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ध्यानाकर्षण का मनोविज्ञान

ध्यानाकर्षण का मनोविज्ञान 
Attention Seekers

ध्यानाकर्षण चाहने वाले लोग वो व्यक्ति हैं जो अपनी आदतों से मजबूर या यूं कहो अपनी हरकतों, व्यवहार या बातों से दूसरों का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहते हैं.

मनोविज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो अकसर इनका मकसद दूसरों को नज़रअंदाज़ करके अपनी बात या उपस्थिति को महत्वपूर्ण बनाना होता है.

ध्यानाकर्षण चाहने वाला व्यक्ति केवल “दिखावा” नहीं करता, अक्सर उसके व्यवहार के पीछे उसकी गहरी मानसिक कुंठा होती है. 

इसे मनोविज्ञान की दृष्टि से समझते हैं...

1) ऐसे लोगों को मान्यता और स्वीकार्यता की तीव्र इच्छा या जरूरत होती है,  ऐसे लोग चाहते हैं कि उन्हें देखा सुना और माना जाए. इसका कारण कुछ भी हो सकता है जैसे बचपन में उपेक्षा, तुलना, प्रेम में विफलता या कोई भावनात्मक कमी.

2) आत्मसम्मान की कमी महसूस होना, ऐसे लोगों के अंदर असुरक्षा की भावना पैदा करती है. इन्हें तारीफ़, लाइक्स, प्रशंसा या सहानुभूति मिलती रहनी चाहिए क्योंकि ऐसे लोगों का मन स्थिर नहीं रहता है.

3) इन लोगों में भावनात्मक खालीपन रहता है. ऐसे व्यक्ति खुद से भी जुड़े नहीं होते. इनका ज्यादातर वक्त दूसरों पे निर्भर रहता है ताकि इन्हें केवल ध्यान ओर इंपॉर्टेंस मिले.

4) ऐसे लोगों को तीव्र नियंत्रण की इच्छा होती है. ऐसे लोग अटेंशन के ज़रिए रिश्तों या माहौल पर कंट्रोल करना चाहते हैं. इनका उद्देश्य “मेरी बात सबसे ज़्यादा सुनी जाए”

5) ऐसे लोगों को अपनी पहचान का भी संकट महसूस होता है. कभी ये सोचते हैं “मैं कौन हूँ?” जवाब ना मिलने पर ये अपनी पहचान खुद ही गढ़ने लगते हैं.

6) ऐसे लोग कम व्याहारिक होते हैं. अटेंशन ना मिले तो व्यथित हो जाते है, इनका स्वभाव जिद्दी हो जाता है, उचित अनुचित की इन्हें परवाह नहीं रहती.

7) ऐसे लोगों के साथ और भी समस्याएं होती है जैसे अक्सर सोशल मीडिया में व्यस्त, छोटी छोटी बातों को बड़ा बनाना, दूसरों की बातों को अपने ऊपर ले लेना इत्यादि.

ऐसा नहीं है कि ये एक बीमारी है . यदि यह रिश्तों, काम या मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाने लगे तो यह अस्वस्थ पैटर्न माना जा सकता है और इसका निवारण होना भी जरूरी है.

ऐसे लोगों से अपना व्यवहार नम्र रखें, उन्हें शांत, सीमित और ईमानदारो के साथ अटेंशन दें, इनके ड्रामा को रिवॉर्ड ना दें, व्यवहार की स्पष्ट सीमाएँ तय करें और ज़रूरत पड़े तो सहानुभूति के साथ पेशेवर मदद सुझाएँ . उन्हें ये भी समझाएं कि यह कमजोरी नहीं है एक संकेत है जो यह चाहता है कि इनके भीतर जो चल रहा है उसे सुना जाय.

मेरे विचार से ऐसे लोग आत्म-संवाद बढ़ाएँ, रचनात्मक अभिव्यक्ति (लेखन, कला) को अपनाएं, प्रकृति से जुड़ें, यात्रा करें, अध्ययन करें, स्वस्थ रिश्ते रखें और दूसरों का सम्मान रखे तभी इनको भी सम्मान मिलेगा.