मैं और मेरी मधुशाला
मेरी मधुशाला
कोई शराबखाना तो नहीं
ना कोई कैद है
मेरे मन का वो कोना है
जहाँ मेरे भावों का
भावनाओं का आईना है.
मैं यहाँ शराब
बोतलों में नहीं भरता,
ये वो यादें हैं, जो जाम बनकर
छलकती रहती है
फिर दिल में उतर जाती हैं...
कभी,
हँसी से छलकते थे
खुशी के जाम, उनको साथ लिए
मधुशाला सी जिंदगी में
कई तैरते हुए
सपनों के जाम पिए हुए..
अब कौनसा जाम उठाऊं
बुझे बुझे से शब्दों का
कविताओ ने पी लिया है
जहर मेरे जज्बात का...
कभी मधुशाला थी जिंदगी
प्रेम था नशा
बिन शराब के
आज विरह ने रंग दिखाया है
उन रंगीन प्यालों का.
जिसे समझा था
अमृत मैं
वही यादों का
नशा बन गया...
यहाँ आँसू भी नशा है
हम फिर भी पिये जाते हैं,
किसी की याद में
जी को जलाते हैं
हम बन गये शराबी
अब तो मधुशाला में ही
दीप जलते हैं...
ना कोई नियम,
ना कोई पहरा,
अब कोई नहीं पूछता
मेरा नाम पता
सबको मालूम है
महखाना ही है
मेरा असली पता..
दिन छोटा सा
ऊंघता रहता है
और ये लंबी रातें
जागती रहती हैं
नशे में करती रहती हैं
इंतजार उनका...
ये मेरी मधुशाला है
यादों वादों की
इसका कोई समय नहीं होता
जब प्यास लगे
जाम छलक ही जाता है
आँखें में या प्यालों में...
यह वो नशा नहीं है दोस्त
जिसको सब को तलब होती है
ये तो किसी की याद का
पैमाना होता है...
एक दिन जिंदगी की
ये बोतल भी टूट जायेगी
देह पहचान सब छूट जाएगा,
मेरी यादों की मधुशाला रहेगी
उसमें एक नाम और जुड़ जाएगा...