गायत्री माता और मंत्र


माता गायत्री और गायत्री मंत्र
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में गायत्री माता को वेदों की जननी और ज्ञान की अधिष्ठात्री शक्ति माना गया है. माता गायत्री,  केवल एक देवी स्वरूप नहीं हैं, बल्कि प्रकाश, चेतना और विवेक की प्रतीक भी हैं.

गायत्री माता का स्वरूप
धार्मिक ग्रंथों में देवी गायत्री को पाँच मुख और दस भुजाओं वाली दिव्य शक्ति के रूप में चित्रित किया गया है. माता के पाँच मुख पाँच प्राण और पाँच तत्वों का प्रतीक माने जाते हैं. उनका संबंध विशेष रूप से ऋग्वेद से बताया जाता है, जहाँ गायत्री छंद में अनेक ऋचाएँ रची गई हैं. 

गायत्री मंत्र
गायत्री मंत्र को वेदों का सार कहा गया है। यह मंत्र ऋग्वेद  के मंडल 3, सूक्त 62, मंत्र 10 से प्राप्त हुआ है.

ॐ भूर्भुवः स्वः
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्.........
अर्थात 
ॐ – परम ब्रह्म का प्रतीक
भूः, भुवः, स्वः – तीन लोक (पृथ्वी, अंतरिक्ष, स्वर्ग)
तत् सवितुः – उस परम दिव्य प्रकाश (सूर्य स्वरूप) का
वरेण्यं – जो वरण करने योग्य है
भर्गः – पाप और अज्ञान का नाश करने वाला तेज
धीमहि – हम ध्यान करते हैं
धियो यो नः प्रचोदयात् – वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे.

विभिन्न दृष्टिकोण
गायत्री मंत्र में “सविता” शब्द सूर्य देव के लिए प्रयुक्त हुआ है.सूर्य यहाँ  प्रकाश का प्रतीक है. आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार, नियमित मंत्र-जप से:
     1. मन की एकाग्रता बढ़ती है
     2. तनाव कम होता है
     3. सकारात्मक विचारों का विकास होता है
     4. न्यूरोलॉजिकल स्थिरता में सुधार देखा गया है
         यह प्रभाव ध्वनि-तरंगों, लयबद्ध श्वसन और             ध्यान की अवस्था के कारण होता है.

आध्यात्मिक महत्व
गायत्री मंत्र को “वेदमाता” कहा जाता है क्योंकि यह आत्म-शुद्धि और चेतना-विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। अनेक संतों और विचारकों ने इसे सार्वभौमिक प्रार्थना बताया है. पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने गायत्री साधना को युग-परिवर्तन की आधारशिला माना है.

हम कह सकते हैं  कि गायत्री मंत्र वस्तुतः बुद्धि-प्रकाश और विवेक-जागरण की एक प्रार्थना है. यह मंत्र एक सार्वभौमिक प्रार्थना है , न किसी जाति की, न किसी पंथ की... यह मनुष्य की बुद्धि को प्रकाशमान करने की साधना है. क्योंकि “जब भीतर प्रकाश जलता है, तभी बाहर का अंधकार मिटता है।”


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