कहानी : संगम
शाम ढलने लगी थी ... गहरी सुनहरी किरणें राणा प्रताप सागर की बहती जलधारा की सतह पर बिखर रही थी.. दोनो का मिलन, ऐसा लगता था जैसे शाम को दो प्रेमी मिल रहे हों... और जल की मधुर आवाज जैसे कोई गीत गुनगुना रहा हो..
सागर किनारे खड़ा नीलेश ये नजारा देख रहा था... ऊंचे ऊंचे पर्वत... दूर दूर फैला सागर का शांत जल, जिसमें दिखाई देती थीं पहाड़ियों की परछाइयाँ और कहीं दूर ढलता हुआ सुनहरी सूरज.
ऐसे में किसी ने पुकारा
"हेलो नीलेश"
नीलेश एक क्षण चौंका फिर पलट कर बोला
"ओ हाय नीलम"
दोनों ने एक दूसरे को देखा और मुस्कुराने लगे.
"आप बोर तो नहीं हो रहे थे" नीलम ने नीलेश के चेहरे के भावों को पढ़ते हुए कहा..
"नहीं तो मैं तो इन सुंदर नज़ारों का आनंद ले रहा था"
नीलेश ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया.
ये दोनों की पहली मुलाकात थी. दोनों के मन में असंख्य प्रश्न थे. दोनों के दिल धड़क भी रहे थे.
"बहुत सुंदर जगह है" नीलेश ने चुप्पी तोड़ी.
"मै अक्सर यहां आती रहती हूँ.. मुझे यहां ढलता हुआ सूरज देखना बहुत अच्छा लगता है" नीलम ने अपने मन की बात कह दी.
"चलो वहां उस पत्थर पर बैठते है" नीलेश ने आग्रह किया तो नीलम ने उसे स्वीकार कर लिया.
शादी डॉट कॉम के जरिये ये उन दोनों की पहली मुलाकात थी... शाम अब गहराने लगी थी... दोनों के लिये अब ये शाम रोमांटिक होती जा रही थी... थोड़ी देर में दोनों ने अपने अपने विचारों का आदान प्रदान किया... ढेर सारी बातें हुई... शंकाओं का समाधान हुआ... भविष्य की बाते हुई... कुछ काम की बाते भी हुई... और फ़िर उनकी ये बातें कब प्यार में बदल गई.
"मुझे तुम पसंद हो, क्या मैं तुम्हें ?? "
नीलेश ने रोमांटिक होते हुए पूछा
"हां"
इतना बोलते ही नीलम शरमा गई, उसके गाल शरम से लाल हो गये थे.
नीलेश ने नीलिमा का हाथ पकड़ा और गाने लगा
“चाँद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था… हां तुम बिल्कुल वैसी हो जैसा मैने सोचा था"
दोनों एक दूसरे का हाथ थामे... सागर किनारे किनारे चलने लगे... नीचे अथाह जल ... ऊपर अनंत आकाश... इनके बीच ये दो अंजान अपना छोटा-सा संसार रच रहे थे... बातचीत साधारण थी पर हर शब्द में एक नई शुरुआत की स्वीकारोक्ति थी.
सूरज अब पूरी तरह ढल चुका था... आकाश में असंख्य तारे उतर आये थे... हल्की चाँदनी भी उतर आई थी... नीलेश का गया गीत सार्थक हो रहा था.
दोनों वापसी की तैयारी में थे. दोनों जाना नहीं चाह रहे थे. अब कोई औपचारिकता भी नहीं थी, एक नए बंधन की तैयारी थी.
नीलेश ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा
"नीलू चलते हैं... जल्दी ही .. फिर मिलेंगे"
"हां नीलेश"
कहते हुए नीलम धीरे धीरे घर की तरफ मुड़ने लगी... बिछुड़ने का ग़म दोनों को ही हो रहा था.
उस दिन राणा प्रताप सागर के जल में उनका प्रतिबिंब एक संगम बन गया था..
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