प्रिया को रंग बिरंगी बिंदीयां बहुत पसंद थी.. उसके बैग में बहुत सी बिंदियों के पैकेट हुआ करते थे... उसके माथे पे गोल गोल बिंदी चांद की तरह दिखती थी.. उसे लगता था ये बिंदियां जैसे उसके माथे पर ठहरा हुआ आत्मविश्वास हो.
जब भी वह आईने के सामने खड़ी होती तो अपने आप से ही पूछने लगती "मैं ठीक तो लग रही हूँ ना ?” और हँस पड़ती..
एक दिन वो चली गई... बहुत दूर... चांद के पास.. पूनम के चांद ने उसे छीन लिया था. उसकी बिंदियों का डिब्बा अब भी अलमारी में रखा हुआ है... उसकी याद के तौर पर... अलग-अलग रंग, अलग-अलग आकार और सबसे ऊपर वही लाल बिंदी जो उसने मिलन की रात लगाई थी. इसे वह सुहाग की निशानी मानती थी... हर करवा चौथ पर इसे ही लगती थी. मानो उसका व्यक्तित्व और चेहरे की सारी पहचान इस बिंदी में सिमट आई हो .... ठीक वैसे ही जैसे रात के आगोश में पूनम का चाँद..
चाँद तो आज भी आता है रोज़ आता है... लेकिन एक बिंदी के बिना उसका श्रृंगार अधूरा है... और मेरी जिंदगी का भी....