुरुचिपूर्ण तरीके से करती रही जैसे सुबह सबसे पहले उठकर पूजा, रसोई और सास-ससुर की सेवा. वह सब काम पूरे मन से करती थी. यहां तक कि वह घर परिवार के बच्चों को पढ़ाती भी थी, सास की दवाइयों को समय पर खिलाना याद रखती थी और यहां तक कि घर के खर्चों का हिसाब भी समझदारी से संभालती थी. पंडित जी ऐसी बहू पाकर फूले नहीं समाते थे.

एक दिन अचानक निधि की सास की तबीयत बिगड़ गई. गाँव में डॉक्टर नहीं था. निधि ने बिना घबराए और समय गवाएं प्राथमिक उपचार कर किया, एम्बुलेंस बुलवाई गई और समय रहते सास की जान बच गई. डॉक्टर ने बोला
“अगर थोड़ी देर हो जाती, तो हालात बिगड़ सकते थे लेकिन अब घबराने की कोई बात नहीं है ”
पहली बार पंडित जी को लगा कि पढ़ाई कितनी जरूरी है और उनका लिया हुआ निर्णय कितना सही रहा.

कुछ दिनों के बाद निधि की सास के पूर्ण रूप से ठीक हो गई , निधि ने सास ससुर से अनुमति लेकर गाँव की लड़कियों के लिए शाम की पाठशाला शुरू कर दी. धीरे धीरे वही लोग, जो कानाफूसी करते थे, अपनी बेटियों को निधि के पास पढ़ने भेजने लगे.

एक दिन भरी पंचायत में हरि नारायण शर्मा गर्व से बोले
“मुझे गर्व है ; हमारी बहू पर और आज , मैं ये मानता हूं की पढ़ाई संस्कारों की दुश्मन नहीं होती बल्कि उनकी साथी होती है"

दूर खड़ी निधि यह सब सुनकर मुस्कुरा रही थी मानो कह रही हो पढ़ी लिखी सुसंस्कृत बहू घर तोड़ती नहीं है, उसे और भी मज़बूत बनाती है.




कहानी: खाली वॉलेट


खाली वॉलेट 

शहर के सबसे ऊँचे टावर में कॉरपोरेट जगत की आपात बैठक चल रही थी. देश के सबसे अमीर लोग, उद्योगपति, निवेशक, टेक-सम्राट एक समस्या पर विचार विमर्श कर रहे थे.

सुबह से पूरे शहर का बिजली नेटवर्क ठप था नतीजा थोड़ी देर में  इनवर्टर भी खत्म, ना इंटरनेट, ना बैंकिंग और ना ही कोई डिजिटल ट्रांजैक्शन. वैसे भी इस डिजिटल युग में कैश कौन रखता है ? वर्षों से किसी ने रखा ही नहीं सब डिजिटल कैश के भरोसे.

बिजली नेटवर्क फैलियर के कारण
लिफ्ट अटकी, 
दरवाज़े नहीं खुले
एसी बंद 
मोबाइल भी कहीं खो गए

एक प्यासा अरबपति घबराकर चिल्लाया 
“मेरे पास सब है… बस एक गिलास पानी नहीं है, कोई एक गिलास पानी दे दो।”

दूसरे ने घड़ी उतारते हुए बोला
“यह दुनिया की सबसे महँगी घड़ी है, कोई इसके बदले में एक गिलास पानी ही दे दो”

वहीं सीढ़ियों पर बैठा सफ़ाईकर्मी अपनी पुरानी पानी की बोतल, चाय की थर्मस, अपनी पहचान का कागज और एक चाबी जो दरवाजे की मैनुअल चाबी थी लिए बैठा था.

हॉल में अंधेरा था, सब हॉल के कांच और जाली के दरवाजे से उसे देख रहे थे. उन्होंने देखा उसके पास पानी है और थर्मस भी है. उनकी आंखों में चमक आई.

सबको अचानक सामने देख वो घबराकर बोला
“पानी दूँगा, दरवाज़ा भी खोल दूँगा पर पैसे नहीं चाहिए मुझे”

सब उसकी बात सुनकर चौंक पड़े
“तो क्या चाहिए?” किसी नउद्योगपति ने पूछा

वह थोड़ा मुस्कुराया और बोला
“पहले मेरी बात सुनिए. जब आप लोग सिस्टम से चलते हैं तो आप हमें नहीं देखते और जब सिस्टम रुकते हैं तब आपको समझ आता है कि कौन और क्या ज़रूरी है।”

उसने दरवाज़ा खोला, सब बाहर आए, सबने पानी पिया, सबकी सांस में सांस आई.

जद्दोजहत के बाद नेटवर्क भी लौटा, मोबाइल चमके, डिजिटल वॉलेट फिर भारी हो गए लेकिन एक चीज़ हल्की रह गई अहंकार.

सब दहशत से निकले, खुशी महसूस की, अपने खाली वॉलेट की तरफ देखा और आज जाना सीखा की पैसा बस दर्शक बनकर रह जाता है. इंसान ही इंसान के काम आता है क्योंकि पैसे की भी एक सीमा होती है.


कहानी : नीयत

नीयत: एक सच

असलियत में नीयत वही होती है, जो मौका मिलने पर ही सामने आती है, इस संबंध में, मैं एक छोटी सी कहानी प्रस्तुत कर रहा हूं.

एक छोटे से कस्बे में राजेश नाम का साधारण व्यक्ति रहता था. राजेश शांत व्यवहार का और मीठा बोलने वाला व्यक्ति था यही कारण था कि कस्बे के लोग उसे एक अच्छा इंसान मानते थे. वह हमेशा कहता था 
“मैं अपने दिल से किसी का बुरा सोच ही नहीं सकता।”

एक दिन राजेश नहर के किनारे चहलकदमी कर रहा था  तभी उसकी नज़र नहर के किनारे पड़े थैले पर पड़ी. कौतूहलवस उसने जब थैला खोला तो उसमें कुछ रुपए और सोने के गहने थे. आसपास कोई भी नहीं था. यह देख राजेश का एक मन बोला 
“किस्मत ने मौका दिया है, इसे रख ले ”
लेकिन तुरंत ही उसका दूसरा मन बोला 
“यह किसी की अमानत है, पता लगाओ और उसे तुरन्त लौटाओ”

सोच विचार के बाद राजेश ने थैला उठा ही लिया और घर ले आया. उसने खुद को समझाया 
“जब कोई देखने वाला कोई नहीं था तो इसको रखने में बुराई ही क्या है?”

कुछ दिनों बाद उसी कस्बे का एक बूढ़ा व्यक्ति रोता हुआ जा रहा था. किसी ने बताया उसकी बेचारे की ज़िंदगी भर की जमा-पूँजी नहर के आस पास या कहीं नहर में गिर गई है. बेचारे ने ये पैसे उसने अपनी बेटी की शादी के लिए बचा रखे थे.

यह सुनकर उस रात राजेश सो नहीं सका. सोने और रुपयों से भरा थैला उसे बेचैन कर रहा था. उसे ये एहसास होने लगा कि इंसान की गलत नीयत ही सबसे पहले आत्मा को बेचैन कर देती है.

अगली सुबह जल्दी में राजेश ने थैला उठाया और सीधे उस बूढ़े के पास पहुँचा. रुपए और गहनों से भरा थैला लौटाते हुए  बोला 
"बाबा  ये है आपकी अमानत"
यह बोलते हुए राजेश की आँखों में  पश्चाताप के आँसू थे और मन के किसी कोने में दुःख भी था.

बूढ़े ने अपने कांपते हाथों से थैला लिया और हाथ जोड़ते हुए बोला 
“बेटा, आज तुमने मेरा ही नहीं मेरी बेटी का भी भविष्य बचाया है”







डर

डर 

"शर्मा जी लो मिठाई खाओ मेरा बेटा USA में नई जॉब ज्वाइन कर रहा है, और उसको कंपनी वहीं बंगला कार भी देगी, आपका बेटा क्या कर रहा है" गर्व से ये सब बताने के बाद वर्मा जी ने शर्मा जी से पूछा

साथ ही खड़ा शर्मा जी का बेटा अमन बोला "चाचा जी मेरा भारतीय सेना में चयन हो गया है, में आज बहुत खुश हूं मुझे मातृभूमि की सेवा के साथ साथ भारत में ही रहने का सुख मिलेगा..

शर्मा जी भी नम्र होकर बोले "और हम सब अपने देश में अपने ही लोगों के बीच साथ साथ भी रहेंगे, चलो आपको बहुत बहुत बधाई रोमेश USA जा रहा है"

पत्नी गुजरने के बाद वर्मा जी ने अकेले ही इकलौते बेटे रोमेष की परवरिश में उन्होंने सारी उम्र गुजर दी थी , और अब शर्मा जी की बात सुनकर उन्हें कुछ डर सताने लगा था... 



दान

दान

"सेठ इस फकीर को कुछ दे दे, ईश्वर तेरी मनोकामना जरूर पूरी करेगा" फकीर दोनो हाथ फैलाए कुछ सिक्कों की उम्मीद कर रहा था

"तू क्या आशिर्वाद देगा भिखारी, ये देख मैं भगवान को सोने का मुकुट चढ़ाऊंगा और फिर देखना वो मेरी मानोकामना जरूर पूरी करेगा" सेठ भी मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते हुए सोने का मुकुट दिखाते हुए घमंड से बोला

"अरे सेठ तू तो भगवान से भी सौदा करने आया है, भगवान तेरे दान का क्या करेगा, वो तो खुद दाता है, कुछ गरीबों के लिये भी दान पुण्य किया कर, ऊपर तेरे वो ही काम आएगा" इस बार भिखारी की बात में थोड़ी तल्खी और निराशा थी

मैं सोचता हूं, की इंसान भी क्या चीज है, सबके दाता श्री भगवान को दान के नाम पर देता है और उसी दान से अधिक पाने की उम्मीद करता है..