कहानी : दहेज एक परंपरा
आधुनिकता के दौर में... शादी की बातचीत वीडियो कॉल पर हो रही थी. लैपटॉप की स्क्रीन पर दो दुनिया आमने-सामने बातचीत के लिए तैयार थी..
एक तरफ़.... एसी कमरे में खूबसूरत पेंटिंग से सजी दीवार के सामने, सोफे में धंसे.. ब्रांडेड कपड़ों में सजे बनावटी मुस्कुराहट के साथ धनी परिवार के लोग.
दूसरी तरफ़.. साफ सुथरा छोटा-सा कमरा, दीवार पर राम दरबार का कलेंडर, एक पुरानी सी अलमारी और पिता की आँखों में छिपी घबराहट.
लड़की का नाम था प्रतिज्ञा... एम ए बी एड.. पिता एक मामूली दर्जी...सुई, धागा और ईमानदारी. बस यही थी उनकी पूँजी.
लड़के के पिता ने बात शुरू की
“देखो जी वैसे तो आजकल दहेज कौन लेता है ?”
फिर गला खकार कर हल्की आवाज़ में बोलने लगे...
“बस… शादी के बाद आपकी बेटी को कोई असुविधा ना हो, इसके लिए थोड़ी रकम का इंतज़ाम तो आपको करना ही पड़ेगा”
“कितना?”
यह सवाल प्रतिज्ञा ने आंखे तरेर कर पूछा तो दोनों तरफ
सन्नाटा सा छा गया.
लड़के वालों ने फिर भी बेशर्मी दिखाते हुए रकम बताई ..
रकम इतनी थी कि दर्जी के हाथ काँपने लगे... इतनी बड़ी रकम कि सालों मेहनत करूँ तो भी कम पड़ जाए.
प्रगति कैमरे के सामने सीधी बैठी थी, उसने अपने पिता की ओर नहीं देखा क्योंकि वह जानती थी, उनकी आँखों में लाचारी ओर आँसुओं के सिवा कुछ नहीं होगा.
उसने अपने मन को शांत करते हुए कहा
“आप मेरे पिता की हैसियत की नहीं, मेरी कीमत तय कर रहे हैं”
अब लड़के ने पिता की बात को आगे बढ़ाते हुए बोलने का प्रयास किया..
“देखिये जी, हम तो दहेज की नहीं उन पुरानी परंपरों की बात कर रहे हैं जो सदियों से चली आ रही है…”
लड़के की बात पर प्रगति मुस्कराई और बोली
“परंपराएँ वही ठीक होती हैं,जो रिश्तों के नाम पर किसी मजबूर की रीढ़ ना तोड़ें”
दोनों तरफ फिर सन्नाटा छा गया...
लैपटॉप बंद करने से पहले गुस्से वाले लहजे में प्रगति बोलने लगी
"मुझे सुख दुख का साथी चाहिए ना कि दहेज लोभी पति... और वो परिवार भी नहीं चाहिए जो खुद भिखारी हो.... जाइये आप लोग अपना माल कहीं और बेचिए"
एक गहरे सन्नाटे के साथ वीडियो कॉल वहीं समाप्त हो चुकी थी....
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