कहानी: डूबती साँसे


कहानी : डूबती साँसें

बहुत तेज बारिश हो रही थी, ऐसा लगता था, ये बारिश अपने साथ सब कुछ बहा कर ले जाएगी. पुल के किनारे खड़ा राजेश इस तेज रफ्तार से बहते पानी को एकटक देख रहा था. उसके मन में भी उथल पुथल चल रही थी. उसके चेहरे पर उदासी ओर बेचैनी की रेखाएँ साफ नजर आ रही थीं. अभी कुछ दिन पहले उसकी नौकरी चली गई थी. दोस्तों ने भी दूरी बना ली और घर में भी उसकी खामोशी सबको खलने लगी थी.

राजेश पुल से उस बहती हुई नदी को देख रहा था… तेज़ रफ्तार से पानी उफान के साथ बह रहा था. उसे लगा जैसे उसकी जिंदगी की साँसें भी इसी पानी के साथ बह रही हों.  

अपने ही ख्यालों में खोये राजेश को किसी अनजान व्यक्ति की आवाज सुनाई दी
" बचाओ... बचाओ..." 
लगता है कोई मदद के लिए चिल्ला रहा है राजेश ने पीछे मुड़कर देखा, एक बुजुर्ग व्यक्ति पूल के नीचे जाने वाले ढलान पर अटके हुए थे उन्होंने अपने बचाव के लिए पेड़ की जड़ को पकड़ रखा था. और मदद की गुहार लगा रहे थे.. राजेश को देखते हुए बोले..
“बेटा, ज़रा मेरा हाथ पकड़ना, बारिश की वजह से यहां बहुत फिसलन हो रही है"
राजेश ने फुर्ती दिखाई और पूरी ताकत से उस बूढ़े व्यक्ति को ऊपर की ओर खींच लिया था. दोनों हांफने लगे थे.

बुजुर्ग ने धन्यवाद कहा और मुस्कराते हुए बोले 
“बेटा... आज तुमने मेरी डूबती साँसें बचा लीं”
राजेश भी मुस्कुराया लेकिन चुप रहा. इस ताजा घटना ने उसे हिला दिया था. उसे जिंदगी में एक एक पल का महत्व समझ में आ रहा था.

चुप्पी तोड़ते हुए बुजुर्ग व्यक्ति ने धीरे से कहा 
“जानते हो बेटा, जिंदगी भी कभी-कभी हमे इतना थका देती है कि हम खुद को ही डूबता हुआ महसूस करने लगते हैं. पर सच यह है कि जब हम किसी और को बचाते हैं… तो उसी पल हम खुद भी बच जाते हैं”

राजेश की आँखें भर आईं थीं. उसने पहली बार महसूस किया कि उसकी साँसें सच में डूब नहीं रही थीं… 

बारिश अब भी तेज हो रही थी. लेकिन रवि को लगा जैसे अब सबकुछ पहले से ज्यादा बेहतर है… उसकी डूबती साँसें फिर से धीरे-धीरे जिंदा हो रही हैं., एक नई उमीद के साथ...



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