बस स्टैंड के किनारे, कस्बे की एक छोटी सी लेकिन मशहूर मिठाई की दुकान थी जिसे लोग रामू हलवाई की दुकान कहा करते थे..
समय के साथ, रामू के लड़कों ने उसे आधुनिक रूप देकर कैफे बना दिया और नाम दिया "Rama Sweet corner". लेकिन रामू जी अभी भी अपने आपको पुराने ज़माने वाले हलवाई ही मानते थे. वही सफेद कुर्ता, गले में गुलाबी चेक वाला गमछा और दिल में वही पुरानी मिठास.
रामू जी इतना फेमस थे कि उनकी दुकान में हर तरह के ग्राहक आते थे, चाहे वो अमीर हो या गरीब... कार वाला हो या रिक्शा वाला. रामू जी बढ़िया और स्वादिष्ट कचौरी, समोसे, जलेबी और लस्सी बनाते थे और ऊपर से उनका मिठास भरा व्यवहार. वो चाहते थे कि उनका हर ग्राहक खुश होकर यानी पेट और मन दोनों भर कर जाये.
एक दिन सुबह सुबह, एक दुबला पतला सा लड़का कैफे के बाहर खड़ा था... मैले से कपड़े, हाथ में सस्ता सा मोबाइल, आँखों में थकान और जेब में शायद फूटी कौड़ी हो. वो बार-बार QR कोड की तरफ देखता, फिर नजरें हटा लेता था.
रामू हलवाई समझ समझ गए थे, उन्होंने लड़के को पास बुलाया और बोले
“क्यों बेटा, स्कैन नहीं हो रहा क्या?”
लड़का झेंपते हुए बोला
“नहीं…नहीं.. अंकल मेरे पास फोन में बैलेंस नहीं है”
"कोई बात नहीं"
रामू ने बिना कुछ बोले एक लिफाफा पैक किया, जिसमें कुछ जलेबी और दो कचौरी डाल दी थीं.
“ये लो बेटा... बैठ कर खा लो या ले जाओ और जब भी पैसे आ जाएं तो पेमेंट, कर देना”
रामू ने उसको इसलिए कहा ताकि उसके आत्मसम्मान को चोट ना लगे.
दिन महीने साल बीत गए... रामू की आदत और सेवा भाव आज भी वैसा ही था... लोग अक्सर उसे कहा करते थे..
“रामू, अगर ऐसे ही मुफ्त बाँटते रहोगे तो एक दिन तुम घाटे में चले जाओगे !”
रामू सुनता और बस मुस्कुरा कर कहता था
“अरे भाई... मिठाई का असली स्वाद तो पेट भरने में है, पैसे गिनने में नहीं”
कई सालों बाद, एक बड़ी बड़ी सी कार रामू की दुकान के आगे खड़ी हुई... उसमें से एक नौजवान... सुटेड बूटेड उतरा... सीधे रामू के पास गया उनके पैर छूते हुए बोला..
“अंकल... पहचाना मुझे?”
रामू ने गौर से उस युवक को ऊपर से नीचे तक देखा, फिर सिर हिलाकर बोले
“नहीं बेटा… हम नहीं पहचाने हैंआपको”
“याद करो अंकल मैं वही युवक हूँ, जिस भूखे को एक बार आपने कचौरी और जलेबी खिलाई थी. आज मैं शहर में व्यापारी हूँ.. लेकिन उस दिन की मिठास आज भी मेरे दिल में बसी हुई है”
उसने रामू को उसकी दुकान को नया रंग रूप देने का प्रस्ताव रखा, पर रामू ने मुस्कुराकर मना कर दिया और बोलने लगे
“बेटा... मुझे मेरी ये छोटी-सी दुकान ज्यादा प्यारी लगती है… जहाँ मैं मिठास बेचता नहीं हूँ बल्कि बाँटता हूं. यही कारण है कि तुम भी इतनी दूर शहर से मुझे मिलने आये हो... इससे ज्यादा खुशी मेरे लिए क्या होगी"
"जी अंकल आप वास्तव में बहुत अच्छे इंसान हैं... यही तो आपकी मीठी वाणी है जो मुझे यहां तक खींच लाई... मैं आपसे मिलता रहूंगा"
यह कहते हुए युवक चला गया. उसके मन में रामू के लिये कुछ अच्छा करने की थी. अगले दिन युवक ने रामू की दुकान के आगे लगे बोर्ड के नीचे ये और लिखवा दिया..
“ये सिर्फ मिठाई की दुकान ही नहीं, आपका अपना घर है जहां आपको अपनापन देखने को मिलेगा"
इसके साथ ही युवक ने फेसबुक, इंस्टाग्राम और मीडिया चैनलों पर रामू की दुकान की जमकर तारीफ कर दी... देखते देखते दिन प्रतिदिन रामू की दुकान पर ग्राहकों की लंबी लाइनें लगने लग गयीं.
अब रामू हलवाई बिना कैमरा और प्रोपोगंडा के एक "ब्रांड" बन गए थे वो भी अपनी असली मिठास के साथ.
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