कविता : ए लम्हों ज़रा ठहरो

कविता : ए लम्हों जरा ठहरो 

एक बार देखा मैने 
ज़िंदगी को कुछ पल ठहर 
सबको भागते हुए ही देखा 
किसी को सपनों के पीछे
किसी को अपनों के लिए 
किसी को नाम के लिए
किसी को जाम के लिए
किसी को पहचान के लिए....

जब शाम ढली 
यादों ने अलख जगाई
खूबसूरत बीते पलों की याद आई 
सोचने लगा; वो भी एक पल था 
जब बिना वजह मुस्कुराया करते थे
और अब ये पल है 
जब वजह ढूंढने चले हैं हम
मुस्कुराने की ...

वो भी एक जमाना था
ना कोई दौड़ थी,
ना मंज़िल की बेचैनी,
बस चैन ही चैन था
दिल में सुकून था, 
मुहब्बत की बस्ती थी..

ज़िंदगी ने हँस के कहा
"जीके" थोड़ा रुको.. 
अरे सम्हलो जरा
क्योंकि ये वक्त है
किसी के लिए नहीं ठहरा...


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