कहानी: शाम और गिलास


कहानी : शाम और गिलास

सूरज डूबने को था... जाते हुए सूरज की लालिमा मनमोहक लग रही थी... बत्तियां जल उठी थीं... शहर की चमकती और रंगीन लाइटों के बीच एक छोटा-सा रेस्टोरेंट और कैफ़े-बार.... म्यूज़िक बज रहा था, कुछ लोग शराब के प्यालों में जिंदगी ढूंढ रहे थे... कुछ मस्ती में हँस रहे थे और कुछ अपनी माशूकाओं को रिझाने में लगे हुए थे... मेज़ों पर रखे ग्लासों में झिलमिलाती हुई रंगीन शराब जैसे हर किसी को सुकून दे रही हो...

अजय भी वहीं बैठा था... टेबल पर अकेला .. उसकी टेबल पर व्हिस्की का गिलास मुस्कुरा रहा था... मोबाइल के स्टेटस मे लिखा था... 
“Life is chill.” 

"हाय अजय" 
उसके दोस्त निखिल ने उसे चौंका दिया 
“काफी बदल गए हो यार,” 
निखिल मुस्कुराते हुए बोला...

अजय ने ग्लास उठाया और खिसियाते हुए बोला...
“कुछ नहीं यार... बस… जिंदगी का मज़ा ले रहा हूँ”
निखिल चुपचाप इधर उधर देख रहा था... उसने अजय से पूछा 
"अरे यार ये शाम , बार और तुम ... समझ में नहीं आया... घर में कोई नहीं है क्या?"
"है ना मेरी दो साल की प्यारी बेटी.. मायरा"  
अजय ने जेब से बेटी की तस्वीर निकाल कर दिखाई..
"और भाभी" 
निखिल ने पूछा तो अजय गुर्राकर बोला 
"मर गई है वो मेरे लिए... भाग गई अपने आशिक के साथ"

दोनों दोस्तों के बीच चुप्पी सी छा गई थी... थोड़ी देर बाद निखिल ने धीरे से, प्यार से और अपनेपन से पूछा,
“अजय... चलो उसको तो मारो होली लेकिन जब तुम्हारी बेटी ... बड़ी होकर पूछेगी .... पापा, आप शाम को मेरे साथ क्यों नहीं खेलते हो ? तब क्या कहोगे उससे ?”

ग्लास में सफेद बर्फ धीरे धीरे पिघल रही थी... अजय के अंदर भी धीरे धीरे कुछ पिघल रहा था... उसने पहली बार महसूस किया... शराब खराब ही होती होगी क्योंकि वह कड़वी भी तो है.... जो धीरे-धीरे जिंदगी के मीठे मीठे और प्यारे प्यारे रिश्तों को छीन जो लेती है.

अजय ने भरे गिलास को मेज़ पर जोर से पटका और बार की खिड़की के बाहर देखने लगा... .उसने देखा रात तो वही थी… पर उसे आज अलग सी लग रही थी...  

इस शाम, उसे पहली बार अपनी इकलौती बेटी की याद आने लगी थी... उसकी आंखों में आँसू चमकने लगे थे..



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