कहानी : आखिरी घूंट


कहानी : आख़िरी घूंट

रात का सन्नाटा था .. हल्की सी रोशनी फैली थी.. 
मेज़ पर बीयर की आधी भरी बोतल थी… और सामने बैठा था प्रतीक .

किसी जमाने में प्रतीक एक जिंदादिल इंसान हुआ करता था. हर शाम परिवार की खुशियां की शाम हुआ करती थी. रविवार का तो सबको बेसब्री से इंतजार होता था. रविवार मतलब फुल डे आउटिंग और मौज मस्ती.

वक्त ऐसा बदला कि प्रतीक की शराब की लत ने सब बदल दिया.... जहां रौनक हुआ करती थी वहां सन्नाटा रहने लगा था. 

रविवार की शाम थी. प्रतीक ने अपने काँपते हाथों से एक और घूंट हलक से उतारी.... उसकी नज़र दीवार पर टंगी एक तस्वीर पर थी... तस्वीर में उसकी छोटी-सी बेटी, गोद में बैठी मुस्कुरा रही थी. उसे याद आया…
एक दिन उसकी बेटी ने बड़ी ही मासूमियत से पूछा...
“पापा… ये हरी बोतल मुझसे ज्यादा जरूरी है क्या?”
उस दिन तो हँसकर टाल गया था प्रतीक.

आज वो नितांत अकेला था... शराब की वजह से उसकी बेटी कई महीनों से उससे बात नहीं करती थी... पत्नी रूठकर मायके चली गई .

अब उसके पास इस आलीशान बंगले के इस एक कमरे में कुछ चीजें हीं बची थीं,. कुछ बोतलें... और ढेर सारी यादें.

प्रतीक आज पीने के बाद बहुत इमोशनल हो रहा था... उसकी आंखों से आँसू झर झर बह रहे थे. उसे बीता वक्त याद आ रहा था... उसने बोतल की तरफ देखा और फुसफुसाया...
“तू जरूरत थी मेरी... पर अब नहीं.. तू इतनी कड़वी भी तो नहीं … हां कड़वा तो वो रास्ता था, वो हालात थे... जिस पर चलकर मैंने अपने ही घर में अपनों को खो दिया था”

उसने बोतल उठाई… कुछ पल उसे गौर से देखा… फिर धीरे से उसे वॉशबेसिन में उड़ेल दी.

आज उसे समझ आया... शराब किसी इंसान को एक दिन में बर्बाद नहीं कर सकती... वो तो रोज़-रोज़ उन लम्हों और रिश्तों को थोड़ा-थोड़ा पीती रहती है...

प्रतीक चुप था.. कमरे में गहन सन्नाटा था... लेकिन प्रतीक के दिल में आज एक उम्मीद की छोटी-सी रोशनी जल उठी थी...




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