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लेख : वरिष्ठ नागरिक और हॉबी


वरिष्ठ नागरिक और हॉबी 

अक्सर देखा जाता है कि रिटायरमेंट के बाद इंसान अपने आपको गया गुजरा और नकारा समझने लगता है. लेकिन ऐसा नहीं है. बल्कि ये मान के चलिए की अब आपका स्वर्ण युग  शुरू हो गया है. आप अपनी मर्जी के मालिक है, चाहे जैसे समय व्यतीत करें. ना बॉस की चिक चिक ना ही समय की कमी.

समय व्यतीत करने के लिए क्या करें जिससे व्यस्त भी रहें और मानसिक विकास भी होता रहे.. इसके लिए आपको कोई शौक़ अपनाना पड़ेगा जो आपके मन को शांत रखें, दिमाग को सक्रिय रखें और आनंद भी दें. आइये कुछ सुझाव मेरी तरफ से आपके लिए....

1. डायरी लेखन :  
एक डायरी लीजिए उसमें अपने जीवन के अनुभव, यात्रा अनुभव, आध्यात्मिक अनुभव, विशेष लोगों से मुलाकातें और उनके अनुभव, कोई पुराने किस्से ओर अपने विचार भी लिख सकते हैं.
 
2. कविता, कहानी और लेख रचना : 
अगर आपको लेखन में रुचि है और आप अपनी भावनाएँ कहानी, कविता और लेख के माध्यम से व्यक्त करना चाहते हैं तो छोटी-छोटी कविताएँ, लेख, कहानियां लिखिये, सच में आपको आनंद आएगा.

3.यात्रा करिए:
अब आपके पास समय ही समय है तो क्योँ ना अपनी मनपसंद जगह की यात्रा की जाय. यात्रा मनोरंज के लिए हो या आध्यात्मिक; दोनों ही आपको आनंद की अनुभूति कराएंगी.

4.फोटोग्राफी:
आजकल सबके पास आधुनिक और स्मार्ट फ़ोन है. तो मोबाइल फोटोग्राफी कीजिए. सुबह और शाम का दृश्य, किसी प्राकृतिक जगह का दृश्य, किसी गार्डन के फोटो और कई सुंदर और प्रसिद्ध जगहों के फोटो लीजिये.  इन फोटो को वाटसऐप, फेसबुक और अन्य माध्यम से शेयर कीजिए. सच में आपको बड़ा मजा आएगा.

5. अन्य हॉबी : और भी बहुत सी हॉबी है जो आप अपनी रुचि के हिसाब से अपना सकते है जैसे ...
   ** ड्राइंग और स्केच बनाना
   ** प्रकृति को करीब से देखना महसूस करना
   ** आध्यात्मिक अध्ययन जैसे गीता रामायण
   **  दर्शनशास्त्र का अध्ययन 
   ** ज्वाइन, ऑनलाइन फ्री और पेड कोर्सेज 
   ** ओपन यूनिवर्सिटी से पसंद विषय का अध्ययन
   ** पहेली और दिमागी खेल खेलना

अंत में मेरी एक महत्व्पूर्ण सलाह: 
आप अपना एक ब्लॉग बना सकते हैं, (जैसे अभी आप मेरा ब्लॉग www.gkkidiary.blogspot.com पढ़ रहे हैं.) वो भी फ्री में, जीमेल में एक ईमेल अकाउंट बनाएं फिर www.blogspot.com पर जाकर लॉगिन करें, वेब पेज बनाएं और लिखना शुरू करें.  
विस्तृत जानकारी के लिए या सीखने के लिए गूगल सर्च करें ब्लॉगिंग कोर्स ज्वाइन करे और ब्लॉगर बनकर नाम कमाएँ, अच्छा लिखोगे तो पैसा भी कमा सकते हो.

तो फिर देर किस बात की…......



कहानी: खिड़की


खिड़की

शहर के सबसे  पुराने पॉश एरिए में एक पुराना मकान. उसी मकान में एक बुजुर्ग अकेले रहते थे जो अक्सर उस मकान की खिड़की के पास सुबह से शाम बैठे नजर आते थे. उनका ध्यान बाहर आते-जाते लोगों को और बच्चों को देखने में बीतता था. लोग उन्हें देखकर सोचते हैं..
" इस उम्र में भी बेचारे, कितने अकेले हैं, इनके बच्चे इनका ध्यान क्यों नहीं रखते ?”

एक युवक जो उनको रोज देखा करता था, एक दिन वह कुछ सोचते हुए उनके पास गया और कहने लगा
“अंकल जी आप अकेले रहते हो और हर समय खिड़की के पास बैठे बाहर क्या देखते रहते हो. क्या आपको अकेलापन नहीं लगता?”

बुज़ुर्ग थोड़ा मुस्कराए और फीकी हंसी के साथ बोले,
“नहीं बेटा, मैं दिखने में अकेला हूं पर अकेला नहीं हूँ. मेरी पत्नी की यादें मेरे साथ है और इस खिड़की के पास बैठकर मैं ज़िंदगी को अनुभव करता हूं, देखता हूं और सोचता रहता हूं. इस दुनियां के नित नए बदलते स्वरूप को देखता रहता हूँ”

युवक उनकी दार्शनिक बातें सुनकर चुप हो गया.
बुजुर्ग ने युवक की तरफ देखा और बोले 
“दरवाज़े बंद करने से इंसान अपने आप को सुरक्षित तो महसूस करता है लेकिन खिड़की खुली हो तो वह अपने आपको ज़िंदा भी महसूस करता है”

युवक कुछ महीनों के लिए कैसी दूसरे शहर चल गया था. जब एक दिन  वह शहर लौटा तो उसका ध्यान उन बुजुर्ग के मकान पर गया . उसने देखा खिड़की बंद थी और दरवाजे पर एक नोटिस टँगा था
“मकान बिकाऊ है।”
यह देख युवक ठिठक गया और सोचने लगा अचानक ये क्या हुआ, वो बुजुर्ग कहां चले गए. अनहोनी की आशंका से वह थोड़ा घबरा सा गया था.

वह ये सब खड़ा देख सोच रहा था कि उसके कंधे पर किसी ने अपना हाथ रखा
"अरे भाई मोहन तुम्हे जानकर दुःख होगा, कुछ दिन पहले उन बुजुर्ग की मृत्यु हो गई. शहर से उनके बेटे बहु आए थे क्रिया कर्म की रस्म निभाई और ये बेचने का बोर्ड लगा गए "

"ओह ये बड़ा दुखद है" 
यह कहते हुए युवक उस बंद खिड़की के पास गया. उसे खोलने लगा और उसने देखा, बाहर ज़िंदगी वैसी ही थी, सब कुछ वैसे ही चल रहा था वही खेलते हुए बच्चों की हँसी, धूप और भागती हुई हवा.

ये सब देख उसे एहसास हुआ, बुज़ुर्ग तो चले गए, लेकिन ज़िंदगी को इस तरह महसूस करने की आदत यहीं छोड़ गए.

युवक ने खिड़की बंद नहीं की क्योंकि कुछ पुराने घरों की खिड़कियां बुजुर्गों के लिए जीने के सहारा और जिंदगी होती है तो कुछ लोगों के लिए विरासत या फिर सन्नाटा एक गहरा सन्नाटा.








लेख : अकेलापन


अकेलापन 

अकेलापन क्या है ? 
ये मनुष्य के जीवन का एक ऐसा समय है जब वो अपने आप को भीड़ में भी अकेला महसूस करने लगता है.

अकेलापन केवल शारीरिक एकांत नहीं है बल्कि भावनात्मक दूरी का दुसरा नाम है क्योंकि आज के आधुनिक, तेज़ रफ्तार जीवन में अकेलापन एक बड़ी और आम सामाजिक समस्या बनता जा रहा है, जहाँ दोस्त और रिश्तेदार तो बहुत हैं, उनके साथ संवाद भी है फिर भी लोगों में अपनापन कम होता जा रहा है.

वैसे तो अकेलेपन के कई कारण होते हैं जैसे परिवार से दूरी, मित्रों की कमी, जीवनसाथी का चले जाना, ढलती उम्र या सामाजिक उपेक्षा. ये सभी अवस्थाएं अकेलेपन को जन्म देती हैं. तकनीक के इस युग में लोग मोबाइल और सोशल मीडिया से जुड़े तो हैं, पर दिलों का जुड़ाव फिर भी कमजोर पड़ता जा रहा है. आभासी रिश्ते वास्तविक संबंधों का स्थान नहीं ले पा रहे हैं. यही खालीपन का कारण है.

अकेलेपन का प्रभाव व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है जिसके कारण उदासी, निराशा, आत्मविश्वास की कमी, तनाव और अवसाद जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं.  ये अकेलापन कभी कभी व्यक्ति को भीतर से तोड़ देता है और वह स्वयं को समाज से अलग-थलग महसूस करने लगता है.

अगर दूसरी दृष्टि से देखा जाय तो ये अकेलापन हमेशा नकारात्मक नहीं होता बल्कि एक अवसर भी देता है जहां  हम कुछ क्षणों का एकांत आत्मचिंतन, सृजन और आत्म-खोज का अवसर प्राप्त करते हैं. अनेक विद्वान लोग, कवि, लेखक और विचारक अपने एकांत में ही श्रेष्ठ रचनाओं को जन्म देते हैं और  समाज और देश का मार्गदर्शन भी करते हैं. देखा जाय तो समस्या तब होती है जब अकेलापन बोझ बन जाए और मन को कचोटने लगे.

इस अकेलेपन से उबरने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति अकेले में स्वयं से संवाद करे और दूसरों से मिलने जुलने का प्रयास करे और परिवार और मित्रों के साथ समय बिताये, समाज सेवा, पढ़ाई लिखाई, ऑनलाइन कोर्सेस, योग, यात्रा, धार्मिक गतिविधियों में रुचि लेना, सामाजिक सेवा, प्रकृति के साथ समय बिताना ; जैसे पहाड़, नदी, या खुले आकाश का आनंद ले. यही रुचियां हमारे मन को शांति देती हैं. एक बहुत अच्छा उपाय यह भी है ; ब्लॉग बनाकर अपने अनुभवों को साझा करे या अपने आप को रचनात्मक कार्यों में लगाए. इससे भी अकेलेपन को सकारात्मक दिशा मिल सकती है.

सारांश में यह कहा जा सकता है कि अकेलापन जीवन का एक सत्य है, पर इसे समझदारी और सूझबूझ से संभाला जाए तो यह हमें स्वयं को समझने और मजबूत बनने का अवसर भी देता है. बस आवश्यकता है तो संतुलन की, जहाँ एकांत आत्मविकास का साधन बने, न कि मन की पीड़ा.