मुक्तक: किताबें

मुक्तक : किताबें...

आजकल 
इंटरनेट का ज़माना है 
शेल्फ़ों में चुपचाप सी 
बेचैन रहती हैं किताबें...

कभी नर्म उँगलियों में 
इतराती रहती थीं 
अब स्क्रीन की चमक में
खो गई हैं किताबें..

पन्नों में महकता था 
सपनों का संसार,
हर शब्द में 
सांस लेती थीं किताबें...

अब एक क्लिक में 
मिल जाता है सारा जहाँ,
फिर भी दिल की तन्हाई 
समझती थीं किताबें...

दौर आते हैं, जाते हैं
कुछ ऐसे भी लोग हैं, 
इस जमाने में 
जो सीने से लगाते हैं 
आज भी तन्हा किताबें...

अलमारी में रखी किताबों पर 
धूल जमी हुई थी 
एक पुस्तक प्रेमी आया
किताब की धूल उड़ाई 
किताबैं फिर से मुस्कुरा उठीं...

लड़का मोबाइल कुछ पढ़ रहा था
मम्मा ने उसे एक पुरानी किताब दी
पन्ना खोलते ही बोला
“वाह क्या खुशबू है"

लाइब्रेरी आज फिर 
दरवाज़े की तरफ देख रही थी
शायद आज कोई आएगा 
फिर से किताबें पढ़ेगा

बाप मोबाइल में व्यस्त 
बेटा किताब पढ़ रहा है
भविष्य पन्ने पलटने लगा है...

"किताबों का ज़माना गया"
ये झूठ किसने कहा
आज भी कोई न कोई 
चुपचाप किताब पढ़ रहा है....

मोबाइल की बैटरी खत्म 
उसने मजबूरी में किताब उठाई
आख़िरी पन्ने तक पढ़ते हुए 
वो मुस्कुराने लगा था...

नेटवर्क चला गया
मोबाइल ने साथ छोड़ दिया
किताबें अलमारी से
मुस्कुरा रहीं थी...

लाइब्रेरी में रखी अलमारी 
ये किसने खोली
बेचैन लाइब्रेरी 
फिर से जगमगाने लगी...

कोई टिप्पणी नहीं: