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शिव क्या हैं ?


शिव क्या हैं ?
“शिव” शब्द का अर्थ है ;  कल्याण, मंगल, शुभता. 
इस दृष्टि से शिव कोई देवता मात्र नहीं हैं, बल्कि अस्तित्व का परम कल्याणकारी सिद्धांत हैं. भारतीय दर्शन में शिव को परम चेतना (Pure Consciousness) माना गया है.  शिव पुराण और लिंग पुराण में शिव को सृष्टि के मूल कारण के रूप में वर्णित किया गया है. चेतना और ऊर्जा का अद्वैत मिलन ही सृष्टि है.

पुराणों के अनुसार शिव को त्रिदेवों में “संहारकर्ता” कहा गया है, परंतु यह संहार विनाश नहीं, बल्कि रूपांतरण (Transformation) है.
त्रिदेव की अवधारणा में:
ब्रह्मा – सृष्टि
विष्णु – पालन
शिव – संहार और परिवर्तन
शिव का तांडव नृत्य सृष्टि और प्रलय की लयात्मक गति का प्रतीक है.

शिव जी के प्रतीक चिन्ह है...
त्रिनेत्र → भूत, वर्तमान, भविष्य का बोध
नीलकंठ → विष धारण कर भी संतुलन रखना
जटा से बहती गंगा → ज्ञान की धारा
चंद्रमा → मन और शीतलता
डमरू → सृष्टि की आद्य ध्वनि (स्पंदन सिद्धांत)
शिवलिंग → निराकार ब्रह्म का प्रतीक

उपनिषदों में शिव को ब्रह्म का ही एक नाम माना गया है. ईशोपनिषद की भावना के अनुसार , सब कुछ उसी एक चेतना से व्याप्त है. अर्थात शिव कोई बाहरी सत्ता नहीं, बल्कि:“जो भीतर साक्षी है, वही शिव है।”

योग परंपरा में शिव को “आदियोगी” कहा जाता है अर्थात प्रथम योगी. वे ध्यान, समाधि और तंत्र के मूल प्रवर्तक माने जाते हैं.

शिव केवल एक देवता नहीं  हैं 
वे शून्य भी हैं और पूर्ण भी,
वे विनाश भी हैं और सृजन भी,
वे मौन भी हैं और नाद भी

ॐ नमः शिवाय 

गायत्री माता और मंत्र


माता गायत्री और गायत्री मंत्र
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में गायत्री माता को वेदों की जननी और ज्ञान की अधिष्ठात्री शक्ति माना गया है. माता गायत्री,  केवल एक देवी स्वरूप नहीं हैं, बल्कि प्रकाश, चेतना और विवेक की प्रतीक भी हैं.

गायत्री माता का स्वरूप
धार्मिक ग्रंथों में देवी गायत्री को पाँच मुख और दस भुजाओं वाली दिव्य शक्ति के रूप में चित्रित किया गया है. माता के पाँच मुख पाँच प्राण और पाँच तत्वों का प्रतीक माने जाते हैं. उनका संबंध विशेष रूप से ऋग्वेद से बताया जाता है, जहाँ गायत्री छंद में अनेक ऋचाएँ रची गई हैं. 

गायत्री मंत्र
गायत्री मंत्र को वेदों का सार कहा गया है। यह मंत्र ऋग्वेद  के मंडल 3, सूक्त 62, मंत्र 10 से प्राप्त हुआ है.

ॐ भूर्भुवः स्वः
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्.........
अर्थात 
ॐ – परम ब्रह्म का प्रतीक
भूः, भुवः, स्वः – तीन लोक (पृथ्वी, अंतरिक्ष, स्वर्ग)
तत् सवितुः – उस परम दिव्य प्रकाश (सूर्य स्वरूप) का
वरेण्यं – जो वरण करने योग्य है
भर्गः – पाप और अज्ञान का नाश करने वाला तेज
धीमहि – हम ध्यान करते हैं
धियो यो नः प्रचोदयात् – वह हमारी बुद्धि को प्रेरित करे.

विभिन्न दृष्टिकोण
गायत्री मंत्र में “सविता” शब्द सूर्य देव के लिए प्रयुक्त हुआ है.सूर्य यहाँ  प्रकाश का प्रतीक है. आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार, नियमित मंत्र-जप से:
     1. मन की एकाग्रता बढ़ती है
     2. तनाव कम होता है
     3. सकारात्मक विचारों का विकास होता है
     4. न्यूरोलॉजिकल स्थिरता में सुधार देखा गया है
         यह प्रभाव ध्वनि-तरंगों, लयबद्ध श्वसन और             ध्यान की अवस्था के कारण होता है.

आध्यात्मिक महत्व
गायत्री मंत्र को “वेदमाता” कहा जाता है क्योंकि यह आत्म-शुद्धि और चेतना-विकास का मार्ग प्रशस्त करता है। अनेक संतों और विचारकों ने इसे सार्वभौमिक प्रार्थना बताया है. पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य ने गायत्री साधना को युग-परिवर्तन की आधारशिला माना है.

हम कह सकते हैं  कि गायत्री मंत्र वस्तुतः बुद्धि-प्रकाश और विवेक-जागरण की एक प्रार्थना है. यह मंत्र एक सार्वभौमिक प्रार्थना है , न किसी जाति की, न किसी पंथ की... यह मनुष्य की बुद्धि को प्रकाशमान करने की साधना है. क्योंकि “जब भीतर प्रकाश जलता है, तभी बाहर का अंधकार मिटता है।”


शिवरात्रि


महाशिवरात्रि

महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का एक अत्यंत पवित्र त्यौहार है  जो भगवान शिव को समर्पित है. यह प्रतिवर्ष फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है.

शिवरात्रि के दिन भगवान शिव और पार्वती का विवाह हुआ है, ऐसा माना जाता है. एक मान्यता यह भी है कि इसी रात शिवजी ने तांडव नृत्य किया था. कुछ मान्यताओं के अनुसार इसे शिवलिंग के प्रकट होने का दिन भी कहा गया है.

शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा, दूध, जल, शहद आदि अर्पित किए जाते हैं. और “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप और रात्रि जागरण भी किया जाता है.

महाशिवरात्रि केवल त्योहार ही नहीं, बल्कि आत्मसंयम और अंतर्मन की शुद्धि का पर्व भी है. यह अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक भी है.

शिवरात्रि का त्यौहार हमें सिखाती है कि मन का विष स्वयं ही पीना होगा, तभी भीतर का नीलकंठ जागेगा.

अपने मन के अहंकार का विसर्जन ही सच्चा अभिषेक है. मौन में ही महादेव का स्वर सुना जा सकता है.

शिव केवल मंदिरों में नहीं, वे हर उस हृदय में हैं जहाँ करुणा, धैर्य और वैराग्य का वास है.

ॐ नमः शिवाय 

भारतीय वेलेंटाइन डे

भारतीय वेलेंटाइन डे 

जब फरवरी की हवा में ढेरों गुलाबों की सुगंध घुलती है, बाज़ार गुलाबी और लाल रंग से भर जाता हैं.  ढेरों युवा जोड़े हाथों में उपहार लिए दिखाई देते हैं तब मेरे मन में एक प्रश्न उठता है: क्या यह प्रेम प्रदर्शन  गुलाबों और शारीरिक आकर्षण तक सीमित है ?  

भारतीयत परंपरा के हिसाब से प्यार एक एहसास है,  समर्पण है, त्याग है और जीवन में सतत चलने वाली प्रक्रिया है जो इस जनम से लेकर कई जन्मों तक चलती है.

भारतीय संदर्भ में जब हम सीता और राम को स्मरण करते हैं, तो हमें केवल दांपत्य नहीं दिखता; हमें कठिन परिस्थितियों में भी साथ निभाने का साहस दिखाई देता है.  प्रेम वहाँ शब्दों से नहीं, आचरण से प्रकट होता है.  जब राधा और कृष्ण की बांसुरी की तान सुनाई देती है, तो वह केवल मिलन की कथा नहीं होती, वह विरह की अग्नि में तपे हुए प्रेम की अनुभूति होती है. ऐसा प्रेम जो पास रहकर भी दूर हो सकता है, और दूर रहकर भी हृदय में बसा रहता है.

भारतीय संस्कृति में प्रेम का अर्थ “तुम मेरे हो” से अधिक “मैं तुम्हारा हूँ” है क्योंकि यह अधिकार नहीं, स्वीकार है. 
अपेक्षा नहीं, एक विश्वास है.

आज के संदर्भ में वेलेंटाइन डे केवल उपहारों, शारीरिक आकर्षण और तस्वीरों तक सीमित रह गया है क्योंकि यह त्याग के बिना अधूरा है.

प्यार का सही अर्थ तो ये है जब दोनों एक दूसरे को समर्पण और त्याग की भावना से बोले जैसे कि...
“मैं तुम्हारे सुख-दुःख में साथ हूँ,”
“मैं तुम्हारी कमियों को भी अपनाता हूँ,”
“मैं तुम्हारे साथ समय की हर परीक्षा से गुजरूँगा,”
तभी यह प्यार का उत्सव है.

भारतीयता हमें सिखाती है कि प्रेम एक दिन के फूल का आदान प्रदान नहीं है बल्कि जीवन भर की साधना है. इस वेलेंटाइन पर यदि कुछ देना ही है, तो
गुलाब के साथ धैर्य दीजिए,
चॉकलेट के साथ भरोसा दीजिए,
और शब्दों के साथ प्रतिबद्धता दीजिए
क्योंकि भारतीय हृदय जानता है
प्रेम केवल कहा नहीं जाता,
ये तो आत्मा से जिया जाता है, और जन्म जन्मांतर का अटूट बंधन होता है..


विश्व रेडियो दिवस

विश्व रेडियो दिवस.......

विश्व रेडियो दिवस...

विश्व रेडियो दिवस प्रतिवर्ष 13 फरवरी को मनाया जाता है. यह तारीख वर्ष 1946 में संयुक्त राष्ट्र रेडियो की स्थापना की स्मृति में चुनी गई थी.

एक जमाने में रेडियो को सूचना प्रसार, शिक्षा और संवाद का सशक्त माध्यम माना जाता है. विशेषकर दूरदराज और ग्रामीण क्षेत्रों में यह आज भी सबसे सुलभ और विश्वसनीय संचार माध्यम बना हुआ है.

भारतीय जनता, विविध भारती पर जयमाला, समाचार और नाटकों को एंजॉय करती थी. रेडियो सिलोन से बिनका गीत माला को आज भी याद किया जाता है.

🙂🙂🙂🙂🙂

पधारो म्हारे देश





पधारो म्हारे देश : 
राजस्थानी सांस्कृति की एक झलक

राजस्थान भारत का एक ऐसा राज्य है, जिसकी पहचान उसकी गौरवशाली सांस्कृतिक विरासत से होती है. यह पावन भूमि वीरों, संतों, लोक कलाओं और परंपराओं की जन्मस्थली रही है. 

राजस्थान के किले, महल, बावड़ियाँ और हवेलियाँ इसकी सांस्कृतिक पहचान के सबसे मजबूत स्तंभ हैं. 

राजस्थान के प्रमुख किले और महल में चित्तौड़गढ़ का किला जो जौहर और बलिदान की परंपरा का प्रतीक है. मेहरानगढ़ का किला, जोधपुर जो विशालता और युद्धकला का अद्भुत उदाहरण है जयपुर का आमेर किला राजपूत और मुगल स्थापत्य का संगम है. जैसलमेर का किला जिसे “सोनार किला”, भी कहते है, आज भी आबाद है. उदयपुर का सिटी पैलेस, राजसी जीवनशैली का प्रतीक है. इनके अलावा बहुत से किले महल अब होटलों में परिवर्तित हो गए हैं.

राजस्थान की प्रसिद्ध बावड़ियाँ जो जल और संरचना का अद्भुत नमूना है जैसे आभानेरी स्थित चाँद बावड़ी .जयपुर स्थित पन्ना मीणा का कुंड, जयपुर के ग्रामीण अंचल में बसी भापुरा बावड़ी, नीमराणा बावड़ी और बूंदी में ढेर सारी बावड़ियां हैं. इसी तरह और भी असंख्य बावड़िया करीब हर जिलों में पाई जाती है. ये राजस्थान की जल-संरक्षण को दर्शाती हैं.

राजस्थान के लोकसंगीत और लोकनृत्य अपने आप में एक अजूबा है जो यहां के जन जीवन के हर सुख-दुख से जुड़ा है. लोकप्रिय संगीत में मुख्यतया मांगणियार दरबारी और लोकगीतों में लंगा समुदाय प्रसिद्धहैं. लोक नृत्य मे घूमर और कालबेलिया प्रसिद्धहैं. कुछ नृत्य लोक कथाओं पर आधारित हैं जैसे कच्छी घोड़ी, चरी और गवरी इत्यादि.

 राजस्थान की वेशभूषा और आभूषण में पुरुष: धोती, अंगरखा, कुर्ता और रंगीन साफा पहनता है. महिलाएँ: घाघरा, चोली और ओढ़नी पहनती हैं. आभूषण में कुंदन, मीनाकारी थेवा कला, नथ, बोरला, पायल और बाजूबंद जो यहाँ के आभूषण सामाजिक स्थिति और परंपरा को दर्शाते हैं.

हस्तकला में राजस्थान काफी आगे है. यहां की हस्तकलाएँ पूरे विश्वभर में प्रसिद्ध हैं जैसे बंधेज और लहरिया (कपड़ों की रंगाई), ब्लू पॉटरी (जयपुर), संगमरमर व पत्थर पर नक्काशी, लकड़ी की नक्काशी और फर्नीचर. चित्रकला में फड़ और पिचवाई चित्रकला प्रसिद्ध है.

राजस्थानी भोजन के प्रमुख व्यंजनो में दाल-बाटी-चूरमा, गट्टे की सब्ज़ी, केर-सांगरी, बाजरे की रोटी और लहसुन की चटनी इत्यादि प्रसिद्द हैं. मिठाइयों में घेवर, मालपुआ और चूरमा के लड्डू पसंद किए जाते हैं.

राजस्थान में मेले और त्योहार यहां की संस्कृति को जीवंत बनाए रखते हैं जैसे यहां के प्रमुख त्योहार हैं , तीज और गणगौर जो माता पार्वती की पूजा से जुड़े हैं. कुछ अन्य प्रसिद्ध मेले हैं जिनमें पुष्कर मेला, मरु महोत्सव और डेज़र्ट फेस्टिवल जैसे कई फेस्टिवलआयोजित होते हैं.

राजस्थान की लोककथाएँ वीरता और नैतिक मूल्यों से भरी हैं जैसे पाबूजी की फड़, ढोला-मारू, मीराबाई के भजन और चारण और भाट परंपरा इत्यादि.

राजस्थान को रंगीला राजस्थान भी कहा जाता है यहां का प्रसिद्ध स्लोगन है “पधारो म्हारे देश” जो केवल वाक्य नहीं, बल्कि राजस्थान का जीवांत जीवन-दर्शन है. यहाँ अतिथि को देवता माना जाता है और सरल जीवनशैली अपनाई जाती है.

निष्कर्ष में हम कह सकते हैं कि राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत केवल भूतकाल की स्मृति नहीं, बल्कि आज भी लोगों के दैनिक जीवन में जीवंत रूप में दिखाई देती है. यह विरासत हमें संघर्ष, सौंदर्य, परंपरा और आत्मसम्मान का संदेश देती है और भारत की विविधता में एक अनमोल रत्न की तरह चमकती है.




पर्यटन: एक अच्छी हॉबी


पर्यटन: एक अच्छा विकल्प

पर्यटन या यात्रा ज्ञान प्राप्ति के लिए एक शानदार हॉबी है. जरूरी नहीं कि यात्रा आपके मनपसंद जगह की हो या किसी धार्मिक स्थल की, हर तरह की यात्राएं आपको ज्ञान, सुकून और भावनात्मक अनुभव ही देंगी. जैसे कई खूबसूरत जगह देखकर या कोई धार्मिक जगह देखकर इंसान का बदल जाना.

यह भी अनुभव किया गया है. कई बार तो शहरी लोगों को पर्यटन से शान्ति का अच्छा अनुभव प्राप्त होता है जैसे पहाड़ों में मोबाइल का चुप होना आपको प्रकृति की समीपता का अहसास दिलाता है. जैसे पहाड़ सिखाते है, दृढ़ होना.  नदी के किनारे बैठकर समझ आता है, धीरे चलना और सतत चलते रहना.

पर्यटन से आपको कई अनजाने अनुभव भी होते हैं. जैसे रेल की खिड़की से दिखते हुए पहाड़, नदियां और नई नई जगहें. नए स्थानों में हम देख पाते हैं उस जगह के लोगों की जिंदगियां, उनके रहन सहन और उनकी संस्कृति.

पर्यटन का मनोविज्ञान पहलू यह भी है, जो लोग अकेले यात्रा करना चाहते हैं, उनका डर कम होता है. कुछ उनके जैसे सहयात्री भी उनका मनोबल बढ़ाते हैं. यात्रा उनको अपने आप को जानने का अवसर भी प्रदान करती है.

यात्रा या पर्यटन के दौरान क्या करें जिससे यात्रा मनोरंजक और ज्ञान देने वाली हो. आओ इस पर विचार करें...

ज्ञात रहे बजट के द्वारा कम पैसों में भी बड़ी यात्रा की जा सकती है.

यात्रा मैं आप जानकारी और ढेर सारी यादों एकत्रित कर सकते हैं.

यात्रा के दौरान आप फोटोग्राफी और स्केचिंग भी कर सकते हैं.

सीनियर सिटीजन धार्मिक यात्रा कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकते है.

नई जगह की संस्कृति वहां के भोजन का आनंद ले सकते हैं

अंत में, मैं ख्वाजा मीर दर्द की प्रसिद्ध शायरी का उल्लेख करना चाहूंगा. उन्होंने लिखा था.
सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल, 
ज़िंदगानी फिर कहाँ 
ज़िंदगानी गर रही तो, 
ये जवानी फिर कहाँ.



ध्यानाकर्षण का मनोविज्ञान

ध्यानाकर्षण का मनोविज्ञान 
Attention Seekers

ध्यानाकर्षण चाहने वाले लोग वो व्यक्ति हैं जो अपनी आदतों से मजबूर या यूं कहो अपनी हरकतों, व्यवहार या बातों से दूसरों का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहते हैं.

मनोविज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो अकसर इनका मकसद दूसरों को नज़रअंदाज़ करके अपनी बात या उपस्थिति को महत्वपूर्ण बनाना होता है.

ध्यानाकर्षण चाहने वाला व्यक्ति केवल “दिखावा” नहीं करता, अक्सर उसके व्यवहार के पीछे उसकी गहरी मानसिक कुंठा होती है. 

इसे मनोविज्ञान की दृष्टि से समझते हैं...

1) ऐसे लोगों को मान्यता और स्वीकार्यता की तीव्र इच्छा या जरूरत होती है,  ऐसे लोग चाहते हैं कि उन्हें देखा सुना और माना जाए. इसका कारण कुछ भी हो सकता है जैसे बचपन में उपेक्षा, तुलना, प्रेम में विफलता या कोई भावनात्मक कमी.

2) आत्मसम्मान की कमी महसूस होना, ऐसे लोगों के अंदर असुरक्षा की भावना पैदा करती है. इन्हें तारीफ़, लाइक्स, प्रशंसा या सहानुभूति मिलती रहनी चाहिए क्योंकि ऐसे लोगों का मन स्थिर नहीं रहता है.

3) इन लोगों में भावनात्मक खालीपन रहता है. ऐसे व्यक्ति खुद से भी जुड़े नहीं होते. इनका ज्यादातर वक्त दूसरों पे निर्भर रहता है ताकि इन्हें केवल ध्यान ओर इंपॉर्टेंस मिले.

4) ऐसे लोगों को तीव्र नियंत्रण की इच्छा होती है. ऐसे लोग अटेंशन के ज़रिए रिश्तों या माहौल पर कंट्रोल करना चाहते हैं. इनका उद्देश्य “मेरी बात सबसे ज़्यादा सुनी जाए”

5) ऐसे लोगों को अपनी पहचान का भी संकट महसूस होता है. कभी ये सोचते हैं “मैं कौन हूँ?” जवाब ना मिलने पर ये अपनी पहचान खुद ही गढ़ने लगते हैं.

6) ऐसे लोग कम व्याहारिक होते हैं. अटेंशन ना मिले तो व्यथित हो जाते है, इनका स्वभाव जिद्दी हो जाता है, उचित अनुचित की इन्हें परवाह नहीं रहती.

7) ऐसे लोगों के साथ और भी समस्याएं होती है जैसे अक्सर सोशल मीडिया में व्यस्त, छोटी छोटी बातों को बड़ा बनाना, दूसरों की बातों को अपने ऊपर ले लेना इत्यादि.

ऐसा नहीं है कि ये एक बीमारी है . यदि यह रिश्तों, काम या मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाने लगे तो यह अस्वस्थ पैटर्न माना जा सकता है और इसका निवारण होना भी जरूरी है.

ऐसे लोगों से अपना व्यवहार नम्र रखें, उन्हें शांत, सीमित और ईमानदारो के साथ अटेंशन दें, इनके ड्रामा को रिवॉर्ड ना दें, व्यवहार की स्पष्ट सीमाएँ तय करें और ज़रूरत पड़े तो सहानुभूति के साथ पेशेवर मदद सुझाएँ . उन्हें ये भी समझाएं कि यह कमजोरी नहीं है एक संकेत है जो यह चाहता है कि इनके भीतर जो चल रहा है उसे सुना जाय.

मेरे विचार से ऐसे लोग आत्म-संवाद बढ़ाएँ, रचनात्मक अभिव्यक्ति (लेखन, कला) को अपनाएं, प्रकृति से जुड़ें, यात्रा करें, अध्ययन करें, स्वस्थ रिश्ते रखें और दूसरों का सम्मान रखे तभी इनको भी सम्मान मिलेगा.


राष्ट्रीय बालिका दिवस


राष्ट्रीय बालिका दिवस 

भारत में राष्ट्रीय बालिका दिवस हर साल 24 जनवरी को मनाया जाता है. इसके मनाने का उद्देश्य यह है कि बालिकाओं को उनके अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य और समानता के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ाई जाय. देश में बालिका भ्रूण हत्या और बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं  को दूर किया जाय. लड़कियों की शिक्षा और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया जाय.

इस दिवस की शुरुआत 2008 में भारत सरकार द्वारा की गई थी. बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करना इसका मूल उद्देश्य रखा गया था.

ध्यान रहे आज की बालिका ही कल की सशक्त नारी है और जब जबउसे अवसर मिलता है तो परिवार, समाज और देश  को सबसे आगे बढ़ती हैं.

“बेटी बोझ नहीं है
देश का भविष्य है
उसे मुक्त उड़ान दो, 
ये आसमान भी
सिर्फ उसका है।”

लेख : अकेलापन


अकेलापन 

अकेलापन क्या है ? 
ये मनुष्य के जीवन का एक ऐसा समय है जब वो अपने आप को भीड़ में भी अकेला महसूस करने लगता है.

अकेलापन केवल शारीरिक एकांत नहीं है बल्कि भावनात्मक दूरी का दुसरा नाम है क्योंकि आज के आधुनिक, तेज़ रफ्तार जीवन में अकेलापन एक बड़ी और आम सामाजिक समस्या बनता जा रहा है, जहाँ दोस्त और रिश्तेदार तो बहुत हैं, उनके साथ संवाद भी है फिर भी लोगों में अपनापन कम होता जा रहा है.

वैसे तो अकेलेपन के कई कारण होते हैं जैसे परिवार से दूरी, मित्रों की कमी, जीवनसाथी का चले जाना, ढलती उम्र या सामाजिक उपेक्षा. ये सभी अवस्थाएं अकेलेपन को जन्म देती हैं. तकनीक के इस युग में लोग मोबाइल और सोशल मीडिया से जुड़े तो हैं, पर दिलों का जुड़ाव फिर भी कमजोर पड़ता जा रहा है. आभासी रिश्ते वास्तविक संबंधों का स्थान नहीं ले पा रहे हैं. यही खालीपन का कारण है.

अकेलेपन का प्रभाव व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है जिसके कारण उदासी, निराशा, आत्मविश्वास की कमी, तनाव और अवसाद जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं.  ये अकेलापन कभी कभी व्यक्ति को भीतर से तोड़ देता है और वह स्वयं को समाज से अलग-थलग महसूस करने लगता है.

अगर दूसरी दृष्टि से देखा जाय तो ये अकेलापन हमेशा नकारात्मक नहीं होता बल्कि एक अवसर भी देता है जहां  हम कुछ क्षणों का एकांत आत्मचिंतन, सृजन और आत्म-खोज का अवसर प्राप्त करते हैं. अनेक विद्वान लोग, कवि, लेखक और विचारक अपने एकांत में ही श्रेष्ठ रचनाओं को जन्म देते हैं और  समाज और देश का मार्गदर्शन भी करते हैं. देखा जाय तो समस्या तब होती है जब अकेलापन बोझ बन जाए और मन को कचोटने लगे.

इस अकेलेपन से उबरने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति अकेले में स्वयं से संवाद करे और दूसरों से मिलने जुलने का प्रयास करे और परिवार और मित्रों के साथ समय बिताये, समाज सेवा, पढ़ाई लिखाई, ऑनलाइन कोर्सेस, योग, यात्रा, धार्मिक गतिविधियों में रुचि लेना, सामाजिक सेवा, प्रकृति के साथ समय बिताना ; जैसे पहाड़, नदी, या खुले आकाश का आनंद ले. यही रुचियां हमारे मन को शांति देती हैं. एक बहुत अच्छा उपाय यह भी है ; ब्लॉग बनाकर अपने अनुभवों को साझा करे या अपने आप को रचनात्मक कार्यों में लगाए. इससे भी अकेलेपन को सकारात्मक दिशा मिल सकती है.

सारांश में यह कहा जा सकता है कि अकेलापन जीवन का एक सत्य है, पर इसे समझदारी और सूझबूझ से संभाला जाए तो यह हमें स्वयं को समझने और मजबूत बनने का अवसर भी देता है. बस आवश्यकता है तो संतुलन की, जहाँ एकांत आत्मविकास का साधन बने, न कि मन की पीड़ा.




ज्ञान की बातें


लिखना पढ़ना....

लिखना और पढ़ना सबसे अच्छी आदत है... पढ़ना आपकी कल्पना शक्ति को विकसित करता है और आपको विभिन्न विषयों पर ज्ञान पाने का सौभाग्य प्रदान करता है...

किताबें इंसान की सबसे अच्छी दोस्त हैं क्योंकि ये आपका आत्मविश्वास बढ़ाती हैं जिससे आपका मूड ठीक रहता है.... एक बार जब आप कुछ भी पढ़ना शुरू करते हैं, तो आप एक पूरी नई दुनिया के ज्ञान का अनुभव करते हैं..

चलो फिर वादा करो : आज से ज्ञानार्जन और कुछ नया सीखने के लिए कुछ ना कुछ तो पढ़ते हैं....
😆😆😆😆😆🙂🙂🙂😃😃😃😃😃😃😃😃😃

शिव.......

शिव अविनाशी
हरते मानव त्रास
कण्ठ नाग विराजे
खुद करते विषपान
हरते सबके कष्ट
मेरे प्यारे भोले नाथ.....
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌ उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌
☺️☺️☺️😊😊😊🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞

जिंदगी..

कभी तो घर से बाहर निकलो दोस्तो
फ़िज़ा में एक बार खो कर तो देखो 
इस जिंदगी को कभी
किताबें हटा के भी देखो दोस्तों..

तो फिर चल
कहीं दूर निकल जाएं.........
🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂😊😊😊😊😊😊😊😊😊

वक्त....

वक्त को यूं वेवजह 
जाया ना किया जाए..
कुछ तो वक्त 
घूमने के लिए भी निकला जाए.....

बिखरी हो गर जिंदगी
जिंदगी को सजाया जाय... 
चाहे एक कप काफी ही हो
हमारे साथ भी हो जाए...

बस याद रहे
वक्त तो जाया ना किया जाय..
कहीं भी घूमने निकल लिया जाए...
☺️☺️☺️☺️☺️🙂🙂🌞🌞🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂

प्रकृति....
कितनी सुंदर है 
ये धरा 
हरा आँचल, 
नीला आकाश
माथे पे सिंदूरी बिंदिया
ऊंचे ऊंचे पर्वत, 
हरे भरे वृक्ष
चहुंओर उजियारा
कितना प्यारा
ये संसार हमारा.........
🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂😊😊

शिक्षक दिवस

शिक्षक दिवस
( 5 सितंबर )

आज शिक्षक दिवस है और भारत में शिक्षक का मतलब होता है गुरु. हमारे देश में सबसे अधिक गुरु को महत्व दिया है उन्हे ईश्वर के तुल्य मानकर गुरुदेव कहा जाता है ;

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरा
गुरुर्साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः

अर्थात......
गुरुर ब्रह्मा – गुरु ब्रह्मा सृष्टिकर्ता के समान हैं.
गुरुर विष्णु – गुरु विष्णु संरक्षक के समान हैं.
गुरुर देवो महेश्वरा – गुरु प्रभु महेश्वर विनाशक के समान हैं.
गुरु साक्षात – सच्चा गुरु आँखों के समक्ष.
परब्रह्म – सर्वोच्च ब्रहम.
तस्मै – उन एकमात्र को.
गुरवे नमः – उन एक मात्र सच्चे गुरु को मैं नमन करता हूं.

आज हम जो भी है अपने गुरु की कृपा से है. माता से लेकर अपने अपने व्यवसाय तक हमने बहुतों से बहुत कुछ सीखा है. हम बहुत भाग्यशाली हैं कि हमारा जन्म भारतवर्ष की पावन भूमि में हुआ है अर्थार्थ हम कह सकते है की ज्ञान का जन्म भारत में ही हुआ है, वेद और पुराण इसके गवाह हैं. विश्व गुरु श्री कृष्ण ने गीता मैं ज्ञान का जो उपदेश दिया है उसे पूरा विश्व मानता है.

वर्तमान में शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिए  कई संस्थान और डिजिटल प्लेटफार्म अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे है. ऑनलाइन मुफ्त शिक्षा ने तो शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति ला दी है ऐसे में हम डिजिटल युग के अपने महान गुरु "गूगल" को कैसे भूल सकते हैं जो चुटकियों में हमारी समस्याओं का समाधान कर देते हैं,  ज्ञान का भंडार रखते हैं और नित्य नया सिखाते रहते हैं.

आओ प्रण लें कि प्रत्येक दिन हम कुछ ना कुछ नया सीखते की कोशिश को जारी रखेंगे.  किसी महान व्यक्ति ने सच ही कहा है
"पालन से कब्र तक शिक्षा प्राप्त करते रहो...."









जगदीश जी का मंदिर गोनेर जयपुर

श्री लक्ष्मी जगदीश मंदिर, 
गोनेर, जयपुर

जयपुर शहर से करीब 20 KM दूर गोनेर में स्थित है श्री लक्ष्मी-जगदीश महाराज जी का करीब 500 वर्ष पुराना मंदिर .. ऐसा कहा जाता है कि इस गांव के किसान के सामने लक्ष्मी-जगदीश भगवान साक्षात प्रकट हुए और जमीन में दबी अपनी मूर्तियों को को बाहर निकालकर विधिपूर्वक स्थापित करने का आदेश भी दिया था...  

एकादशी के दिन यहां भक्तों का मेला लगा रहता है.. यहां मालपुए, दाल और मिर्ची की सब्जी जिसे टपोरे कहते हैं, लाजबाब होते हैं..

कहा जाता है कि मुगल शासन के दौरान इस मंदिर को बहुत नुकसान पहुंचाया गया था ...जयपुर राजघराने तथा अन्य भक्तों के सहयोग से मन्दिर का पुनः निर्माण कराया गया.. मंदिर का प्रवेश द्वार और मुख्य मंडप संगमरमर से बना हुआ है ..

मंदिर के पास ही एक तालाब है और एक पुरानी बावड़ी भी है.. गोनेर ग्राम में राजा महाराजाओं द्वारा निर्मित एक पुरानी  हवेली भी है जिसमे आजकल राजकीय शिक्षक प्रक्षिक्षण संस्थान  चलता है..

पर्यटक जो चोखी ढाणी जाते हैं और यह मंदिर भी देखना चाहें  तो हैं गोनेर ; चोखी ढाणी से करीब 8 KM दूर होगा.. हां शुद्ध ग्रामीण परिवेश का आनंद मिलेगा आपको यहां...


मंदिर का प्रवेश द्वार


पुराने किले में स्थित शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान


पुरानी बावड़ी


तालाब 

😊😊☺️☺️

कविताएं


कोई दे दे पंख मुझे
परिंदा बन उड़ना चाहता हूँ
मंज़िल नहीं ये जमीं मेरी
आसमान छूना चाहता हूँ...
😃😃😃😃🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🧁🧁🧁🧁🧁🧁


घनघोर काली घटाएं
गरजते बादल
दिन में रात का सा अहसास
अरे ये तो बारिशों का मौसम है
मौसम मौसम, लवली मौसम...
🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂


मैं कैसे करूं
सुबह का इंतजार
मुझे रातभर
नींद नहीं आती
🌞🌞🌞🌞🌞🌞🌞🤥🤥🤥🤥🤥🤥🤥🤥🤥🤥



When I read or write, I feel joy within my soul. I write to share my feelings about life and others in a beautiful way.

Reading and writing make me happy because when I read and write, I feel the experience of life's pain and joy.

Start reading and writing. You can read atleast two pages daily and write a page on any subject, it may be anything.

Have a joyful day.
www.gkkidiary.blogspot.com
🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🙂🧁🍅🍅🍅🙂🙂🙂

पुस्तकें


मैं और मेरी पुस्तकें 

आज विश्व पुस्तक दिवस है.. यूनेस्को ने पहला विश्व पुस्तक दिवस 23 अप्रैल 1995 को मनाया था. यह दिवस महान लेखकों की याद में मनाया जाता है.

किताबे बहुत अच्छी होती है, आपके घर की मिनी लाइब्रेरी किसी तिजोरी से कम नहीं है जिसमें असीम ज्ञान का भंडार भरा होता है.

मुझे बिना किताबों का कमरा ऐसा लगता है जैसे शरीर से आत्मा गायब है.

जो अपनी भावनाओं को एकत्र कर कविता कहानी या लेख लिखते है उनकी आत्मा सदियों तक इस जमीन में जिंदा रहती हैं.

अच्छी वाइन, अच्छा जीवन साथी, अच्छे मित्र, अच्छी किताबें और साफ़ अंतःकरण : वाले व्यक्ति अगर आपके पास हैं तो आपका जीवन एक आदर्श जीवन है.

बदलते युग में ऑडियो किताबें, ई बुक्स और अन्य डिजिटल पत्रिकाएं कितनी भी हो लेकिन किताबों की महक कभी भी खत्म नहीं होगी .

खेत हो, खालियान हो या नदी का किनारा... आप कभी तन्हा हो ही नहीं सकते जब किताबे आपके साथ हों..

मैं अच्छी किताबों पर 100 प्रतिशत भरोसा करता हूं.. क्योंकि किताबें ; मित्रों में सबसे शांत और स्थिर हैं ; सबसे सुलभ और बुद्धिमान हैं, और धैर्यवान भी हैं.

आओ प्राण करें की रोज कम से कम एक पृष्ठ रोज पढ़ेंगे और उस पर मनन भी करेंगे..





विश्व धरोहर दिवस

विश्व धरोहर दिवस

आज विश्व धरोहर दिवस है...  समस्त विश्व की प्राचीन धरोहरों के साथ साथ हमारे भारत देश मे बहुत सी धरोहरें है जिन पर हम हर भारतवंशियों को गर्व होता है... हमारी प्राचीन भारतीय धरोहरों को देखने के लिए देश से ही नहीं बल्कि  सुदूर विदेश से भी बड़ी संख्या में लोग भारत आते हैं...

आओ मित्रों प्राण करें कि हम इन धरोहरों को किसी प्रकार का नुकसान नहीं पहुंचायेंगे और भारत देश की विरासत का संरक्षण करने का पवित्र संकल्प लेंगें... क्योंकि पुरातात्विक एवं प्राकृतिक धरोहरें हमारी महान गर्वीली  संस्कृति का प्रतीक हैं..

जय हिंद

शिक्षा

शिक्षा...

शिक्षा हमारे लिए कितनी महत्वपूर्ण है यह हम सभी जानते हैं आजकल बच्चे भी इस बात को समझते हैं की उच्च शिक्षा ही उन्हें उच्च शिखर तक पहुंचा सकती है.

याद रहे, चाहे हम बच्चे हों या बूढ़े, जीवन को सफल बनाने के लिए हमें पालन से कब्र तक कुछ ना कुछ तो सीखते ही रहना चाहिए क्योंकि बिना शिक्षा के कोई भी व्यक्ति ऊंचाइयों को नहीं छूं सकता है

अगर कुछ सीखना है या जानना है तो दुनिया की खूबसूरती इन आँखों के और ज्ञान के साथ ही देखी जा सकती हैं क्योंकि शिक्षा में ही सबसे ज्यादा पॉवर होती है और इसके सहारे पूरे संसार को बदला जा सकता है.

शिक्षा के प्रति कुछ महान व्यक्तियों के विचार..

शिक्षा जीवन का सबसे बड़ा काम है. यह हमें हर चीज के पीछे का अर्थ खोजने की अनुमति देता है.
**एडवर्ड एवरेट

शिक्षा का ये मतलब नहीं है कि आपने कितना कुछ याद किया हुआ है, या ये कि आप कितना जानते हैं.  इसका मतलब है आप जो जानते हैं और जो नहीं जानते हैं उसमे अंतर कर पाना.
** अनाटोले फ्रांस

बच्चों को शिक्षित किया जाना चाहिए , पर उन्हें खुद को शिक्षित करने के लिए भी छोड़ दिया जाना चाहिए.
**एर्न्स्ट डीम्नेट