कहानी : बेचैन किताबें
शाम का समय था.. टेबल पर व्हिस्की का पैग इतरा रहा था. राजीव की उँगलियों लैपटॉप के की बोर्ड पर इतरा इतरा कर चल रहीं थी. पास ही एक पुरानी अलमारी में कई सुंदर किताबें धूल से भरी हुई थीं. ऐसा लग रहा था मानो किसी का इंतजार कर रही हो. टेबल के सामने वाली दीवार पर एक पोस्टर लगा हुआ था.... जिसमें लिखा था..
"I love everything
that is old
Old books
Old wine
And old friends...."
इंटरनेट के इस दौर में अलमारी से झांकती किताबें आपस में बात कर रहीं थीं...
“याद है… एक जमाना वो भी था जब ये राजीव हमें रोज़ पढ़ता था.. सीने से लगाये सो भी जाया करता था”
दूसरी किताब हां में हां मिलाती हुई बोली,
“हाँ, तब हर रात हमारे बिना सोता भी नहीं था ...और अब बस मोबाइल की चमक में खोया रहता है... इंटरनेट का जमाना है..”
ओह... ये क्या इंटरनेट चला गया... राजीव बैचेन हो उठा.. इधर उधर कॉल किया मालूम चला कि इंटरनेट आठ घंटे नहीं आएगा, मेंटिनेंस चल रही है...
राजीव सोचने लगा अब क्या करूं... उसकी नजर किताबों की अलमारी की तरफ झांकने लगी. उसने अलमारी से अपनी प्रिय पुस्तक निकाली... जैसे ही उसने किताब को खोला, सूखे गुलाबों के गिरने के साथ ही खुशबू का झोंका उसे मदहोश कर गया. उसे याद आया... अरे ये किताब तो उसकी गर्लफ्रैंड माया ने जन्मदिन पर दी थी... और वो फिर से किताबों में खो गया.
बहुत दिनों के बाद आज उसकी प्रिय किताबें... उसे फिर से इंटरनेट की दुनियां से दूर ले जा रहीं थी.. चाहे थोड़ी देर के लिए ही सही.....
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