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कहानी : पुस्तक प्रेमी


पुस्तक प्रेमी...

शहर की सबसे पुरानी और व्यस्थ रहने वाली लाइब्रेरी आजकल सुनसान नजर आने लगी थी.. कभी यहाँ बच्चों की मुस्कुराहट देखी जाती थी.. विद्यार्थी नोट्स बनाते थे और बुज़ुर्ग अख़बार व पत्रिकाओं मे ऐसे खोए रहते थे मानो सबको पढ़ने का नशा लग गया हो...

लाइब्रेरियन कामता प्रसाद अब रोजाना इन किताबों को देखते रहते थे... सोचते थे अब इन्हें कोई नहीं पढ़ने आयेगा...

शाम को घर जाते हुए कामता नाथ ने दुखी होकर किताबों से कहा..
“ये इंटरनेट का जमाना है.. तुम्हें पढ़ने वाला अब कोई नहीं आने वाला" 

कामता प्रसाद लाइब्रेरी बंद करने वाले थे कि एक नवयुवक हांफता हुआ बोला...
"अंकल ये लाइब्रेरी कल कितने बजे खुलेगी.. मुझे कुछ किताबें यहां बैठकर पढ़नी हैं "
कामता प्रसाद उस युवक की तरफ देख रहे थे.. और आश्चर्य से बोले 
"तुम किताबें पढ़ोगे वो भी यहाँ लाइब्रेरी में बैठ कर "

“हां अंकल.. टैब और लैपटॉप में पढ़ने में मज़ा नहीं आता… किताब की खुशबू ही अलग होती है, जो मुझे किताब खत्म होने तक बांधे रखती हैं ”

"ठीक है बेटा ... कल प्रातः 10 बजे आ जाना.., इस लाइब्रेरी में तुम्हारा स्वागत रहेगा." 

कामता प्रसाद ने अलमारी की तरफ देखा... किताबें चुपचाप मुस्कुराने लगीं थी... मानो कह रही हों... दुनिया चाहे कितनी भी डिजिटल हो जाए, कुछ पाठक आज भी इन किताबों के लिए जिंदा मिलेंगे...

कहानी: बैचेन किताबें


कहानी : बेचैन किताबें

शाम का समय था.. टेबल पर व्हिस्की का पैग इतरा रहा था. राजीव की उँगलियों लैपटॉप के की बोर्ड पर इतरा इतरा कर चल रहीं थी. पास ही एक पुरानी अलमारी में कई सुंदर किताबें धूल से भरी हुई थीं. ऐसा लग रहा था मानो किसी का इंतजार कर रही हो. टेबल के सामने वाली दीवार पर एक पोस्टर लगा हुआ था.... जिसमें लिखा था..
"I love everything 
that is old
Old books 
Old wine 
And old friends...."

इंटरनेट के इस दौर में अलमारी से झांकती किताबें आपस में बात कर रहीं थीं...
“याद है… एक जमाना वो भी था जब ये राजीव हमें रोज़ पढ़ता था.. सीने से लगाये सो भी जाया करता था”

दूसरी किताब हां में हां मिलाती हुई बोली,
“हाँ, तब हर रात हमारे बिना सोता भी नहीं था ...और अब बस मोबाइल की चमक में खोया रहता है... इंटरनेट का जमाना है..”

ओह... ये क्या इंटरनेट चला गया... राजीव बैचेन हो उठा.. इधर उधर कॉल किया मालूम चला कि इंटरनेट आठ घंटे नहीं आएगा, मेंटिनेंस चल रही है... 

राजीव सोचने लगा अब क्या करूं... उसकी नजर किताबों की अलमारी की तरफ झांकने लगी. उसने अलमारी से अपनी प्रिय पुस्तक निकाली... जैसे ही उसने किताब को खोला, सूखे गुलाबों के गिरने के साथ ही खुशबू का झोंका उसे मदहोश कर गया. उसे याद आया... अरे ये किताब तो उसकी गर्लफ्रैंड माया ने जन्मदिन पर दी थी... और वो फिर से किताबों में खो गया.

बहुत दिनों के बाद आज उसकी प्रिय किताबें... उसे फिर से इंटरनेट की दुनियां से दूर ले जा रहीं थी.. चाहे थोड़ी देर के लिए ही सही.....

कहानी : दहेज


कहानी : दहेज 

देश की राजधानी दिल्ली की एक पॉश एरिया की ऊँची इमारत की तीसरी मंज़िल पर रहने वाले राजीव भट्ट हर चीज़ को पैसे से तोलकर अपनी हैसियत दिखाते रहते है. चाहे मामला कार, बंगले, रिश्ते और यहां तक … शादी में भी हैसियत.

उसी शहर में डीडीए के एलआईजी मकान में रहते हैं उमेश बाबू ; एक ईमानदार सरकारी क्लर्क और उनकी बेटी माधवी. माधवी एक पढ़ी-लिखी, आत्मसम्मानी और सपनों से भरी हुई तेजस्वी कन्या है. विवाह के बारे में उसका विचार बहुत ही अच्छा था. उसके अनुसार शादी दो दिलों के विचारों का मिलन है, लेन-देन का नहीं.

राजीव का बेटा अभिनव और माधवी एक ही कॉलेज में पढ़ते थे. अभिनव धनवान और अय्याश किस्म छात्र था, उसका दिल माधवी पर था लेकिन माधवी उसे पसंद नहीं करती थी. अभिन ने अपने दोस्तों से कहा था
"एक ना एक दिन वो माधवी को अपनी रानी बना के मानेगा"

कॉलेज खत्म जो गये बातें बीती जो गयी लेकिन अभिनव इस बात को भुला नहीं था. उसने अपने बाप को अपनी मंसा बताई. बाप ने पैसे का दम और हैसियत के साथ बोला 
"माधवी को तेरे लिए ले आते हैं और दहेज भी मांग लेंगे"
बाप बेटे दोनों हँस रहे थे.

एक दिन राजीव ने अपने बेटे अभिनव के लिए माधवी के पिता उमेश बाबू को रिश्ते के लिए सन्देश भिजवाया. उमेश बाबू को लगा ये रिश्ता तो बहुत बढ़िया है. उन्हें लगा शायद इस रिश्ते से उसको बेटी की किस्मत बदल जाए.

उमेश बाबू के घर पहली ही बैठक में अभिनव के पिता ने मुस्कुराते हुए कहा—
“ देखो उमेश बाबू, हम दहेज वगैरह कुछ नहीं लेते… बस आपसे थोड़ी-सी मदद की उमीद है जैसे इन बच्चों के लिए एक बड़ी कार, 4 बीएचके का फ्लैट और शादी का सारा खर्च."

यह सब सुनकर उमेश बाबू चुप हो गये. इन्होंने क्या सोचा था और क्या हो गया. उनको अपने आप शर्मिंदगी महसूस हुई.

माधवी दरवाजे की ओट से ये सब सुन रही थी, उसे क्रोध भी आया लेकिन उसने शालीनता बनाए रखी और बाहर आकर बोली
“मेरी योग्यता और मेरे संस्कार आपकी दहेज की मांग से ज्यादा मूल्यवान हैं. मुझे यह रिश्ता नापसंद है, आप जा सकते हैं"

अनुभव को यह उम्मीद नहीं थी. उसको ये बात चुभ गई. पहली दफ़ा एक गरीब लड़की ने उसे ना कहा. वो भी एक अमीरजादे लड़के को. उसका ख़ून खौल उठा पर कुछ कर नहीं सकता था. बाप पर भी दहेज की बात पर गुस्सा आया.

कुछ समय बाद माधवी ने एक बड़े निजी स्कूल में नौकरी जॉइन कर ली. वह बच्चों को पढ़ाती और उनको ऊंचे सपनो के साथ उन्हें आत्मसम्मान की रक्षा और बराबरी की भी शिक्षा देती थी.

उसे यह भी मालूम चल चुका था कि अभिनव ने किसी धनवान लड़की से शादी कर ली. भारी दहेज, बड़ी कर, बड़ा घर, आये दिन बड़ी बड़ी पार्टियां और दिखावे की व्यस्त ज़िंदगी.

कुछ ही महीनों में रिश्तों की दरारें आने लगीं. उसकी पत्नी हर समय उस पर रोब जमा के रखती थी अपनी हैसियत उसे जातलाती रहती थी.. अभिनव को अब समझ आ गया था की जहाँ पैसों से सौदा होता है, वहाँ अपनापन, प्यार और रिश्ता नहीं टिकता है.

कई सालों के बाद, माधवी अब स्कूल की प्रिंसिपल बन चुकी थी. उसके स्कूल के वार्षिक समारोह में अभिनव और माधवी का आमना सामना हुआ. अभिनव मंच का सभापति था.  

स्कूल की प्रिंसिपल होने के नाती माधवी का मंच पर भाषण था. नंदिनी नंदिनी बोल रही थी
“दहेज गरीबी की नहीं, हमारे सोच की बीमारी है, हमे अपनी सोच बदलनी चाहिए”
"दहेज एक कोढ़ है जिसके कारण कई लड़कियां अविवाहित रहती हैं या शादी के बाद जला दी जाती है"

माधवी की हर बात उसके दिल पर हथौड़े की तरह पड़ रही थी ओर माधवी बोले जा रही थी. अभिनव सिर झुकाए बैठा था. तालियों की गड़गड़ाहट दूर दूर तक गूंज रही थी...











कहानी : दहेज एक परंपरा



कहानी : दहेज एक परंपरा 

आधुनिकता के दौर में... शादी की बातचीत वीडियो कॉल पर हो रही थी. लैपटॉप की स्क्रीन पर दो दुनिया आमने-सामने बातचीत के लिए तैयार थी..

एक तरफ़.... एसी कमरे में खूबसूरत पेंटिंग से सजी दीवार के सामने, सोफे में धंसे.. ब्रांडेड कपड़ों में सजे बनावटी मुस्कुराहट के साथ धनी परिवार के लोग.

दूसरी तरफ़.. साफ सुथरा छोटा-सा कमरा, दीवार पर राम दरबार का कलेंडर, एक पुरानी सी अलमारी और पिता की आँखों में छिपी घबराहट.

लड़की का नाम था प्रतिज्ञा... एम ए बी एड.. पिता एक मामूली दर्जी...सुई, धागा और ईमानदारी. बस यही थी उनकी पूँजी.

लड़के के पिता ने बात शुरू की
“देखो जी वैसे तो आजकल दहेज कौन लेता है ?”
फिर गला खकार कर हल्की आवाज़ में बोलने लगे...
“बस… शादी के बाद आपकी बेटी को कोई असुविधा ना हो, इसके लिए थोड़ी रकम का इंतज़ाम तो आपको करना ही पड़ेगा”

“कितना?” 
यह सवाल प्रतिज्ञा ने आंखे तरेर कर पूछा तो दोनों तरफ
सन्नाटा सा छा गया.

लड़के वालों ने फिर भी बेशर्मी दिखाते हुए रकम बताई .. 
रकम इतनी थी कि दर्जी के हाथ काँपने लगे... इतनी बड़ी रकम कि सालों मेहनत करूँ तो भी कम पड़ जाए.

प्रगति कैमरे के सामने सीधी बैठी थी, उसने अपने पिता की ओर नहीं देखा क्योंकि वह जानती थी, उनकी आँखों में लाचारी ओर आँसुओं के सिवा कुछ नहीं होगा.

उसने अपने मन को शांत करते हुए कहा 
“आप मेरे पिता की हैसियत की नहीं, मेरी कीमत तय कर रहे हैं”

अब लड़के ने पिता की बात को आगे बढ़ाते हुए बोलने का प्रयास किया..
“देखिये जी, हम तो दहेज की नहीं उन पुरानी परंपरों की बात कर रहे हैं जो सदियों से चली आ रही है…”

लड़के की बात पर प्रगति मुस्कराई और बोली 
“परंपराएँ वही ठीक होती हैं,जो रिश्तों के नाम पर किसी मजबूर की रीढ़ ना तोड़ें” 

दोनों तरफ फिर सन्नाटा छा गया...

लैपटॉप बंद करने से पहले गुस्से वाले लहजे में प्रगति बोलने लगी
"मुझे सुख दुख का साथी चाहिए ना कि दहेज लोभी पति... और वो परिवार भी नहीं चाहिए जो खुद भिखारी हो.... जाइये आप लोग अपना माल कहीं और बेचिए" 

एक गहरे सन्नाटे के साथ वीडियो कॉल वहीं समाप्त हो चुकी थी.... 



कहानी : जैसे को तैसा

कहानी : जैसे को तैसा

राजधानी की एक पॉश कॉलोनी. इसी कॉलोनी में रहते हैं विनय बाबू, एक रिटायर्ड टीचर जिनकी पत्नी का देहांत अभी कुछ माह पहले हो चुका था और बच्चे सभी विदेश रहते हैं... मित्रता पूर्ण व्यवहार शांत स्वभाव, सुबह टहलना, किताबें पढ़ना, पौधों को पानी देना और कभी-कभी मोबाइल पर कविता और कहानी लिखना उनका शौक था.

उनके पड़ोस में एक नालायक लड़का रहता था, नाम था तारा सिंह जो आवारा किस्म का लड़का था. उसके शौक थे... देर रात जोर जोर से लाउड म्यूज़िक बजाना, दारू पार्टियाँ और सोशल मीडिया के लिये रील्स बनाना. और हां सुबह देर तक सोना.

अड़ोसी पड़ोसी बहुत दुखी थे. यही सोचकर चुप हो जाते थे गुंडे के मुंह कौन लगे अगर उल्टा पड़ गया तो, सुना था उसका बाप क्रिमिनल लॉयर है..

लेकिन एक दिन तो हद हो गई। वह रात एक बजे बालकनी में खड़ा तेज़ म्यूजिक के साथ भद्दे गाने गा रहा था. विनय जी को नींद नहीं आ रही थी... वे उठे... तारा सिंग का घर खटखटाया 

“धम… धम… धम…”
तारा सिंह ने दरवाजा खोला और चिल्लाया
"कौन है बे"
 विनय जी को देखते हुए थोड़ा नरम होकर बोला
"जी अंकल"

विनय जी प्यार से बोले 
“बेटा, थोड़ा आवाज़ कम कर लो… मुझे नींद नहीं आ रही है”

तारा सिंह कुटिल मुस्कान मारते हुए बोला
“अंकल, रिलैक्स… ये तो अपुन का लाइफस्टाइल है, आपने भी तो अपने जमाने में धूम मचाई होगी” यह कहते हुए उसने झट से दरवाजा बंद कर दिया.

विनय जी को गुस्सा आया लेकिन पी गए... उन्होंने ठान लिया था ... वो तारा सिंग को सबक जरूर सिखाएंगे..

अगले दिन ही सुबह 4 बजे विनय जी ने भी अपना नया “लाइफस्टाइल” दिखाना शुरू कर दिया... मोबाइल स्पीकर पर भजन और मंत्र पूरे वॉल्यूम पर चला दिए.

"हरे रामा, हरे रामा.. रामा रामा हरे हरे"
“ॐ शांति… शांति… शांति…” 
"गायत्री मंत्र"
चारों ओर गूंजने लगी 

तारा सिंह माथा पीटते हुए उठा.. उसकी आँखें लाल और बाल बिखरे हुए थे...
वह भागकर विनय जी के घरआया 
“अंकल जी.. ये क्या है सुबह-सुबह?... आपने तो मेरी नींद ही खराब कर दी”

विनय जी मुस्कुराए औरबोले
“बेटा… ये भी अपुन का लाइफस्टाइल है।” 
"अंकल प्लीज़ बंद कर दो ना... अब में आगे आपकी बातों को ध्यान में रखूंगा" 
हाथ जोड़ते हुआ तारा बोले जा रहा था
विनय जी ने कहा 
"ठीक है अगर फिर से ये सब होगा तो अपुन भी अपनी लाइफ स्टाइल दिखा देंगा... समझे बच्चू"

उस दिन के बाद मोहल्ले वालों ने चैन की साँस ली .... किसी ने एक दिन विनय जी से पूछा 
"ये अब कैसे शांत हो गया...?"
विनय जी हंसते हुए बोले 
"कभी-कभी नालायक पड़ोसी को समझाने के लिए थोड़ा स्मार्ट पड़ोसी बनना पड़ता है, श्री मान जी”


कहानी: डूबती साँसे


कहानी : डूबती साँसें

बहुत तेज बारिश हो रही थी, ऐसा लगता था, ये बारिश अपने साथ सब कुछ बहा कर ले जाएगी. पुल के किनारे खड़ा राजेश इस तेज रफ्तार से बहते पानी को एकटक देख रहा था. उसके मन में भी उथल पुथल चल रही थी. उसके चेहरे पर उदासी ओर बेचैनी की रेखाएँ साफ नजर आ रही थीं. अभी कुछ दिन पहले उसकी नौकरी चली गई थी. दोस्तों ने भी दूरी बना ली और घर में भी उसकी खामोशी सबको खलने लगी थी.

राजेश पुल से उस बहती हुई नदी को देख रहा था… तेज़ रफ्तार से पानी उफान के साथ बह रहा था. उसे लगा जैसे उसकी जिंदगी की साँसें भी इसी पानी के साथ बह रही हों.  

अपने ही ख्यालों में खोये राजेश को किसी अनजान व्यक्ति की आवाज सुनाई दी
" बचाओ... बचाओ..." 
लगता है कोई मदद के लिए चिल्ला रहा है राजेश ने पीछे मुड़कर देखा, एक बुजुर्ग व्यक्ति पूल के नीचे जाने वाले ढलान पर अटके हुए थे उन्होंने अपने बचाव के लिए पेड़ की जड़ को पकड़ रखा था. और मदद की गुहार लगा रहे थे.. राजेश को देखते हुए बोले..
“बेटा, ज़रा मेरा हाथ पकड़ना, बारिश की वजह से यहां बहुत फिसलन हो रही है"
राजेश ने फुर्ती दिखाई और पूरी ताकत से उस बूढ़े व्यक्ति को ऊपर की ओर खींच लिया था. दोनों हांफने लगे थे.

बुजुर्ग ने धन्यवाद कहा और मुस्कराते हुए बोले 
“बेटा... आज तुमने मेरी डूबती साँसें बचा लीं”
राजेश भी मुस्कुराया लेकिन चुप रहा. इस ताजा घटना ने उसे हिला दिया था. उसे जिंदगी में एक एक पल का महत्व समझ में आ रहा था.

चुप्पी तोड़ते हुए बुजुर्ग व्यक्ति ने धीरे से कहा 
“जानते हो बेटा, जिंदगी भी कभी-कभी हमे इतना थका देती है कि हम खुद को ही डूबता हुआ महसूस करने लगते हैं. पर सच यह है कि जब हम किसी और को बचाते हैं… तो उसी पल हम खुद भी बच जाते हैं”

राजेश की आँखें भर आईं थीं. उसने पहली बार महसूस किया कि उसकी साँसें सच में डूब नहीं रही थीं… 

बारिश अब भी तेज हो रही थी. लेकिन रवि को लगा जैसे अब सबकुछ पहले से ज्यादा बेहतर है… उसकी डूबती साँसें फिर से धीरे-धीरे जिंदा हो रही हैं., एक नई उमीद के साथ...



कहानी: डायरी के पन्ने


कहानी : डायरी के पन्ने

रमा कॉलेज की छुट्टियों में घर आई थी. लेकिन यहां भी वह छुट्टियां बिताने के बजाय मोबाइल, लैपटॉप और असाइनमेंट के बीच हमेशा व्यस्त रहने लगी थी. 

एक दिन अपने कमरे की सफाई करते वक्त उसकी नज़र एक डायरी पर पड़ी. उसने उत्सुकतावश उस डायरी को खोला. उसके पहले पन्ने पर नीली स्याही से लिखा था ...

“प्रिय बेटी रमा 
तुम्हारे लिए"
"जब कभी तुम्हें अकेलापन सताने लगे, 
इस डायरी को खोल कर पढ़ लेना"
"पापा"

रमा अपने पापा की लिखावट पहचानती थी, पापा की लिखावट देखकर उसको रोना आ गया... उसके पापा अब इस दुनिया में नहीं थे और आज उनका लिखा यह छोटा सा नोट उसे रुला गया.. उसने डायरी को ध्यान से खोला, यह कोई प्रसिद्ध किताब और उपन्यास नहीं थी, बल्कि उसके पापा की हस्तलिखित छोटी-छोटी कहानियों, विचारों, अनुभवों और कविताओं का एक संग्रह थी. उसके पापा को डायरी, कहानी और कविता लिखने का बहुत शौक था, जिसे वे पुरानी डायरियों में लिखा करते थे.

रमा ने डायरी में लिखी पहली कहानी पढ़ी. उसे अच्छा लगा कुछ प्रेरणा मिली, उसने अन्य कहानियां भी पढ़ने की सोची.... उसने देखा हर कहानी में एक संदेश होता था जैसे संघर्ष से कभी डरना नहीं, असफलता से कभी हार ना मानकर बल्कि उससे सीखना और रिश्तों को समय जरूर देना. 

एक कहानी में उसके पापा ने लिखा था ....
“जब रास्ते धूल भरे हों, तो हिम्मत ना हारना.. खुद पर भरोसा रखना”
दूसरी में लिखा था
“सफलता का अर्थ केवल पैसा नहीं होता, मन की शांति भी जरूरी होती है”
तीसरी में लिखा था
"इंसान को पढ़ते लिखते रहना चाहिए़, इससे आत्मविश्वास बढ़ता है"
डायरी के अन्य पृष्ठों को पलटते और पढ़ते रमा की आँखें नम हो जाती थीं. उसे बचपन के दिन याद आने लगे जब उसके पापा हर रात सोने से पहले उसको कहानीयां सुनाया करते थे... तब उसे लगता था कि ये कहानियां सिर्फ मन बहलाने के लिए उसे सुनाया करते थे. लेकिन उसने आज ये महसूस किया की ये कहानियां नहीं हैं बल्कि जीवन को बेहतर ढंग से जीने के तरीके थे...

उस रात रमा ने असाइनमेंट, मोबाइल, टैब और लैपटॉप सब साइड में रख दिए और पूरी डायरी एक ही रात में पढ़ डाली... उसे ऐसा लगा जैसे उसके पापा उसके सामने बैठे हों और हर शब्द मुस्कुराते हुए उसे समझा रहे हो...

डायरी से रमा बहुत प्रभावित हुई ... उसने निर्णय लिया वह किताब लिखेगी जिसमें वो अपने अनुभवों को, अपनी भावनाओं को और अपने विचारों को कहानी या कविता के रूम में प्रस्तुत करेगी... वह चाहती है कि उसकी कहानियां सबके लिए मार्गदर्शक बने जैसे उसके पापा की लिखीं कहानियां..

रमा के हाथ में एक नई कलम और कुछ सफेद कागज थे ... उसकी जिंदगी में एक नया अध्याय जो शुरू हो चुका था...






कहानी: दहेज

कहानी : दहेज

रमा तीन भाई बहिनों में सबसे बड़ी थी... गृह कार्य में दक्ष और पढ़ाई में अव्वल... सिलाई कढ़ाई करके अपना पढ़ाई का खर्चा भी निकाल लेती थी.

आज रमा को देखने लड़के वाले आए है.  घर साफ़ और सलीके से रखा था जो गरीबी छुपाने एक प्रयास  था. चाय साधारण थी साथ में कुछ बिस्किट्स शालीनता से रखे हुए थे.

लड़के बालों ने घर में इधर उधर नजर घुमाई फिर रमा की तरफ देखा, उससे घर परिवार और पढ़ाई लिखाई के बारे में पूछा. जो सब सामान्य बातचीत का हिस्सा था.

इधर उधर की बातों को विराम देते हुए... लड़के के पिता ने गला साफ करते हुए कहा
“देखिए वर्मा जी आजकल खर्चे बहुत बढ़ गए हैं...  मैं जानना चाहता हूँ कि शादी थोड़ा अच्छी हो जाय... तो आपने कुछ खर्च का सोचा होगा मेरा मतलब आजकल के चलन के अनुसार लेनदेन के रिवाज के बारे में”
लड़के का बाप अप्रत्यक्ष तरीके से दहेज की बात कर रहा था. रमा की मां उनकी मंशा समझ गई थी.. पिता भी निरुत्तर हो गए थे. एक चुप्पी सी छाई हुई थी.

दरवाजे की पीछे रमा ये सब सुन रही थी ओर समझ भी रही थी.. बिना समय गंवाए हाथ में खर्चों की फाइल लेकर आई और उसने लड़के वालों के सामने फाइल रख कर बोली...
"ये है हमारे लालन पालन और पढ़ाई का खर्चों की फाइल, हमने ज़िंदगी का हर खर्च खुद उठाया है और हम ये नहीं चाहती कि कोई हमारा खर्चा उठाए... मैं अपने माता पिता पर बोझ नहीं हूं... उनकी जिम्मेदार संतान हूं... मैं यह भी नहीं चाहती ... मेरे माता पिता मेरी शादी कोई तकलीफ उठाकर करें"

कमरे सन्नाटा सा छा गया... लड़के वाले निरुत्तर हो गए थे... उन्होंने जाना ही बेहतर समझा... चाय प्याले में अब भी वैसी की वैसी राखी थी... लड़के के पिता ने वर्मा जी से बिना नजरें मिलाए कहा
"जी अब हम चलते हैं"

लड़के वालों के जाने के बाद रमा के माता पिता अपने आप को कोस रहे थे... अपनी गरीबी को कोस रहे थे... रमा की शादी फिर तय होते होते रह गई.

रमा को दहेज के नाम से घिन होने लगी थी... उसने कुछ करने की ठानी... रमा को पढ़ाई में अव्वल आने की वजह से वजीफा मिलना तय हुआ...

रमा अब शहर आ गई थी...  वो अब पीछे मुड़कर नहीं देखेगी... माता पिता का नाम रोशन करेगी... जीवन पथ पर  आगे बढ़ेगी और अपने सपनो को साकार जरूर करेगी...

कहानी: पूनम का चांद


कहानी : पूनम का चांद

निशा की मृत्यु उसी दिन हुई थी, जब पूनम का चाँद अपने पूरे यौवन पर था.. खुली हुई खिड़की से झांकती चाँदनी उसे अपने साथ ले जा रही थी.

नितेश को पहली बार ये पूनम का चांद और उसकी चांदनी बैरी नजर आ रहे थे. उसे लगा इसी उजले चांद ने उसके साथ छल किया है... यही निशा को उससे छीन के ले गया है...

नितेश वक्त काट रहा था, उसके दोस्त लोग समझते रहते थे 
"निशा की मृत्यु दुखद है लेकिन किया क्या जा सकता है ये समय का चक्र है और ये समय ही एक दिन सब ठीक कर देगा" 
लेकिन नितेश आज भी यही सोचता है.. ये समय कुछ भी ठीक नहीं करता है...

हर महीने जब भी पूर्णिमा आती है, नितेश रात को घर के बाहर ही नहीं निकलता बल्कि घर की खिड़कियाँ और दरवाजे सब बंद कर देता, चांद और चाँदनी को अपना दुश्मन मानने लगा था.

उसने नदी किनारे जाना छोड़ दिया, बरगद के पेड़ के नीचे बैठना छोड़ दिया और उस पहाड़ी मंदिर के पास जाना छोड़ दिया जहां वो पहली बार निशा से मिला था...

उसे बस इंतजार रहता था... पर किसका ये उसको खुद को भी नहीं मालूम. निशा का भी नहीं जो उसको इन चांदनी रातों में, नदी के किनारे पुकारा करती थी.. 

निशा को गए  पूरा एक साल हो गया... आज उसकी  पहली बरसी थी... नितेश देख रहा था.. वही पूनम का चांद आज भी पूरे यौवन के साथ चमक रहा है.... 

नितेश कहने को तो आडंबर रहित एक आधुनिक व्यक्ति है फिर भी वह जमाने के साथ चलता है. वह आत्मा और पुनर्जन्म जैसी विचारधाराओं में विश्वास रखता है..

नितेश पानी में पैर डाले बैठा था... चांद का प्रतिबिंब पानी पर साफ और सुंदर दिखाई दे रहा था... पूरे एक साल के बाद  आज वह चांद को फिर से निहार रहा था... मानो कह रहा हो 
“ओ चांद तुम जीत गए हो और मैं हार गया” उसकी आंखों में अब निशा का इंतजार भी खत्म होता सा प्रतीत हो रहा था... यहां तक कि वह अपने अकेलेपन से भी घबरा रहा था. उसके आंसू भी सूख चुके थे.. उसने चांद की तरफ देखा और भावनाओं में बहकते हुए कहने लगा
"ए चांद तुम निशा को तो ले गए हो ... अब उसका ध्यान तुम ही रखना" यह कहते हुए वो जोर जोर से रोने लगा.. 

उसे लगा, प्रेम कभी मरता नहीं है, बस अधूरा रह जाता है और ये अधूरापन ही उसका बैरी है.. इसमें इस बिचारे चांद का क्या दोष..

नितेश अब चाँद की चांदनी में निशा को ढूंढने लगा था... उसे लगने लगा निशा चांद में समा गई है और उसकी चांदनी प्यार बन कर बरस रही है.. 

अब नितेश के लिए चांद बैरी नहीं रहा.. उसने फिर से चांद की तरफ देखा और लड़खड़ाते कदमों से घर की ओर जाने लगा.....



कहानी: संगम


कहानी : संगम 


शाम ढलने लगी थी ... गहरी सुनहरी किरणें राणा प्रताप सागर की बहती जलधारा की सतह पर बिखर रही थी.. दोनो का मिलन, ऐसा लगता था जैसे शाम को दो प्रेमी मिल रहे हों... और जल की मधुर आवाज जैसे कोई गीत गुनगुना रहा हो..

सागर किनारे खड़ा नीलेश ये नजारा देख रहा था... ऊंचे ऊंचे पर्वत... दूर दूर फैला सागर का शांत जल, जिसमें दिखाई देती थीं पहाड़ियों की परछाइयाँ और कहीं दूर ढलता हुआ सुनहरी सूरज. 

ऐसे में किसी ने पुकारा
"हेलो नीलेश" 
नीलेश एक क्षण चौंका फिर पलट कर बोला
"ओ हाय नीलम"
दोनों ने एक दूसरे को देखा और मुस्कुराने लगे.
"आप बोर तो नहीं हो रहे थे" नीलम ने नीलेश के चेहरे के भावों को पढ़ते हुए कहा..
"नहीं तो मैं तो इन सुंदर नज़ारों का आनंद ले रहा था"
नीलेश ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया.

ये दोनों की पहली मुलाकात थी. दोनों के मन में असंख्य प्रश्न थे. दोनों के दिल धड़क भी रहे थे.
"बहुत सुंदर जगह है" नीलेश ने चुप्पी तोड़ी.
"मै अक्सर यहां आती रहती हूँ.. मुझे यहां ढलता हुआ सूरज देखना बहुत अच्छा लगता है" नीलम ने अपने मन की बात कह दी.
"चलो वहां उस पत्थर पर बैठते है" नीलेश ने आग्रह किया तो नीलम ने उसे स्वीकार कर लिया.

शादी डॉट कॉम के जरिये ये उन दोनों की पहली मुलाकात थी... शाम अब गहराने लगी थी...  दोनों के लिये अब ये शाम रोमांटिक होती जा रही थी... थोड़ी देर में दोनों ने अपने अपने विचारों का आदान प्रदान किया... ढेर सारी बातें हुई... शंकाओं का समाधान हुआ... भविष्य की बाते हुई... कुछ काम की बाते भी हुई... और फ़िर उनकी ये बातें कब प्यार में बदल गई.
"मुझे तुम पसंद हो, क्या मैं तुम्हें ?? " 
नीलेश ने रोमांटिक होते हुए पूछा 
"हां" 
इतना बोलते ही नीलम शरमा गई, उसके गाल शरम से लाल हो गये थे.

नीलेश ने नीलिमा का हाथ पकड़ा और गाने लगा
“चाँद सी महबूबा हो मेरी कब ऐसा मैंने सोचा था… हां तुम बिल्कुल वैसी हो जैसा मैने सोचा था"

दोनों एक दूसरे का हाथ थामे... सागर किनारे किनारे चलने लगे... नीचे अथाह जल ... ऊपर अनंत आकाश...   इनके बीच ये दो अंजान अपना छोटा-सा संसार रच रहे थे...  बातचीत साधारण थी पर हर शब्द में एक नई शुरुआत की स्वीकारोक्ति थी.

सूरज अब पूरी तरह ढल चुका था...  आकाश में असंख्य तारे उतर आये थे... हल्की चाँदनी भी उतर आई थी... नीलेश का गया गीत सार्थक हो रहा था. 
दोनों वापसी की तैयारी में थे. दोनों जाना नहीं चाह रहे थे. अब कोई औपचारिकता भी नहीं थी,  एक नए बंधन की तैयारी थी. 
नीलेश ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा
"नीलू चलते हैं... जल्दी ही .. फिर मिलेंगे" 
"हां नीलेश" 
कहते हुए नीलम धीरे धीरे घर की तरफ मुड़ने लगी... बिछुड़ने का ग़म दोनों को ही हो रहा था.
उस दिन राणा प्रताप सागर के जल में उनका प्रतिबिंब एक संगम बन गया था..

 

कहानी: निंदिया और बिंदिया

कहानी: निंदिया में बिंदिया 

गजेंद्र अपने बेड रूम में लेटा अपनी पत्नी प्रिया की फोटो को निहार रहा था. मुस्कुराती हुई प्रिया के माथे पर लाल लाल गोल बिंदी बहुत प्यारी लग रही थी. गजेंद्र अक्सर गुनगुनाया करता था
"आय हाय तेरी बिंदिया रे"
और वो कहती थी 
"तेरी निंदिया ले लेगी मेरी बिंदिया रे"
सच में जब से वो गई है, गजेंद्र की निंदिया में बिंदिया छाई रहती है"

उसे याद आया प्रिया को तो बिंदी बहुत पसंद थी, चाहे शादी फंक्शन हो या पीहर जाना हो उसके मेक अप बॉक्स में तरह तरह की मैचिंग बिंदिया जरूर होती थीं. कई बार तो हॉस्पिटल भर्ती होने से पहले अपने समान में बिंदी रखना नहीं भूलती थी. अगर भूल भी जाती तो कहती " जी मैं बिंदी भूल आई हूँ लेते आना" 
जब गजेंद्र बिंदिया ले कर जाता तो कहती थी
"अरे जी ये वाली नहीं चाहिए थी, तुम भी ना एक भी काम ढंग से नहीं करते हो" 
ये सब सोचते सोचते उनकी आँखों कुछ गीली हो जाती थीं.

प्रिया को गये करीब 4 वर्ष बीत गए. उसके जाने के बाद
घर में कई चीज़ें बदलीं, नहीं बदली तो उसकी बिंदी वाली फोटो और उसकी जगह. 

गजेंद्र अब भी प्रिया के साथ उसी कमरे में अपने आप को कैद कर लिया है, मानो प्रिया कह रही हो जी तुम मेरे सामने रहो और रोज़ मेरी बिंदी निहारा करो. जी मैडम, उसने तस्वीर की तरफ देखा और मुस्कुरा उठा.. 

एक छोटी सी बिंदी ने उसका जीवन अभी भी थाम के रखा है...


कहानी: अकेलापन

अकेलापन 

रात के करीब ग्यारह बज रहे थे. शहर की एक आलीशान बिल्डिंग के तीसरे माले पर खड़ा आरव नीचे की ओर देख रहा था.. इतनी रात को भी गाड़ियों का मेला सा लगा हुआ था... कुछ गाड़ियां थमी थीं.. कुछ भाग रही थीं, लोग भाग रहे थे, समय भी भाग रहा था. वह उदास सा इन सबको देख रहा था. उसके कमरे में ठहरा हुआ सन्नाटा सा था.

आरव की दिनचर्या मे दिन भर दफ्तर में लोगों से घिरा रहना, मीटिंग, ईमेल, फोन कॉल औरभी बहुतकुछ. शाम जब वो फ्लैट का दरवाज़ा खोलता, सारा शोर बाहर रह जाता और उसके भीतर एक खालीपन आ जाया करता था.

अक्सर चाय का कप लिए वह बालकनी से बड़ी बड़ी इमारतों की खिड़कियां की जलती बुझती रोशनी देखता जैसे हर फ्लैट की अपनी कोई कहानी चल रही हो. उसे लगता था कि इतनी भीड़ के बीच भी वह अकेला कैसे है?

एक रात उसने चाय वाले को देखा. कुछ लोग उस ठेले के पास खड़े हँस हँस कर बतियारहे थे और चाय सिगरेट का आनंद ले रहे थे. उसकी हिम्मत नहीं हुई उनकी बातों में शामिल होने की. चाय का गिलास खत्मकर आरव अपने फ्लैट पर आ गया.

आरव दफ्तर से लौटते वक्त रूटीन से उसके ठेले से चाय पीता. उसकी चाय वाले से बातचीत भी शुरू होने लगी, कभी मौसम की, काम की, शहर की और भी चीज़ों की. अब ये ठेला आरव की शाम का हिस्सा बन गया था. उसे लगने लगा था उसकी तरह ही यहाँ कॉलेज के छात्र , ऑटो चालक , ऑफिस के लोग औरभी लोग.. सब अपने अपने अकेलेपन को दो घूँट चाय में घोल रहे थे.

आरव महसूस करने लगा कि शहर में अकेलापन भीड़ की कमी से नहीं, जुड़ाव की कमी से होता है. उसने सोचा अब अकेलेपन को हराया जाय ... अब आरव ने कुछ नया करने की सोची उसने स्केच बनाना, पार्क में बैठकर लोगों के चेहरे पढ़ना, फोटोग्राफी करना, छुट्टी के दिन किसी नजदीक जगह घूमने चले जाना और व्यस्त रहना शुरू कर दिया.

अब उसका कमरा पहले जैसा खाली नहीं रहता था. 
खिड़की से दिखती रोशनियाँ भी अब अनजानी नहीं थीं. 
उसे समझ आ गया था... अकेलापन कोई दीवार नहीं है बल्कि एक पुल है जो उस पार क्या है.. दिखाता है..

आरव अब अकेला नहीं था उसे शहर में धड़कन महसूस होने लगी थी...

कहानी : मैं फिर लौटूंगा


मैं फिर लौटूंगा
 

वरुणेश एक कॉल सेंटर में काम करता है .. कुछ दिनों से उसे अच्छा नहीं लग रहा था... वह कुछ थका और असहाय सा महसूस कर रहा था.. काम के बोझ से, इस देश की राजधानी के पोल्यूशन से, भीड़ से और ऊंची ऊंची बिल्डिंग से वह घुटन महसूस कर रहा था. वह अक्सर सोचा करता था पैसों की चाहत ने इंसान को मशीन ही बना डाला.

वरुणेश को अब शांति की जरूरत महसूस हुई. उसने सोचा दो दिन की छुट्टी पर कहीं शांत और एकांत वाली जगह चला जाय. शुक्रवार की शाम का दिन था उसने फटाफट जरूरी सामान के साथ बैंग पैक किया और निकल पड़ा बस अड्डे की तरफ, बिना किसी तय मंज़िल के.

विशाल बस अड्डा... ... जहाँ देखो बसें ही बसे, चिल्ल पों मची हुई थी, कन्डेक्टर अपनी अपनी बसों को भरने में लगे थे... वरुणेश के सामने एक बस वाला चिल्ला रहा था 
"नॉन स्टॉप... ऋषिकेश... ऋषिकेश"

बारुणेश ने क्षण भर के लिए सोचा फिर फटाफट बस के अंदर प्रवेश किया... बस भर चुकी थी... थोड़ी देर में कंडक्टर ने टिकट भी बना दिया.. बस चल रही थी ... हवा के ठंडे झोंको ने उसे सुला दिया...

सुबह हो चुकी थी. कंडक्टर ने उसे जगाया 
"सर .. ऋषिकेश आ गया है"
"ओह" उसने कंडक्टर को धन्यवाद दिया.

शांत सुबह... हरी भरी पहाड़ीयों के किनारे माँ गंगा तीव्र गति से बह रही थी. असीम शांति थी, मनोरम दृश्य था और नदी के किनारे एकांत था. वरुणेश ने बिना समय गवाएं नदी के तट की ओर बढ़ा... घाट की सीढ़ियों पर बैठा नदी के बहाव को देख रहा था. सोच रहा था.. जीवन में इंसान को भी को इसी तरह चलते रहना चाहिए... सतत.

उसने महसूस किया ... पहाड़ों की गोद में बसा यह छोटा सा स्थान किसी दैविक जगह से कम नहीं है. उसे हवा में ठंडक और ताज़गी महसूस हुई... दूर किसी मंदिर से घंटी की आवाज उसे एक मधुर संगीत की तरह महसूस होने लगी. वह इस अनुपम सौंदर्य का आनंद लेने लगा. उसे लगा प्रकृति उसे प्यार कर रही है छोटे बच्चे की तरह दुलार रही है.

पास खड़े एक वृद्ध साधु ने मुस्कुराकर कहा
“बेटा, यहाँ लोग सवाल लेकर आते हैं और शांति लेकर जाते हैं।”
"जी बाबा आप सही कह रहे हैं" 
वरुणेश ने आँखें बंद कर लीं, उसे देख शहर की भागती सड़कें, अधूरे काम, उलझी बातें सब धीरे-धीरे धुँधली हो रहीं थीं.

उसे सब समझ आ गया था. प्रकृति समाधान नहीं देती है बल्कि वह मन को इतना शांत कर देती है कि समाधान स्वयं दिखाई देने लगते हैं.

दिनभर वह गंगा के किनारे घूमता रहा.. शाम को जब सूरज पहाड़ों के पीछे उतर रहा था, आकाश का रंग गहरा पीला हो रहा था. वरुणेश मन ही मन आनंदित होकर बोला,
“जब भी मेरा मन उदास होगा" 
फिर माँ गंगा की तरफ मुखातिब होकर बोला..
"माँ ... मैं फिर लौटूँगा, आपसे मिलने" 
सूरज ढल रहा था, फिर एक नई सुबह के लिए...



कहानी: पूनम का चाँद




कहानी: पूनम का चाँद

लोकेश की आँखों में आँसू चमक रहे थे.. उसने आकाश की ओर देखा... आज पूनम का चाँद कुछ अलग सा था, संपूर्ण, उजला और निर्विकार जैसे उसे दीन दुनिया से कोई सरोकार न हो. आँगन में दूधिया रोशनी फैल रही थी, मगर लोकेश के भीतर अँधेरा गहराता चला जा रहा था... उसे कुछ सूझ नहीं रहा था. उसकी पत्नी इस दुनियां को अलविदा कह चुकी थी.

अस्पताल की सफ़ेद दीवारें और चादरें उसकी आँखों में चुभ रहीं थीं.. मशीनों की आवाज़, डॉक्टरों की औपचारिक बातें, लापरवाह नर्सिंग स्टाफ, पीला होता उसका चेहरा और उसकी ठंडी होती उसकी हथेली... सब कुछ उसको धीरे धीरे फिल्मी सीन की तरह नज़र आ रहा था... 

उसने महसूस किया ... सफेद चादर में लिपटी उसकी पत्नि मानो कह रही हो...
“लोकेश प्लीज रोना मत, ये मौत किसी की सगी नहीं होती.... क्या पता कब किसका साथ छोड़ दे”  
लोकेश रोया तो नहीं… लेकिन आंसुओं को छिपा भी नहीं पाया... लोग आते गये ... समझाते गये. कुछ मौन रूप से सहानुभूति जताते गये.. कुछ तो ज्ञान भी बांट गये “रोने से कोई फायदा नहीं.. ये समय है... सब ठीक कर देगा.. धैर्य रखना” उन नादानों को क्या मालूम समय क्या जानता है और वो क्या ठीक करेगा.. क्या बीता वक्त लौट के आयेगा???

लोकेश ने फिर चांद की तरफ देखा... रातों का राजा पूनम का चाँद, उसे अब बैरी लगने लगा था... 





कहानी: बिंदी


कहानी : बिंदी

प्रिया को रंग बिरंगी बिंदीयां बहुत पसंद थी.. उसके बैग में बहुत सी बिंदियों के पैकेट हुआ करते थे... उसके माथे पे गोल गोल बिंदी चांद की तरह दिखती थी.. उसे लगता था ये बिंदियां जैसे उसके माथे पर ठहरा हुआ आत्मविश्वास हो. 

जब भी वह आईने के सामने खड़ी होती तो अपने आप से ही पूछने लगती "मैं ठीक तो लग रही हूँ ना ?” और हँस पड़ती..

एक दिन वो चली गई... बहुत दूर... चांद के पास.. पूनम के चांद ने उसे छीन लिया था. उसकी बिंदियों का डिब्बा अब भी अलमारी में रखा हुआ है... उसकी याद के तौर पर... अलग-अलग रंग, अलग-अलग आकार और सबसे ऊपर वही लाल बिंदी जो उसने मिलन की रात लगाई थी. इसे वह सुहाग की निशानी मानती थी... हर करवा चौथ पर इसे ही लगती थी. मानो उसका व्यक्तित्व और चेहरे की सारी पहचान इस बिंदी में सिमट आई हो .... ठीक वैसे ही जैसे रात के आगोश में पूनम का चाँद..

चाँद तो आज भी आता है रोज़ आता है... लेकिन एक बिंदी के बिना उसका श्रृंगार अधूरा है... और मेरी जिंदगी का भी....

कहानी : मतलबी दुनियां


मतलबी दुनियां 

नीरज के फोन में हज़ारों कॉन्टैक्ट थे, जिनमें उसके रिश्तेदार और बहुत से दोस्त शामिल थे. लेकिन एक बार जब उसे उनकी जरूरत पड़ी सब नदारद थे.

वैसे तो वॉट्सएप ग्रुप पर वह बहुत काम का लड़का कहलाता था... किसी का रेज्यूमे बना देता, किसी का फार्म भर देता, किसी को पढ़ाई में गाइड कर देता और कोई ना की बहाने सभी का कुछ ना कुछ काम कर ही देता था. यानी यूं कहो कि सोशल मीडिया की दुनियां में छाया रहता था.

एक रात जब उसकी नौकरी चली गई, सुबह उसने स्टेटस लगाया
“कुछ दिनों से मुश्किल में हूँ।”

उसके स्टेटस पर व्यूज़ तो बढ़े, लेकिन मैसेज बॉक्स खाली ही रहा. जिसने कल तक कहा था
“भाई तू है तो सब आसान है”
आज वही बोले 
“यार अभी टाइम नहीं है।”

नीरज ने तब समझा, ऑनलाइन दुनिया में लोग डाटा की तरह होते हैं. ज़रूरत हो तो डाउनलोड,काम खत्म तो डिलीट.

उस दिन उसने एक चीज़ बदल ली, नया स्टेटस नहीं लगाया, बस एक नया रास्ता चुना. कम लोगों से बात करने लगा और पर सच्ची लेकिन कम मदद करने लगा,
वो भी बिना लाग लपेट के, निस्वार्थ.

समय के साथ उसके फोन के कॉन्टैक्ट कम हुए, लेकिन ज़िंदगी में शांति बढ़ गई. आज नीरज के पास फॉलोअर्स कम हैं पर जो भी हैं अपने है.

आज उसने एक सबक सीख लिया, आधुनिक मतलबी दुनिया में सबसे बड़ी समझदारी है, खुद को “ऑफलाइन” रखकर सही लोगों से जुड़ना और आगे बढ़ना.


कहानी : अलविदा

अलविदा

“हैलो… बेटा कैसे हो ?”
मां की आवाज में कंपन था
“सुन रहा हूं, जल्दी बोलो मम्मा. मैं अभी मीटिंग में हूं बाद में कॉल करता हूं"
हिमांशु फुसफुसाते हुए बोला
“कुछ नहीं बेटा… बस यूँ ही।”
उसकी मां की आवाज में बेबसी थी
“चलो मम्मा बाद में बात करता हूँ।”
हिमांशु ने तुरंत फोन काट दिया

कुछ घंटे ही बीते थे कि अस्पताल से फोन आया
“आपकी माँ…”
ऑफिस का काम छोड़ हिमांशु दौड़ता हुआ हॉस्पिटल पहुँचा, देखा माँ बेड पर आँखें मूंदे लेटी हुई थी

नर्स ने हिमांशु के हाथ में मोबाइल पकड़ाया और बोली 
“आपकी माता जी ने बस इतना ही कहा
"इसे मेरे बेटे को दे देना”

हिमांशु ने फोन खोला, स्क्रीन पर आख़िरी कॉल चमक रही थी
"Duration : 11 seconds"
हिमांशु को याद आया अभी कुछ समय पहले ही उसकी माँ ने कहा था, 
"कुछ नहीं… बस यूँ ही"
जैसे वो कहना चाह रही हो
“बेटा अब ज़्यादा समय नहीं है”

हिमांशु ने सिसकते हुए फोन को सीने से लगाया. उसको समझ आ गया था कभी कभी ‘बस यूँ ही’ कॉल अलविदा की भी हो सकती है..


कहानी: नेता

कहानी : नेता

गाँव में पंचायत के चुनाव जोरों पर थे. भाषणों की तो बाढ़ आई हुई थी. नेता अपना अपना राग अलाप रहे थे.
उनमें से एक नेता कहता है
"सिर्फ मुझे ही वोट देना, देखना मैं गांव की तस्वीर बदल दूंगा"
दूसरा नेता कौन सा कम था, वो बोला 
"मैं इसे शहर की सुविधाओं से भर दूंगा"
सब चुनाव जीतने के लिए हर हथकंडे अपना रहे थे .

इसी गांव का  एक समाज सेवक हरिया ये सब सुनकर हंस रहा था. उसको मालूम था कि ये चुनाव जीतते ही गायब हो जायेंगे.

हरिया बहुत ही मेहनती व्यक्ति था. गांव के विकास में उसका भरपूर योगदान रहता था, श्रम से कभी नहीं घबराता था. जहां जरूरत पड़े वहां तुरंत पहुंच जाता था. गाँव की टूटी सड़क पर खुद फावड़ा चलाकर सड़क ठीक कर देता था. रात को अगर किसी स्कूल की छत टपकती थी तो बच्चों के साथ बैठकर टिन लगा देता था.

कुछ चुनिंदा लोगों के दबाव पर उसने चुनाव लड़ने की ठानी यह सोचते हुए कि वह गांव का भरपूर विकास करेगा.

चुनाव का दिन आया. लोगों ने पूछा
“अरे हरिया, तू किस पार्टी से है?”

हरिया मुस्कराया और बोला
“भाई, मैं काम की पार्टी से हूँ, और हमेशा काम की बात करता हूं, चाहे हारूं या जीतूं”

खैर चुनाव के नतीजे आए. नतीजे हरिया के लिए चौंकाने वाले थे. नतीजों में हरिया हार गया था. उसे थोड़ा बुरा जरूर लगा. उसने निर्णय लिया ओर गांव वालों से बोला
"अब वो कभी कोई चुनाव नहीं लड़ेगा"

अगले दिन हरिया फिर वही गांव की सड़कें ठीक करने के लिए सड़क पर फावड़ा चला रहा था.
ये देख गांव  का एक युवक बोला 
“हरिया काका, आप तो चुनाव हार गए थे ना ?”
हरिया मुस्कराया और  युवक  के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला 
“ बेटा चुनाव हार सकता हूँ पर गाँव नहीं ... जब तक जिऊंगा गांव की सेवा करता रहूंगा”
जोश में युवक ने भी फावड़ा थाम लिया, देखा देखी और भी युवक जुड़ने लगे.

चुनाव का मंच अब सूना पड़ा था, जीतने वाला नेता गायब था. 

अब सड़क पर कई निस्वार्थ नेता खड़े हो गए थे. वो भी बिना वादे और कुर्सी के.
सिर्फ और सिर्फ काम के लिए.


कहानी: प्लेटफार्म नंबर एक

प्लेटफ़ॉर्म नंबर एक 

नई दिल्ली स्टेशन और शाम का समय. अचानक ट्रेन आने का अनाउंसमेंट हुआ.
"चंडीगढ़ से अजमेर जाने वाली गाड़ी संख्या 12986 प्लेट फॉर्म नंबर 1 पर आने वाली है, जिन यात्रियों को जयपुर होते हुए अजमेर जाना है वो प्लेटफार्म नंबर 1 पर शीघ्र पहुंचे"

हरीश प्लेटफ़ॉर्म के पास की बेंच पर बैठा और आने जाने वाली ट्रेनों को और दौड़ते भागते इंसानों को देख रहा था. उसके हाथ में एक पुराना सा थैला था और आँखों में किसी अपने का इंतजार.

यह वही स्टेशन है जहां वह कई बार आया है कभी लेने आता तो कभी छोड़ने. उसकी बेटी पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ जो गई थी. जब भी जाती थी उदास होकर बोलती थी
“पापा,  आप चिंता मत करो मैं जल्दी ही लौटूंगी . वो भी इसी प्लेटफार्म नंबर 1 पर”

ट्रेन के अनाउंसमेंट ने हरीश के कान खड़े कर दिए, अरे इसी ट्रेन से तो मेरी बेटी आ रही है, वह प्लेटफार्म नंबर एक की तौरफ दौड़ रहा था.  ट्रेन भी पहुंच चुकी थी.  बोगी के बाहर खड़ा वो बेसब्री से बेटी का इंतजार कर रहा था.

अचानक भीड़ में एक जानी-पहचानी  मधुर आवाज़ सुनाई दी
“पापा…!”

हरीश ने सिर घुमाकर देखा. फिर वही चेहरा, वही आँखें वह कुछ कहता उसकी बेटी पिता से लिपट गई.

हरीश की आंखों में आँसू थे. उसकी बेटी अब हमेशा उसके साथ रहेगी. उसकी आवाज़ भरभरा रही थी. इतने में उसकी बेटी बोली 
“ अरे पापा अब क्यों उदास हो रहे हो,अब तो आपका इंतजार हमेशा के लिए खत्म हुआ, मेरी पढ़ाई जो पूरी हो गईं अब हम सब साथ रहेंगे"

हरीश को आज समझ आया… हर स्टेशन मंज़िल नहीं होता, बस कुछ अपनों के पास लौटने के लिए भी होते हैं. स्टेशन वही था, प्लेटफ़ॉर्म वही था… लेकिन हरीश का इंतज़ार अब ख़त्म हो गया था.

हरीश कुछ बोलता उसकी बेटी बोली 
"तो  पापा चलें ... अपने घर" 
दोनो मुस्कुरा रहे थे ... स्टेशन धीरे धीरे पीछे छूट रहा था...


कहानी: खिड़की


खिड़की

शहर के सबसे  पुराने पॉश एरिए में एक पुराना मकान. उसी मकान में एक बुजुर्ग अकेले रहते थे जो अक्सर उस मकान की खिड़की के पास सुबह से शाम बैठे नजर आते थे. उनका ध्यान बाहर आते-जाते लोगों को और बच्चों को देखने में बीतता था. लोग उन्हें देखकर सोचते हैं..
" इस उम्र में भी बेचारे, कितने अकेले हैं, इनके बच्चे इनका ध्यान क्यों नहीं रखते ?”

एक युवक जो उनको रोज देखा करता था, एक दिन वह कुछ सोचते हुए उनके पास गया और कहने लगा
“अंकल जी आप अकेले रहते हो और हर समय खिड़की के पास बैठे बाहर क्या देखते रहते हो. क्या आपको अकेलापन नहीं लगता?”

बुज़ुर्ग थोड़ा मुस्कराए और फीकी हंसी के साथ बोले,
“नहीं बेटा, मैं दिखने में अकेला हूं पर अकेला नहीं हूँ. मेरी पत्नी की यादें मेरे साथ है और इस खिड़की के पास बैठकर मैं ज़िंदगी को अनुभव करता हूं, देखता हूं और सोचता रहता हूं. इस दुनियां के नित नए बदलते स्वरूप को देखता रहता हूँ”

युवक उनकी दार्शनिक बातें सुनकर चुप हो गया.
बुजुर्ग ने युवक की तरफ देखा और बोले 
“दरवाज़े बंद करने से इंसान अपने आप को सुरक्षित तो महसूस करता है लेकिन खिड़की खुली हो तो वह अपने आपको ज़िंदा भी महसूस करता है”

युवक कुछ महीनों के लिए कैसी दूसरे शहर चल गया था. जब एक दिन  वह शहर लौटा तो उसका ध्यान उन बुजुर्ग के मकान पर गया . उसने देखा खिड़की बंद थी और दरवाजे पर एक नोटिस टँगा था
“मकान बिकाऊ है।”
यह देख युवक ठिठक गया और सोचने लगा अचानक ये क्या हुआ, वो बुजुर्ग कहां चले गए. अनहोनी की आशंका से वह थोड़ा घबरा सा गया था.

वह ये सब खड़ा देख सोच रहा था कि उसके कंधे पर किसी ने अपना हाथ रखा
"अरे भाई मोहन तुम्हे जानकर दुःख होगा, कुछ दिन पहले उन बुजुर्ग की मृत्यु हो गई. शहर से उनके बेटे बहु आए थे क्रिया कर्म की रस्म निभाई और ये बेचने का बोर्ड लगा गए "

"ओह ये बड़ा दुखद है" 
यह कहते हुए युवक उस बंद खिड़की के पास गया. उसे खोलने लगा और उसने देखा, बाहर ज़िंदगी वैसी ही थी, सब कुछ वैसे ही चल रहा था वही खेलते हुए बच्चों की हँसी, धूप और भागती हुई हवा.

ये सब देख उसे एहसास हुआ, बुज़ुर्ग तो चले गए, लेकिन ज़िंदगी को इस तरह महसूस करने की आदत यहीं छोड़ गए.

युवक ने खिड़की बंद नहीं की क्योंकि कुछ पुराने घरों की खिड़कियां बुजुर्गों के लिए जीने के सहारा और जिंदगी होती है तो कुछ लोगों के लिए विरासत या फिर सन्नाटा एक गहरा सन्नाटा.