कहानी: दहेज

कहानी : दहेज

रमा तीन भाई बहिनों में सबसे बड़ी थी... गृह कार्य में दक्ष और पढ़ाई में अव्वल... सिलाई कढ़ाई करके अपना पढ़ाई का खर्चा भी निकाल लेती थी.

आज रमा को देखने लड़के वाले आए है.  घर साफ़ और सलीके से रखा था जो गरीबी छुपाने एक प्रयास  था. चाय साधारण थी साथ में कुछ बिस्किट्स शालीनता से रखे हुए थे.

लड़के बालों ने घर में इधर उधर नजर घुमाई फिर रमा की तरफ देखा, उससे घर परिवार और पढ़ाई लिखाई के बारे में पूछा. जो सब सामान्य बातचीत का हिस्सा था.

इधर उधर की बातों को विराम देते हुए... लड़के के पिता ने गला साफ करते हुए कहा
“देखिए वर्मा जी आजकल खर्चे बहुत बढ़ गए हैं...  मैं जानना चाहता हूँ कि शादी थोड़ा अच्छी हो जाय... तो आपने कुछ खर्च का सोचा होगा मेरा मतलब आजकल के चलन के अनुसार लेनदेन के रिवाज के बारे में”
लड़के का बाप अप्रत्यक्ष तरीके से दहेज की बात कर रहा था. रमा की मां उनकी मंशा समझ गई थी.. पिता भी निरुत्तर हो गए थे. एक चुप्पी सी छाई हुई थी.

दरवाजे की पीछे रमा ये सब सुन रही थी ओर समझ भी रही थी.. बिना समय गंवाए हाथ में खर्चों की फाइल लेकर आई और उसने लड़के वालों के सामने फाइल रख कर बोली...
"ये है हमारे लालन पालन और पढ़ाई का खर्चों की फाइल, हमने ज़िंदगी का हर खर्च खुद उठाया है और हम ये नहीं चाहती कि कोई हमारा खर्चा उठाए... मैं अपने माता पिता पर बोझ नहीं हूं... उनकी जिम्मेदार संतान हूं... मैं यह भी नहीं चाहती ... मेरे माता पिता मेरी शादी कोई तकलीफ उठाकर करें"

कमरे सन्नाटा सा छा गया... लड़के वाले निरुत्तर हो गए थे... उन्होंने जाना ही बेहतर समझा... चाय प्याले में अब भी वैसी की वैसी राखी थी... लड़के के पिता ने वर्मा जी से बिना नजरें मिलाए कहा
"जी अब हम चलते हैं"

लड़के वालों के जाने के बाद रमा के माता पिता अपने आप को कोस रहे थे... अपनी गरीबी को कोस रहे थे... रमा की शादी फिर तय होते होते रह गई.

रमा को दहेज के नाम से घिन होने लगी थी... उसने कुछ करने की ठानी... रमा को पढ़ाई में अव्वल आने की वजह से वजीफा मिलना तय हुआ...

रमा अब शहर आ गई थी...  वो अब पीछे मुड़कर नहीं देखेगी... माता पिता का नाम रोशन करेगी... जीवन पथ पर  आगे बढ़ेगी और अपने सपनो को साकार जरूर करेगी...

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