कहानी: पूनम का चांद


कहानी : पूनम का चांद

निशा की मृत्यु उसी दिन हुई थी, जब पूनम का चाँद अपने पूरे यौवन पर था.. खुली हुई खिड़की से झांकती चाँदनी उसे अपने साथ ले जा रही थी.

नितेश को पहली बार ये पूनम का चांद और उसकी चांदनी बैरी नजर आ रहे थे. उसे लगा इसी उजले चांद ने उसके साथ छल किया है... यही निशा को उससे छीन के ले गया है...

नितेश वक्त काट रहा था, उसके दोस्त लोग समझते रहते थे 
"निशा की मृत्यु दुखद है लेकिन किया क्या जा सकता है ये समय का चक्र है और ये समय ही एक दिन सब ठीक कर देगा" 
लेकिन नितेश आज भी यही सोचता है.. ये समय कुछ भी ठीक नहीं करता है...

हर महीने जब भी पूर्णिमा आती है, नितेश रात को घर के बाहर ही नहीं निकलता बल्कि घर की खिड़कियाँ और दरवाजे सब बंद कर देता, चांद और चाँदनी को अपना दुश्मन मानने लगा था.

उसने नदी किनारे जाना छोड़ दिया, बरगद के पेड़ के नीचे बैठना छोड़ दिया और उस पहाड़ी मंदिर के पास जाना छोड़ दिया जहां वो पहली बार निशा से मिला था...

उसे बस इंतजार रहता था... पर किसका ये उसको खुद को भी नहीं मालूम. निशा का भी नहीं जो उसको इन चांदनी रातों में, नदी के किनारे पुकारा करती थी.. 

निशा को गए  पूरा एक साल हो गया... आज उसकी  पहली बरसी थी... नितेश देख रहा था.. वही पूनम का चांद आज भी पूरे यौवन के साथ चमक रहा है.... 

नितेश कहने को तो आडंबर रहित एक आधुनिक व्यक्ति है फिर भी वह जमाने के साथ चलता है. वह आत्मा और पुनर्जन्म जैसी विचारधाराओं में विश्वास रखता है..

नितेश पानी में पैर डाले बैठा था... चांद का प्रतिबिंब पानी पर साफ और सुंदर दिखाई दे रहा था... पूरे एक साल के बाद  आज वह चांद को फिर से निहार रहा था... मानो कह रहा हो 
“ओ चांद तुम जीत गए हो और मैं हार गया” उसकी आंखों में अब निशा का इंतजार भी खत्म होता सा प्रतीत हो रहा था... यहां तक कि वह अपने अकेलेपन से भी घबरा रहा था. उसके आंसू भी सूख चुके थे.. उसने चांद की तरफ देखा और भावनाओं में बहकते हुए कहने लगा
"ए चांद तुम निशा को तो ले गए हो ... अब उसका ध्यान तुम ही रखना" यह कहते हुए वो जोर जोर से रोने लगा.. 

उसे लगा, प्रेम कभी मरता नहीं है, बस अधूरा रह जाता है और ये अधूरापन ही उसका बैरी है.. इसमें इस बिचारे चांद का क्या दोष..

नितेश अब चाँद की चांदनी में निशा को ढूंढने लगा था... उसे लगने लगा निशा चांद में समा गई है और उसकी चांदनी प्यार बन कर बरस रही है.. 

अब नितेश के लिए चांद बैरी नहीं रहा.. उसने फिर से चांद की तरफ देखा और लड़खड़ाते कदमों से घर की ओर जाने लगा.....



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