पर्यटन: एक अच्छी हॉबी


पर्यटन: एक अच्छा विकल्प

पर्यटन या यात्रा ज्ञान प्राप्ति के लिए एक शानदार हॉबी है. जरूरी नहीं कि यात्रा आपके मनपसंद जगह की हो या किसी धार्मिक स्थल की, हर तरह की यात्राएं आपको ज्ञान, सुकून और भावनात्मक अनुभव ही देंगी. जैसे कई खूबसूरत जगह देखकर या कोई धार्मिक जगह देखकर इंसान का बदल जाना.

यह भी अनुभव किया गया है. कई बार तो शहरी लोगों को पर्यटन से शान्ति का अच्छा अनुभव प्राप्त होता है जैसे पहाड़ों में मोबाइल का चुप होना आपको प्रकृति की समीपता का अहसास दिलाता है. जैसे पहाड़ सिखाते है, दृढ़ होना.  नदी के किनारे बैठकर समझ आता है, धीरे चलना और सतत चलते रहना.

पर्यटन से आपको कई अनजाने अनुभव भी होते हैं. जैसे रेल की खिड़की से दिखते हुए पहाड़, नदियां और नई नई जगहें. नए स्थानों में हम देख पाते हैं उस जगह के लोगों की जिंदगियां, उनके रहन सहन और उनकी संस्कृति.

पर्यटन का मनोविज्ञान पहलू यह भी है, जो लोग अकेले यात्रा करना चाहते हैं, उनका डर कम होता है. कुछ उनके जैसे सहयात्री भी उनका मनोबल बढ़ाते हैं. यात्रा उनको अपने आप को जानने का अवसर भी प्रदान करती है.

यात्रा या पर्यटन के दौरान क्या करें जिससे यात्रा मनोरंजक और ज्ञान देने वाली हो. आओ इस पर विचार करें...

ज्ञात रहे बजट के द्वारा कम पैसों में भी बड़ी यात्रा की जा सकती है.

यात्रा मैं आप जानकारी और ढेर सारी यादों एकत्रित कर सकते हैं.

यात्रा के दौरान आप फोटोग्राफी और स्केचिंग भी कर सकते हैं.

सीनियर सिटीजन धार्मिक यात्रा कर आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकते है.

नई जगह की संस्कृति वहां के भोजन का आनंद ले सकते हैं

अंत में, मैं ख्वाजा मीर दर्द की प्रसिद्ध शायरी का उल्लेख करना चाहूंगा. उन्होंने लिखा था.
सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल, 
ज़िंदगानी फिर कहाँ 
ज़िंदगानी गर रही तो, 
ये जवानी फिर कहाँ.



ध्यानाकर्षण का मनोविज्ञान

ध्यानाकर्षण का मनोविज्ञान 
Attention Seekers

ध्यानाकर्षण चाहने वाले लोग वो व्यक्ति हैं जो अपनी आदतों से मजबूर या यूं कहो अपनी हरकतों, व्यवहार या बातों से दूसरों का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहते हैं.

मनोविज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो अकसर इनका मकसद दूसरों को नज़रअंदाज़ करके अपनी बात या उपस्थिति को महत्वपूर्ण बनाना होता है.

ध्यानाकर्षण चाहने वाला व्यक्ति केवल “दिखावा” नहीं करता, अक्सर उसके व्यवहार के पीछे उसकी गहरी मानसिक कुंठा होती है. 

इसे मनोविज्ञान की दृष्टि से समझते हैं...

1) ऐसे लोगों को मान्यता और स्वीकार्यता की तीव्र इच्छा या जरूरत होती है,  ऐसे लोग चाहते हैं कि उन्हें देखा सुना और माना जाए. इसका कारण कुछ भी हो सकता है जैसे बचपन में उपेक्षा, तुलना, प्रेम में विफलता या कोई भावनात्मक कमी.

2) आत्मसम्मान की कमी महसूस होना, ऐसे लोगों के अंदर असुरक्षा की भावना पैदा करती है. इन्हें तारीफ़, लाइक्स, प्रशंसा या सहानुभूति मिलती रहनी चाहिए क्योंकि ऐसे लोगों का मन स्थिर नहीं रहता है.

3) इन लोगों में भावनात्मक खालीपन रहता है. ऐसे व्यक्ति खुद से भी जुड़े नहीं होते. इनका ज्यादातर वक्त दूसरों पे निर्भर रहता है ताकि इन्हें केवल ध्यान ओर इंपॉर्टेंस मिले.

4) ऐसे लोगों को तीव्र नियंत्रण की इच्छा होती है. ऐसे लोग अटेंशन के ज़रिए रिश्तों या माहौल पर कंट्रोल करना चाहते हैं. इनका उद्देश्य “मेरी बात सबसे ज़्यादा सुनी जाए”

5) ऐसे लोगों को अपनी पहचान का भी संकट महसूस होता है. कभी ये सोचते हैं “मैं कौन हूँ?” जवाब ना मिलने पर ये अपनी पहचान खुद ही गढ़ने लगते हैं.

6) ऐसे लोग कम व्याहारिक होते हैं. अटेंशन ना मिले तो व्यथित हो जाते है, इनका स्वभाव जिद्दी हो जाता है, उचित अनुचित की इन्हें परवाह नहीं रहती.

7) ऐसे लोगों के साथ और भी समस्याएं होती है जैसे अक्सर सोशल मीडिया में व्यस्त, छोटी छोटी बातों को बड़ा बनाना, दूसरों की बातों को अपने ऊपर ले लेना इत्यादि.

ऐसा नहीं है कि ये एक बीमारी है . यदि यह रिश्तों, काम या मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाने लगे तो यह अस्वस्थ पैटर्न माना जा सकता है और इसका निवारण होना भी जरूरी है.

ऐसे लोगों से अपना व्यवहार नम्र रखें, उन्हें शांत, सीमित और ईमानदारो के साथ अटेंशन दें, इनके ड्रामा को रिवॉर्ड ना दें, व्यवहार की स्पष्ट सीमाएँ तय करें और ज़रूरत पड़े तो सहानुभूति के साथ पेशेवर मदद सुझाएँ . उन्हें ये भी समझाएं कि यह कमजोरी नहीं है एक संकेत है जो यह चाहता है कि इनके भीतर जो चल रहा है उसे सुना जाय.

मेरे विचार से ऐसे लोग आत्म-संवाद बढ़ाएँ, रचनात्मक अभिव्यक्ति (लेखन, कला) को अपनाएं, प्रकृति से जुड़ें, यात्रा करें, अध्ययन करें, स्वस्थ रिश्ते रखें और दूसरों का सम्मान रखे तभी इनको भी सम्मान मिलेगा.


कहानी : मतलबी दुनियां


मतलबी दुनियां 

नीरज के फोन में हज़ारों कॉन्टैक्ट थे, जिनमें उसके रिश्तेदार और बहुत से दोस्त शामिल थे. लेकिन एक बार जब उसे उनकी जरूरत पड़ी सब नदारद थे.

वैसे तो वॉट्सएप ग्रुप पर वह बहुत काम का लड़का कहलाता था... किसी का रेज्यूमे बना देता, किसी का फार्म भर देता, किसी को पढ़ाई में गाइड कर देता और कोई ना की बहाने सभी का कुछ ना कुछ काम कर ही देता था. यानी यूं कहो कि सोशल मीडिया की दुनियां में छाया रहता था.

एक रात जब उसकी नौकरी चली गई, सुबह उसने स्टेटस लगाया
“कुछ दिनों से मुश्किल में हूँ।”

उसके स्टेटस पर व्यूज़ तो बढ़े, लेकिन मैसेज बॉक्स खाली ही रहा. जिसने कल तक कहा था
“भाई तू है तो सब आसान है”
आज वही बोले 
“यार अभी टाइम नहीं है।”

नीरज ने तब समझा, ऑनलाइन दुनिया में लोग डाटा की तरह होते हैं. ज़रूरत हो तो डाउनलोड,काम खत्म तो डिलीट.

उस दिन उसने एक चीज़ बदल ली, नया स्टेटस नहीं लगाया, बस एक नया रास्ता चुना. कम लोगों से बात करने लगा और पर सच्ची लेकिन कम मदद करने लगा,
वो भी बिना लाग लपेट के, निस्वार्थ.

समय के साथ उसके फोन के कॉन्टैक्ट कम हुए, लेकिन ज़िंदगी में शांति बढ़ गई. आज नीरज के पास फॉलोअर्स कम हैं पर जो भी हैं अपने है.

आज उसने एक सबक सीख लिया, आधुनिक मतलबी दुनिया में सबसे बड़ी समझदारी है, खुद को “ऑफलाइन” रखकर सही लोगों से जुड़ना और आगे बढ़ना.


कहानी : अलविदा

अलविदा

“हैलो… बेटा कैसे हो ?”
मां की आवाज में कंपन था
“सुन रहा हूं, जल्दी बोलो मम्मा. मैं अभी मीटिंग में हूं बाद में कॉल करता हूं"
हिमांशु फुसफुसाते हुए बोला
“कुछ नहीं बेटा… बस यूँ ही।”
उसकी मां की आवाज में बेबसी थी
“चलो मम्मा बाद में बात करता हूँ।”
हिमांशु ने तुरंत फोन काट दिया

कुछ घंटे ही बीते थे कि अस्पताल से फोन आया
“आपकी माँ…”
ऑफिस का काम छोड़ हिमांशु दौड़ता हुआ हॉस्पिटल पहुँचा, देखा माँ बेड पर आँखें मूंदे लेटी हुई थी

नर्स ने हिमांशु के हाथ में मोबाइल पकड़ाया और बोली 
“आपकी माता जी ने बस इतना ही कहा
"इसे मेरे बेटे को दे देना”

हिमांशु ने फोन खोला, स्क्रीन पर आख़िरी कॉल चमक रही थी
"Duration : 11 seconds"
हिमांशु को याद आया अभी कुछ समय पहले ही उसकी माँ ने कहा था, 
"कुछ नहीं… बस यूँ ही"
जैसे वो कहना चाह रही हो
“बेटा अब ज़्यादा समय नहीं है”

हिमांशु ने सिसकते हुए फोन को सीने से लगाया. उसको समझ आ गया था कभी कभी ‘बस यूँ ही’ कॉल अलविदा की भी हो सकती है..


मेरा चांद मुझे लौटा दो


मेरा चाँद मुझे लौटा दो

काली स्याह रातों में 
कोई सपनों-सा उतर आया है
मेरे बालकनी की खामोशी में
कोई उजाला भरने आया है...

वही हँसी, 
वही नज़र, 
वही सुकून
उसकी दुआओं का साक्षी 
आज भी चमकता है
वो करवा चौथ का चांद....

सोचता हूं 
किसने छीना होगा 
मेरा पूनम का चमकता चाँद
कोई मेरे हिस्स का 
वो चांद मुझे लौटा दो....


विरह की मधुशाला


विरह की मधुशाला

सूना साकी, 
सूना प्याला, 
सूनी ये महफिल
कोई छीन ले गया
खुशियां मेरी
सज गई मेरी मधुशाला...

मेरे घर में 
कभी छनकती थी चूड़ियां 
मुस्कुराहटें
आज विरह में जलाती है
मेरी मधुशाला.

साँझ ढलती है
बालकनी में मेरे
यादों की लालिमा बिखर आती है
यादों की घटाएँ छा जाती हैं,
सज जाती हैं मधुशाला...

तेरी ही बातें, 
तेरी ही यादें, 
मदिरा बन 
हलक से उतर जाती हैं.
ढूंढें फिर मधुशाला..

कैसे पियूं अमृत
जब आसूं हो हिस्से में 
मैं पीता हूं भर भर जाम
मदहोश कर देती है
मेरी मधुशाला..

मेज पर सजी 
श्रृंगार किए तस्वीर तुम्हारी
चमक रही बिंदिया 
ले लेती है मेरी निंदिया
ढूंढें मन की ज्वाला
कहां है मधुशाला....

हर जाम में 
दिखती है  मूरत तुम्हारी 
फिर क्यों याद आए तुम
यादों, सिसकियों में सजती है
मेरी ये मधुशाला....

वो कहते हैं
ग़म भुलाती है मदिरा
मैं कहता हूं 
यादें गहरी करती है मदिरा
कोई ये तो बताए 
कहां है मेरी मधुशाला..

किस किस को बताऊं 
विरह का नशा 
पल-पल हमें रुलाता है,
तुम क्या जानो बाबू
विरह में ही काम आती है
ये मेरी मधुशाला...

शीतला माता मंदिर



शीतला माता मंदिर, 
चाकसू (राजस्थान) 

प्रसिद्ध शीतला माता जी का मंदिर राजस्थान के जयपुर जिले के चाकसू कस्बे में शील डूंगरी (Sheel ki Dungri) नामक पहाड़ी पर स्थित है.  यह जयपुर शहर से करीब 35 किलोमीटर दूर, टोंक रोड पर स्थित है.


शीतला माता जी का मंदिर एक प्रसिद्ध हिन्दू देवी स्थान है. शीतला माता जी, जो चेचक, खसरा और अन्य महामारी-संबंधित रोगों से रक्षा करने वाली देवी हैं.

पर्यटन की दृष्टि से भी यह जगह बहुत मशहूर है. मंदिर एक पहाड़ी टॉप पर स्थित है जहाँ से सुंदर प्राकृतिक दृश्य, झील और अन्य पहाड़ियां भी दिखाई देती हैं. श्रद्धालु मंदिर सीढ़ियों से या पहाड़ काटकर बनाए रस्ते से जाते हैं.  

एक बार यहाँ सीढ़ियों पर "करण अर्जुन" नाम की फिल्म भी शूट की गई थी.

माता मंदिर 500 साल से भी अधिक पुराना माना जाता है और स्थानीय लोगों की आस्था का मुख्य केंद्र है, यहां साल में एक बार शीतला अष्टमी को मेले का भी आयोजन होता हैं मेले में दूर-दराज से श्रद्धालु आते हैं, माता को ठंडे पकवानों का भोग अर्पित करते हैं और पूरे दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता है. 

कहते हैं माता शीतला को प्रसाद अर्पण करने से या प्रसाद खाने से चेचक और अन्य बीमारियों से रक्षा मिलती है.  यहां भक्तों की अन्य मनोकामनाएँ भी पूरी होती हैं. 

यह मंदिर सड़क और रेल मार्ग से जुड़ा हुआ है, रुकने के लिए बहुत सी धर्मशालाएं उपलब्ध हैं जहां रुका जा सकता है.

एक जाम शाम के नाम


कविता : एक जाम शाम के नाम

जब भी शाम ढलती है
घर में ख़ामोशी सी छा जाती है
शराब के हर जाम में
यादों की परछाईंयां उतर आती हैं...

एक घूंट में 
बीता कल याद आता है,
दूसरे में अधूरी बातें 
हर जाम में याद आती है
बीते हुए लम्हों की बातें.

ये शाम, जब भी 
ओढ़ लेती है तन्हाई,
होंठों तक आती है हँसी,
और आँखों में दर्द बहक जाता है

खिड़की के बाहर
कांपती सर्द रातों मे 
दिल उनकी याद में 
नम आंखे लिए कहता है
अब तो हाथ में 
शराब का जाम हो
बस मैं रहूं या मेरा खुदा 
गवाह रहे.....


कविता : गणतंत्र दिवस


गणतंत्र दिवस.....

लहराता है तिरंगा 
हर गली चौराहे पर
कोई बैठा है, 
भूखे पेट
झंडे की छांव...

ओ संविधान की
कसमें खाने वालो
ग़रीब को रोटी 
पहुंचाने की भी
कसमें खा लो...

काग़ज़ों में अधिकार लिखे हैं 
भाषणों ने सपने पाले हैं,
आज भी किसी की 
रातभर झुग्गी टपकती है,
कोई रेन बसेरों में सोता है
बच्चे भूखे सोते हैं
और 
किसी को नर्म गद्दों में भी
नींद नहीं आती 

वोट की कीमत 
समझी जाती है
रोटी की कीमत 
कौन समझाए.....

गणतंत्र तो आता है
हर साल
हर पाँच साल,
गरीबी कैसे हटेगी
ये कौन समझाए....

उम्मीदें आज भी जिंदा है
एक दिन गणतंत्र 
और भी चमकेगा
फिर कोई भी
भूख से नहीं सोएगा...

जय हिंद
अमर रहे गणतंत्र हमारा




कहानी: नेता

कहानी : नेता

गाँव में पंचायत के चुनाव जोरों पर थे. भाषणों की तो बाढ़ आई हुई थी. नेता अपना अपना राग अलाप रहे थे.
उनमें से एक नेता कहता है
"सिर्फ मुझे ही वोट देना, देखना मैं गांव की तस्वीर बदल दूंगा"
दूसरा नेता कौन सा कम था, वो बोला 
"मैं इसे शहर की सुविधाओं से भर दूंगा"
सब चुनाव जीतने के लिए हर हथकंडे अपना रहे थे .

इसी गांव का  एक समाज सेवक हरिया ये सब सुनकर हंस रहा था. उसको मालूम था कि ये चुनाव जीतते ही गायब हो जायेंगे.

हरिया बहुत ही मेहनती व्यक्ति था. गांव के विकास में उसका भरपूर योगदान रहता था, श्रम से कभी नहीं घबराता था. जहां जरूरत पड़े वहां तुरंत पहुंच जाता था. गाँव की टूटी सड़क पर खुद फावड़ा चलाकर सड़क ठीक कर देता था. रात को अगर किसी स्कूल की छत टपकती थी तो बच्चों के साथ बैठकर टिन लगा देता था.

कुछ चुनिंदा लोगों के दबाव पर उसने चुनाव लड़ने की ठानी यह सोचते हुए कि वह गांव का भरपूर विकास करेगा.

चुनाव का दिन आया. लोगों ने पूछा
“अरे हरिया, तू किस पार्टी से है?”

हरिया मुस्कराया और बोला
“भाई, मैं काम की पार्टी से हूँ, और हमेशा काम की बात करता हूं, चाहे हारूं या जीतूं”

खैर चुनाव के नतीजे आए. नतीजे हरिया के लिए चौंकाने वाले थे. नतीजों में हरिया हार गया था. उसे थोड़ा बुरा जरूर लगा. उसने निर्णय लिया ओर गांव वालों से बोला
"अब वो कभी कोई चुनाव नहीं लड़ेगा"

अगले दिन हरिया फिर वही गांव की सड़कें ठीक करने के लिए सड़क पर फावड़ा चला रहा था.
ये देख गांव  का एक युवक बोला 
“हरिया काका, आप तो चुनाव हार गए थे ना ?”
हरिया मुस्कराया और  युवक  के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला 
“ बेटा चुनाव हार सकता हूँ पर गाँव नहीं ... जब तक जिऊंगा गांव की सेवा करता रहूंगा”
जोश में युवक ने भी फावड़ा थाम लिया, देखा देखी और भी युवक जुड़ने लगे.

चुनाव का मंच अब सूना पड़ा था, जीतने वाला नेता गायब था. 

अब सड़क पर कई निस्वार्थ नेता खड़े हो गए थे. वो भी बिना वादे और कुर्सी के.
सिर्फ और सिर्फ काम के लिए.


कहानी: प्लेटफार्म नंबर एक

प्लेटफ़ॉर्म नंबर एक 

नई दिल्ली स्टेशन और शाम का समय. अचानक ट्रेन आने का अनाउंसमेंट हुआ.
"चंडीगढ़ से अजमेर जाने वाली गाड़ी संख्या 12986 प्लेट फॉर्म नंबर 1 पर आने वाली है, जिन यात्रियों को जयपुर होते हुए अजमेर जाना है वो प्लेटफार्म नंबर 1 पर शीघ्र पहुंचे"

हरीश प्लेटफ़ॉर्म के पास की बेंच पर बैठा और आने जाने वाली ट्रेनों को और दौड़ते भागते इंसानों को देख रहा था. उसके हाथ में एक पुराना सा थैला था और आँखों में किसी अपने का इंतजार.

यह वही स्टेशन है जहां वह कई बार आया है कभी लेने आता तो कभी छोड़ने. उसकी बेटी पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ जो गई थी. जब भी जाती थी उदास होकर बोलती थी
“पापा,  आप चिंता मत करो मैं जल्दी ही लौटूंगी . वो भी इसी प्लेटफार्म नंबर 1 पर”

ट्रेन के अनाउंसमेंट ने हरीश के कान खड़े कर दिए, अरे इसी ट्रेन से तो मेरी बेटी आ रही है, वह प्लेटफार्म नंबर एक की तौरफ दौड़ रहा था.  ट्रेन भी पहुंच चुकी थी.  बोगी के बाहर खड़ा वो बेसब्री से बेटी का इंतजार कर रहा था.

अचानक भीड़ में एक जानी-पहचानी  मधुर आवाज़ सुनाई दी
“पापा…!”

हरीश ने सिर घुमाकर देखा. फिर वही चेहरा, वही आँखें वह कुछ कहता उसकी बेटी पिता से लिपट गई.

हरीश की आंखों में आँसू थे. उसकी बेटी अब हमेशा उसके साथ रहेगी. उसकी आवाज़ भरभरा रही थी. इतने में उसकी बेटी बोली 
“ अरे पापा अब क्यों उदास हो रहे हो,अब तो आपका इंतजार हमेशा के लिए खत्म हुआ, मेरी पढ़ाई जो पूरी हो गईं अब हम सब साथ रहेंगे"

हरीश को आज समझ आया… हर स्टेशन मंज़िल नहीं होता, बस कुछ अपनों के पास लौटने के लिए भी होते हैं. स्टेशन वही था, प्लेटफ़ॉर्म वही था… लेकिन हरीश का इंतज़ार अब ख़त्म हो गया था.

हरीश कुछ बोलता उसकी बेटी बोली 
"तो  पापा चलें ... अपने घर" 
दोनो मुस्कुरा रहे थे ... स्टेशन धीरे धीरे पीछे छूट रहा था...


कहानी: खिड़की


खिड़की

शहर के सबसे  पुराने पॉश एरिए में एक पुराना मकान. उसी मकान में एक बुजुर्ग अकेले रहते थे जो अक्सर उस मकान की खिड़की के पास सुबह से शाम बैठे नजर आते थे. उनका ध्यान बाहर आते-जाते लोगों को और बच्चों को देखने में बीतता था. लोग उन्हें देखकर सोचते हैं..
" इस उम्र में भी बेचारे, कितने अकेले हैं, इनके बच्चे इनका ध्यान क्यों नहीं रखते ?”

एक युवक जो उनको रोज देखा करता था, एक दिन वह कुछ सोचते हुए उनके पास गया और कहने लगा
“अंकल जी आप अकेले रहते हो और हर समय खिड़की के पास बैठे बाहर क्या देखते रहते हो. क्या आपको अकेलापन नहीं लगता?”

बुज़ुर्ग थोड़ा मुस्कराए और फीकी हंसी के साथ बोले,
“नहीं बेटा, मैं दिखने में अकेला हूं पर अकेला नहीं हूँ. मेरी पत्नी की यादें मेरे साथ है और इस खिड़की के पास बैठकर मैं ज़िंदगी को अनुभव करता हूं, देखता हूं और सोचता रहता हूं. इस दुनियां के नित नए बदलते स्वरूप को देखता रहता हूँ”

युवक उनकी दार्शनिक बातें सुनकर चुप हो गया.
बुजुर्ग ने युवक की तरफ देखा और बोले 
“दरवाज़े बंद करने से इंसान अपने आप को सुरक्षित तो महसूस करता है लेकिन खिड़की खुली हो तो वह अपने आपको ज़िंदा भी महसूस करता है”

युवक कुछ महीनों के लिए कैसी दूसरे शहर चल गया था. जब एक दिन  वह शहर लौटा तो उसका ध्यान उन बुजुर्ग के मकान पर गया . उसने देखा खिड़की बंद थी और दरवाजे पर एक नोटिस टँगा था
“मकान बिकाऊ है।”
यह देख युवक ठिठक गया और सोचने लगा अचानक ये क्या हुआ, वो बुजुर्ग कहां चले गए. अनहोनी की आशंका से वह थोड़ा घबरा सा गया था.

वह ये सब खड़ा देख सोच रहा था कि उसके कंधे पर किसी ने अपना हाथ रखा
"अरे भाई मोहन तुम्हे जानकर दुःख होगा, कुछ दिन पहले उन बुजुर्ग की मृत्यु हो गई. शहर से उनके बेटे बहु आए थे क्रिया कर्म की रस्म निभाई और ये बेचने का बोर्ड लगा गए "

"ओह ये बड़ा दुखद है" 
यह कहते हुए युवक उस बंद खिड़की के पास गया. उसे खोलने लगा और उसने देखा, बाहर ज़िंदगी वैसी ही थी, सब कुछ वैसे ही चल रहा था वही खेलते हुए बच्चों की हँसी, धूप और भागती हुई हवा.

ये सब देख उसे एहसास हुआ, बुज़ुर्ग तो चले गए, लेकिन ज़िंदगी को इस तरह महसूस करने की आदत यहीं छोड़ गए.

युवक ने खिड़की बंद नहीं की क्योंकि कुछ पुराने घरों की खिड़कियां बुजुर्गों के लिए जीने के सहारा और जिंदगी होती है तो कुछ लोगों के लिए विरासत या फिर सन्नाटा एक गहरा सन्नाटा.








शीशे का शहर


ये शहर : शीशे का 

वो जमाना लद गया
जब ईंट गारे से
घर बना करते थे
अब तो चारों तरफ
शीशे से बनी स्क्रीन ही स्क्रीन 
नजर आती है.

मैं अब 
शहर का नागरिक हूं
जेब में स्मार्टफोन,
कलाई में स्मार्टवॉच,
और दिल में अजीब-सी 
ख़ामोशी रखता हूं.

अब सुबहों को अलार्म नहीं, 
मोबाइल जगाता है
सब ऑनलाइन रहते हैं
कोई शोर नहीं होता
नोटिफिकेशन सब याद दिलाते है..

मैने एक दिन सोचा
गाँव में चलते हैं
ये क्या , यहां भी
गांव शहर हो गया
पुराने मकान पक्के 
खिड़की दरवाजे 
शीशे के हो गए

फिर एक दिन 
मोबाइल अचानक बंद हो गया
बैटरी खत्म हो गई
मैं घबरा गया
जैसे रुक गई हो सांसें..

सोचा खिड़की के बाहर झांकूँ 
पेड़ अब भी हरे भरे हैं,
आसमान अब भी नीला है,
कुछ लोग अब भी इंसान हैं,

ओह
मोबाइल फिर से चल पड़ा,
मैं सपनों से बाहर निकला
खो गया फिर से 
उन शीशे की दीवारों के पीछे

शहर वही है
मैं भी वही हूं
बस जिंदगी
शीशे के पीछे 
धकेल दी गई है...



मेरी मधुशाला


मैं और मेरी मधुशाला

मेरी मधुशाला 
कोई शराबखाना तो नहीं 
ना कोई कैद है
मेरे मन का वो कोना है
जहाँ मेरे भावों का
भावनाओं का आईना है.

मैं यहाँ शराब
बोतलों में नहीं भरता,
ये वो यादें हैं, जो जाम बनकर
छलकती रहती है
फिर दिल में उतर जाती हैं...

कभी,  
हँसी से छलकते थे
खुशी के जाम, उनको साथ लिए
मधुशाला सी जिंदगी में 
कई तैरते हुए 
सपनों के जाम पिए हुए..

अब कौनसा जाम उठाऊं
बुझे बुझे से शब्दों का 
कविताओ ने पी लिया है
जहर मेरे जज्बात का...

कभी मधुशाला थी जिंदगी
प्रेम था नशा
बिन शराब के 
आज विरह ने रंग दिखाया है
उन रंगीन प्यालों का.

जिसे समझा था 
अमृत मैं
वही यादों का 
नशा बन गया...

यहाँ आँसू भी नशा है
हम फिर भी पिये जाते हैं,
किसी की याद में 
जी को जलाते हैं
हम बन गये शराबी 
अब तो मधुशाला में ही 
दीप जलते हैं...

ना कोई नियम, 
ना कोई पहरा,
अब कोई नहीं पूछता 
मेरा नाम पता
सबको मालूम है
महखाना ही है 
मेरा असली पता..

दिन छोटा सा
ऊंघता रहता है
और ये लंबी रातें 
जागती रहती हैं
नशे में करती रहती हैं
इंतजार उनका...

ये मेरी मधुशाला है
यादों वादों की
इसका कोई समय नहीं होता
जब प्यास लगे 
जाम छलक ही जाता है
आँखें में या प्यालों में...

यह वो नशा नहीं है दोस्त
जिसको सब को तलब होती है
ये तो किसी की याद का 
पैमाना होता है...

एक दिन जिंदगी की 
ये बोतल भी टूट जायेगी
देह पहचान सब छूट जाएगा,
मेरी यादों की मधुशाला रहेगी
उसमें एक नाम और जुड़ जाएगा...



My beloved wife


मेरी स्वर्गीय पत्नी के नाम

इस घर की खामोशी में 
आज भी तुम 
चहकती नजर आती हो
घर के हर कोने में 
तुम्हारी ही हँसी गूंजती है...

रसोई से खुशबू, 
आँगन की धूप 
तुम्हारी वजह से ही
अच्छी लगती थी....

साथ नहीं हो, 
फिर भी साथ हो 
मेरी हर साँस में 
आबाद हो 
दुख में ढाल हो
सुख में उजाला बनकर,
आज भी मेरे करीब हो

तुम दूर चली तो गईं हो
पर छोड़ा नहीं तुमको मैने 
तुम्हे थाम के रखा है
ढेर सारी यादों में...

तुम जहां भी हो
स्वर्ग में हो या देव लोक में 
आज भी मेरी प्रार्थनाओं में हो
देह से दूर, मेरी आत्मा में हो
तुम्हीं तो मेरे जीवन की
कविता हो, भावना हो
दूर हो फिर भी करीब हो...



वरिष्ठ नागरिक दिवस


21.08.2025
आज अंतरराष्ट्रीय वरिष्ठ नागरिक दिवस है, 
सभी वरिष्ठ नागरिक मित्रों को बहुत बहुत बधाई...  
वरिष्ठ नागरिक मतलब अनुभवों का खजाना
चाहे माने या ना माने जमाना... 

मेरे कुछ अनुभव...

कौन करता है सम्मान
अब वरिष्ठ नागरिकों का
सरकार भी करती है
खानापूर्ति इनके नाम पर....

ढेर सारा आयकर
रेलवे कंसेशन बंद
बसों में भीड़
जैसे सारी कमाई सरकार की
इन्हीं से आती है....

नेता मुफ्त घूमें
और वरिष्ठ नागरिक घर बैठें
तीर्थयात्रा भी ना करें
बैंक की लंबी लाइने 
सरकारी दफ्तरों के चक्कर
इन चक्करों में बन जाते है
बेचारे घनचक्कर
क्यों भूल जाते हैं ये नेता भी
एक दिन बनेंगे ये भी
वरिष्ठ नागरिक.....

ये सौभाग्य कहूं या दुर्भाग्य
राष्ट्रपति, पीएम और नेता 
सब हैं वरिष्ठ नागरिक 
फिर क्यों दुःखी है
आम वरिष्ठ नागरिक...

वादा नहीं
कल्याण चाहिए
वरिष्ठ नागरिकों का
उद्धार चाहिए....

इनकी भी है
एक छोटी सी कहानी
की लड़कपन खो गया
जवानी जाती रही
कब झुर्रियों ने घेरा
कब आंख कमजोर हो गयी
कुछ चले गए
कुछ रह गए
और कल का 
किसी को पता नहीं
कौन कब टपक जाए...

छोड़ों कल की बातें
आओ जश्न मनाते हैं

सीनियर सिटीजन मतलब
जीवन ; एक संघर्ष और
जनाज़े की तैयारी शुरू ....
😊😊😊😊😊

राष्ट्रीय बालिका दिवस


राष्ट्रीय बालिका दिवस 

भारत में राष्ट्रीय बालिका दिवस हर साल 24 जनवरी को मनाया जाता है. इसके मनाने का उद्देश्य यह है कि बालिकाओं को उनके अधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य और समानता के प्रति समाज में जागरूकता बढ़ाई जाय. देश में बालिका भ्रूण हत्या और बाल विवाह जैसी कुप्रथाओं  को दूर किया जाय. लड़कियों की शिक्षा और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया जाय.

इस दिवस की शुरुआत 2008 में भारत सरकार द्वारा की गई थी. बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करना इसका मूल उद्देश्य रखा गया था.

ध्यान रहे आज की बालिका ही कल की सशक्त नारी है और जब जबउसे अवसर मिलता है तो परिवार, समाज और देश  को सबसे आगे बढ़ती हैं.

“बेटी बोझ नहीं है
देश का भविष्य है
उसे मुक्त उड़ान दो, 
ये आसमान भी
सिर्फ उसका है।”

My beloved wife








My beloved wife 

She is not gone,
she walks beside me 
in my silent prayers
in each 
and every thought.

When I feel
nights are long,
and days are short
I find her love
all the time 
in air.

Time could not break
what we have made
But not death
and  distance,
not even fate.

You lives in me,
my heart, 
my soul,
my beloved wife
forever whole.


My beloved wife

मेरी पत्नी के लिए...

तुम्हारी मुस्कान
आज भी मेरी सुबह है
और शाम भी.

तुम्हारी 
गहन खामोशी 
हर शाम 
मौन होकर बोलती है.

तुम चली तो गईं हो
पर स्नेह के बंधन
यहीं छोड़ गई हो
जो बस गई है
मेरी रूह में 
मेरी साँसों में,
मेरी दुआओं में..

क्या कहूं 
तुम्हारे बिना ये घर
एक कमरा बन गया है
और मेरा जीवन
एक कविता
और एक
अधूरी सी कहानी.

मेरे हर शब्द में
इन सांसों में 
यादों में 
तुम ही तो हो..




कहानी: शिक्षित बहू


शिक्षित बहू

चौबेपुर गाँव में पंडित हरि नारायण शर्मा का परिवार अपनी परंपराओं और संस्कारों के लिए जाना पहचाना जाता था. वैसे तो घर के मुखिया पंडित हरि नारायण शर्मा पुराने विचारों के थे. वो ऐसा मानते थे कि बहू जितनी कम पढ़ी-लिखी हो, उतनी ही आज्ञाकारी, संस्कारी और ग्रह कार्य में दक्ष होती है.

लेकिन फिर भी कुछ सोचकर उन्होंने अपने बेटे रोमेश की शादी शहर की पढ़ी-लिखी, साधारण परिवार में पली निधि नाम की लड़की से करा दी. निधि अच्छे अंकों से बी एस सी., बी.एड. पास थी.

रोमेश की शादी साधारण रीति रिवाज के साथ हो गई. बहु घर भी आ गई. बहू के घर आते ही गांव के लोगों के बीच कानाफूसी भी शुरू हो गई.
"अरे इतनी पढ़ी-लिखी बहू, घर कैसे संभालेगी? पंडितजी ने ये क्या कर किया ?”
“ पढ़ी लिखी है अगर कहीं नौकरी की ज़िद पकड़ ली तो पंडित जी के संस्कारों का क्या होगा”
कुछ चटकारे ले रहे थे कुछ चिंता में थे तो कुछ थे सोच रहे थे, 
"छोड़ो यार... हमे क्या लेना देना, पंडित जी जाने और उनका परिवार"

निधि के कानों तक भी ये बात पहुंची, वो जानकर अनजान बनी रही और अपना काम सुरुचिपूर्ण तरीके से करती रही जैसे सुबह सबसे पहले उठकर पूजा, रसोई और सास-ससुर की सेवा. वह सब काम पूरे मन से करती थी. यहां तक कि वह घर परिवार के बच्चों को पढ़ाती भी थी, सास की दवाइयों को समय पर खिलाना याद रखती थी और यहां तक कि घर के खर्चों का हिसाब भी समझदारी से संभालती थी. पंडित जी ऐसी बहू पाकर फूले नहीं समाते थे.

एक दिन अचानक निधि की सास की तबीयत बिगड़ गई. गाँव में डॉक्टर नहीं था. निधि ने बिना घबराए और समय गवाएं प्राथमिक उपचार कर किया, एम्बुलेंस बुलवाई गई और समय रहते सास की जान बच गई. डॉक्टर ने बोला
“अगर थोड़ी देर हो जाती, तो हालात बिगड़ सकते थे लेकिन अब घबराने की कोई बात नहीं है ”
पहली बार पंडित जी को लगा कि पढ़ाई कितनी जरूरी है और उनका लिया हुआ निर्णय कितना सही रहा.

कुछ दिनों के बाद निधि की सास के पूर्ण रूप से ठीक हो गई , निधि ने सास ससुर से अनुमति लेकर गाँव की लड़कियों के लिए शाम की पाठशाला शुरू कर दी. धीरे धीरे वही लोग, जो कानाफूसी करते थे, अपनी बेटियों को निधि के पास पढ़ने भेजने लगे.

एक दिन भरी पंचायत में हरि नारायण शर्मा गर्व से बोले
“मुझे गर्व है ; हमारी बहू पर और आज , मैं ये मानता हूं की पढ़ाई संस्कारों की दुश्मन नहीं होती बल्कि उनकी साथी होती है"

दूर खड़ी निधि यह सब सुनकर मुस्कुरा रही थी मानो कह रही हो पढ़ी लिखी सुसंस्कृत बहू घर तोड़ती नहीं है, उसे और भी मज़बूत बनाती है.




कहानी: खाली वॉलेट


खाली वॉलेट 

शहर के सबसे ऊँचे टावर में कॉरपोरेट जगत की आपात बैठक चल रही थी. देश के सबसे अमीर लोग, उद्योगपति, निवेशक, टेक-सम्राट एक समस्या पर विचार विमर्श कर रहे थे.

सुबह से पूरे शहर का बिजली नेटवर्क ठप था नतीजा थोड़ी देर में  इनवर्टर भी खत्म, ना इंटरनेट, ना बैंकिंग और ना ही कोई डिजिटल ट्रांजैक्शन. वैसे भी इस डिजिटल युग में कैश कौन रखता है ? वर्षों से किसी ने रखा ही नहीं सब डिजिटल कैश के भरोसे.

बिजली नेटवर्क फैलियर के कारण
लिफ्ट अटकी, 
दरवाज़े नहीं खुले
एसी बंद 
मोबाइल भी कहीं खो गए

एक प्यासा अरबपति घबराकर चिल्लाया 
“मेरे पास सब है… बस एक गिलास पानी नहीं है, कोई एक गिलास पानी दे दो।”

दूसरे ने घड़ी उतारते हुए बोला
“यह दुनिया की सबसे महँगी घड़ी है, कोई इसके बदले में एक गिलास पानी ही दे दो”

वहीं सीढ़ियों पर बैठा सफ़ाईकर्मी अपनी पुरानी पानी की बोतल, चाय की थर्मस, अपनी पहचान का कागज और एक चाबी जो दरवाजे की मैनुअल चाबी थी लिए बैठा था.

हॉल में अंधेरा था, सब हॉल के कांच और जाली के दरवाजे से उसे देख रहे थे. उन्होंने देखा उसके पास पानी है और थर्मस भी है. उनकी आंखों में चमक आई.

सबको अचानक सामने देख वो घबराकर बोला
“पानी दूँगा, दरवाज़ा भी खोल दूँगा पर पैसे नहीं चाहिए मुझे”

सब उसकी बात सुनकर चौंक पड़े
“तो क्या चाहिए?” किसी नउद्योगपति ने पूछा

वह थोड़ा मुस्कुराया और बोला
“पहले मेरी बात सुनिए. जब आप लोग सिस्टम से चलते हैं तो आप हमें नहीं देखते और जब सिस्टम रुकते हैं तब आपको समझ आता है कि कौन और क्या ज़रूरी है।”

उसने दरवाज़ा खोला, सब बाहर आए, सबने पानी पिया, सबकी सांस में सांस आई.

जद्दोजहत के बाद नेटवर्क भी लौटा, मोबाइल चमके, डिजिटल वॉलेट फिर भारी हो गए लेकिन एक चीज़ हल्की रह गई अहंकार.

सब दहशत से निकले, खुशी महसूस की, अपने खाली वॉलेट की तरफ देखा और आज जाना सीखा की पैसा बस दर्शक बनकर रह जाता है. इंसान ही इंसान के काम आता है क्योंकि पैसे की भी एक सीमा होती है.


यादों की बारिश

यादों की बारिश

सुनसान रातों के
रात के सन्नाटे में 
तारों की बारात
और यादों की बारिश 

हँसी की शहनाई,
आँसुओं की ढोलक,
कुछ पल रुठे हुए,
बाहों में सिमटे हैं

पुराने खुशबू वाले खत,
कुछ ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें 
अधूरे सपनों की पोटली,
वक़्त की गठरी में  बंधे लम्हे 
कभी बूढ़े नहीं होते

रात के सन्नाटों में 
जब दिल का दरवाज़ा खुलता है
फिर से यादों की बारात
चुपचाप भीतर तक 
उतर आती है.....


लेख : अकेलापन


अकेलापन 

अकेलापन क्या है ? 
ये मनुष्य के जीवन का एक ऐसा समय है जब वो अपने आप को भीड़ में भी अकेला महसूस करने लगता है.

अकेलापन केवल शारीरिक एकांत नहीं है बल्कि भावनात्मक दूरी का दुसरा नाम है क्योंकि आज के आधुनिक, तेज़ रफ्तार जीवन में अकेलापन एक बड़ी और आम सामाजिक समस्या बनता जा रहा है, जहाँ दोस्त और रिश्तेदार तो बहुत हैं, उनके साथ संवाद भी है फिर भी लोगों में अपनापन कम होता जा रहा है.

वैसे तो अकेलेपन के कई कारण होते हैं जैसे परिवार से दूरी, मित्रों की कमी, जीवनसाथी का चले जाना, ढलती उम्र या सामाजिक उपेक्षा. ये सभी अवस्थाएं अकेलेपन को जन्म देती हैं. तकनीक के इस युग में लोग मोबाइल और सोशल मीडिया से जुड़े तो हैं, पर दिलों का जुड़ाव फिर भी कमजोर पड़ता जा रहा है. आभासी रिश्ते वास्तविक संबंधों का स्थान नहीं ले पा रहे हैं. यही खालीपन का कारण है.

अकेलेपन का प्रभाव व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है जिसके कारण उदासी, निराशा, आत्मविश्वास की कमी, तनाव और अवसाद जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं.  ये अकेलापन कभी कभी व्यक्ति को भीतर से तोड़ देता है और वह स्वयं को समाज से अलग-थलग महसूस करने लगता है.

अगर दूसरी दृष्टि से देखा जाय तो ये अकेलापन हमेशा नकारात्मक नहीं होता बल्कि एक अवसर भी देता है जहां  हम कुछ क्षणों का एकांत आत्मचिंतन, सृजन और आत्म-खोज का अवसर प्राप्त करते हैं. अनेक विद्वान लोग, कवि, लेखक और विचारक अपने एकांत में ही श्रेष्ठ रचनाओं को जन्म देते हैं और  समाज और देश का मार्गदर्शन भी करते हैं. देखा जाय तो समस्या तब होती है जब अकेलापन बोझ बन जाए और मन को कचोटने लगे.

इस अकेलेपन से उबरने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति अकेले में स्वयं से संवाद करे और दूसरों से मिलने जुलने का प्रयास करे और परिवार और मित्रों के साथ समय बिताये, समाज सेवा, पढ़ाई लिखाई, ऑनलाइन कोर्सेस, योग, यात्रा, धार्मिक गतिविधियों में रुचि लेना, सामाजिक सेवा, प्रकृति के साथ समय बिताना ; जैसे पहाड़, नदी, या खुले आकाश का आनंद ले. यही रुचियां हमारे मन को शांति देती हैं. एक बहुत अच्छा उपाय यह भी है ; ब्लॉग बनाकर अपने अनुभवों को साझा करे या अपने आप को रचनात्मक कार्यों में लगाए. इससे भी अकेलेपन को सकारात्मक दिशा मिल सकती है.

सारांश में यह कहा जा सकता है कि अकेलापन जीवन का एक सत्य है, पर इसे समझदारी और सूझबूझ से संभाला जाए तो यह हमें स्वयं को समझने और मजबूत बनने का अवसर भी देता है. बस आवश्यकता है तो संतुलन की, जहाँ एकांत आत्मविकास का साधन बने, न कि मन की पीड़ा.




कहानी : नीयत

नीयत: एक सच

असलियत में नीयत वही होती है, जो मौका मिलने पर ही सामने आती है, इस संबंध में, मैं एक छोटी सी कहानी प्रस्तुत कर रहा हूं.

एक छोटे से कस्बे में राजेश नाम का साधारण व्यक्ति रहता था. राजेश शांत व्यवहार का और मीठा बोलने वाला व्यक्ति था यही कारण था कि कस्बे के लोग उसे एक अच्छा इंसान मानते थे. वह हमेशा कहता था 
“मैं अपने दिल से किसी का बुरा सोच ही नहीं सकता।”

एक दिन राजेश नहर के किनारे चहलकदमी कर रहा था  तभी उसकी नज़र नहर के किनारे पड़े थैले पर पड़ी. कौतूहलवस उसने जब थैला खोला तो उसमें कुछ रुपए और सोने के गहने थे. आसपास कोई भी नहीं था. यह देख राजेश का एक मन बोला 
“किस्मत ने मौका दिया है, इसे रख ले ”
लेकिन तुरंत ही उसका दूसरा मन बोला 
“यह किसी की अमानत है, पता लगाओ और उसे तुरन्त लौटाओ”

सोच विचार के बाद राजेश ने थैला उठा ही लिया और घर ले आया. उसने खुद को समझाया 
“जब कोई देखने वाला कोई नहीं था तो इसको रखने में बुराई ही क्या है?”

कुछ दिनों बाद उसी कस्बे का एक बूढ़ा व्यक्ति रोता हुआ जा रहा था. किसी ने बताया उसकी बेचारे की ज़िंदगी भर की जमा-पूँजी नहर के आस पास या कहीं नहर में गिर गई है. बेचारे ने ये पैसे उसने अपनी बेटी की शादी के लिए बचा रखे थे.

यह सुनकर उस रात राजेश सो नहीं सका. सोने और रुपयों से भरा थैला उसे बेचैन कर रहा था. उसे ये एहसास होने लगा कि इंसान की गलत नीयत ही सबसे पहले आत्मा को बेचैन कर देती है.

अगली सुबह जल्दी में राजेश ने थैला उठाया और सीधे उस बूढ़े के पास पहुँचा. रुपए और गहनों से भरा थैला लौटाते हुए  बोला 
"बाबा  ये है आपकी अमानत"
यह बोलते हुए राजेश की आँखों में  पश्चाताप के आँसू थे और मन के किसी कोने में दुःख भी था.

बूढ़े ने अपने कांपते हाथों से थैला लिया और हाथ जोड़ते हुए बोला 
“बेटा, आज तुमने मेरा ही नहीं मेरी बेटी का भी भविष्य बचाया है”







My beloved wife

रात और यादें...

बालकनी की रेलिंग से
रात के गहन अंधकार में 
कुछ अधूरे ख़्वाब नजर आए 

ये रात का साया 
रोशनी से नहाया ये शहर
दूर तक चमकता रहता है

आँखों में थकी रोशनी,
और खामोश हवा कहती है
सब तो ठीक है, 
बस थोड़ी सी 
आंखों में नमी है

मेरे दिल में 
गहन अंधेरा है
मेरा खोया नूर अब
कहीं तारा बन के चमकता है
मैं यादों में सिसकता हूं.

यह रात 
मेरे कान में धीरे से फुसफुसाई 
जीना भी एक कला है, 
तू बस जीने का तरीका देख





My beloved wife


चैन नहीं किताबों में....

नहीं मिलता चैन, किताबों में
जब से आई हो तुम, मीठे ख्यालों में

हर लफ़्ज़ में, बस तेरा ही असर है,
खो गया हूँ मैं तो, तेरे ख़यालों में

नींद भी अब,  रुठी हुई है 
ये रात नहीं कटती है,
उलझ जाती है, बस यादों में 
या उलझे सवालों में

आईना भी पूछता है, 
अब हाल मेरा 
जब में दिखता हूँ 
उसको टूटे ख़्वाबों में

लोग कहते हैं,  वक़्त मरहम है,
ज़ख़्म गहरे हैं तेरे , 
अब भी यादों में


My beloved wife

तुम्हारी खूबसूरत यादें और ये धुंध....

आज धुंध उतरी है 
चुपचाप मेरे शहर की राहों पर,
मैंने भी ओढ़ ली है
सपनों की चादर.

जो दिखा नहीं, 
वही पास लगा
ख़ामोशी ने आज फिर 
मुझसे बात की है..

शुभ प्रातः मित्रों 
आज का दिन मंगलमय हो 

gkkidiary.blogspot.com

My beloved wife


धुंध 
(तुम्हारी स्मृति में ढली हुई)

आज सुबह की धुंध
कुछ ज़्यादा ठहरी हुई थी,
जैसे उसे भी मेरी तरह
किसी का इंतज़ार हो.

मंजिले वही हैं
और रास्ते भी
पर एक पहचान खो बैठे हैं
पेड़ भी आज नज़रें चुराने लगे हैं
हर चीज़ धुंधली नजर आती है
सिवाय तुम्हारी यादों के.

तुम्हारी खूबसूरत हँसी
धुंध के बीच से उभर आई,
फिर मैं उसी में खो गया
मैंने तुम्हें जोर से पुकारा
मेरी आवाज़ दूर कहीं खो गई.

आज इस धुंध ने 
मुझे झकझोंर कर कहा
जो चला जाता है
वह पूरी तरह नहीं जाता,
बस छोड़ देता है हर जगह
अपनी उपस्थिति.

कभी-कभी
धुंध मुझे अच्छी लगती है,
क्योंकि इसमें 
तुम्हारा न होना भी
साफ़ नहीं दिखता.

धुंध भी छँट जाती है
सूर्य निकल आता है
मैं रोशनी से घिर जाता हूं
तुम्हारा साया लुप्त हो जाता है.

जाते-जाते ये धुंध 
कुछ तो दे जाती है
एक पल के लिए
मैं फिर से तुम्हारे साथ हो लेता हूँ.



My beloved wife


यादों के पंख....

मेरी आंखों के सामने 
उनको जला दिया गया 
वो एक आत्मीय पहचान 
अब धुएँ में बदल गई थी
और मैं इसी जमीं पर रह गया
इन भीगी हुई आंखों में 
एक गहरा सन्नाटा लिए हुए .

राख बन गया 
उनका शरीर,
मेरे भीतर अब भी
बहुत कुछ जल रहा है
जो सोने नहीं देता
उसकी आवाज़ आती है.

वो तो चली गई है
बहुत दूर इस देह से भी परे
इतनी दूर जहाँ 
मेरे शब्द नहीं पहुँचते,

अब तो यादें भी खामोश हैं
और ये खामोशी एक संवाद 
समय की राख टटोलता हुआ
मैं एक बुझा सा इंसान
और वो अनंत की गोद में 
चिर लीन विलीन.






वरिष्ठ नागरिकों के लिये

प्रिय वरिष्ठ नागरिकों 

खासकर उनके लिए जिनका जन्म 1960, 1961, 1962, 1963, 1964, 1965, 1966, 1967, 1968, 1969, 1970, 1971, 1972, 1973, 1974, 1975, 1976, 1977, 1978, 1979, 1980 में हुआ है, अर्थात यह वो पीढ़ी है जो अब 45 से ऊपर की ओर बढ़ रही है.

जैसा कि आपको मालूम होगा इस पीढ़ी की सबसे बड़ी सफलता यह है कि इसने ज़िंदगी में बहुत से बड़े बड़े बदलाव देखे और उन्हें आत्मसात भी किया है.

1, 2, 5, 10, 20, 25, 50 पैसे देखने वाली यह पीढ़ी इन पैसों का महत्व समझती थी और बिना झिझक के मेहमानों से पैसे ले भी लिया करती थी.

कलम और स्याही से लेकर पेन पेंसिल तक और उसके बाद आज यह पीढ़ी स्मार्टफोन, लैपटॉप, पीसी को भी बखूबी चला रही है.

जिनके लिए बचपन में साइकिल भी एक विलासिता थी, वही पीढ़ी आज बखूबी स्कूटर, बाइक और कार चला रही है.

ये वो पीढ़ी है जो कभी चंचल तो कभी गंभीर लेकिन संस्कारों में पली है

टेप रिकॉर्डर, पॉकेट ट्रांजिस्टर, ये सब कभी बड़ी कमाई का प्रतीक थे. रेडियो और टीवी के आने से जिनका बचपन बरबाद नहीं हुआ, वही पीढ़ी है ये.

कुकर की रिंग्स से रिंग बॉल और टायर से “गाड़ी–गाड़ी खेलना” इन्हें कभी छोटा नहीं लगता था. कपड़े की गेंद से बहुत खेले हैं.

“सलाई को ज़मीन में गाड़ते जाना” – यह भी उस जमाने का खेल था और मज़ेदार भी.

“कैरी (कच्चे आम) तोड़ना” इनके लिए चोरी नहीं था.

किसी भी वक्त किसी के भी घर की कुंडी खटखटाना गलत नहीं माना जाता था.

“दोस्त की माँ ने खाना खिला दिया” – इसमें कोई उपकार का भाव नहीं, और “उसके पिताजी ने डांटा” तो इसमें कोई ईर्ष्या भी नहीं होती थी.… 

घर के पास दोस्तों की या स्कूल मके दोस्तों की बहन को अपनी ही बहन समझा जाता था. 

दो दिन अगर कोई दोस्त स्कूल न आया तो स्कूल छूटते ही बस्ता लेकर उसके घर पहुँच जाते थे.

किसी भी दोस्त के पिताजी स्कूल में आ जाएँ तो मित्र कहीं भी खेल रहा हो, दौड़ते हुए जाकर खबर देना:
“तेरे पापा आ गए हैं, चल जल्दी” – यही उस समय की ब्रेकिंग न्यूज़ हुआ करती थी.

मोहल्ले में किसी भी घर में कोई कार्यक्रम हो तो बिना संकोच के काम कर दिया करते थे.

कपिल, सुनील गावस्कर, वेंकट, प्रसन्ना की गेंदबाज़ी देखी, स्टेफी ग्राफ, अगासी का टेनिस देखा, राज, दिलीप, धर्मेंद्र, जितेंद्र, अमिताभ, राजेश खन्ना, आमिर, सलमान, शाहरुख, माधुरी और इन पर फिदा रहना. कापी को गानों और फिल्मी नामों से भर देना.

पैसे मिलाकर भाड़े पर VCR लाकर 4–5 फिल्में एक साथ देखना.

“शिक्षक से पिटना” इसमें कोई बुराई नहीं थी, बस डर यह रहता था कि घरवालों को न पता चले, वरना वहाँ भी पिटाई होगी और शिक्षक से ऊंची आवाज में बात नहीं करने वाली और उनका आदर करना, उन्हें प्रणाम करना.

कॉलेज में छुट्टी हो तो यादों में सपने बुनने वाली पीढ़ी और बिना मोबाइल, SMS, व्हाट्सऐप के रहना, केवल मिलने की आतुर प्रतीक्षा करना.

पंकज उधास की ग़ज़ल “तूने पैसा बहुत कमाया, इस पैसे ने देश छुड़ाया” सुनकर भावुकता से आँखें पोंछना 

लिव–इन तो छोड़िए, लव मैरिज भी बहुत बड़ा “डेरिंग” समझना और कॉलेज में लड़कियों से बात करने वाले लड़के भी एडवांस कहलाते थे.

दोस्तों गुज़रे दिन तो नहीं आते, लेकिन यादें हमेशा साथ रहती हैं और उन यादों को सुनहरी यादें समझना.

अपना भी वो ज़माना था जब प्ले स्कूल जैसा कोई कॉन्सेप्ट ही नहीं था बस सीधे 6–7 साल पूरे होते ही सीधे स्कूल भेज दिया जाता था.

पैदल, साइकिल से या बस से भेजने पर  चाहे बच्चे अकेले स्कूल जाएँ या दोस्तों के साथ, इससे कोई अनहोनी होगी ऐसा डर माता–पिता को कभी नहीं होता था. उस समय हम दो हमारे दो का कांसेप्ट ही नहीं था.

पास/फेल यही सब चलता था और प्रतिशत (%) से हमारा कोई वास्ता नहीं होता था. उस जमाने में ट्यूशन लगाना शर्मनाक माना जाता था क्योंकि यह कमजोर बच्चों की निशानी होती थी.

किताब में पत्तियाँ और मोरपंख रखकर पढ़ाई में तेज हो जाएँगे यह हमारा दृढ़ विश्वास होता था.

कपड़े की थैली में किताबें रखकर पीठ में लादकर स्कूल जाया करते थे स्कूल की टंकी से पानी पीया करते थे.

हर साल नई कक्षा के लिए किताब कॉपी पर कवर चढ़ाते थे और नई किताबों की खुशबू का आनंद लिया करते थे.
कई बार तो साल के अंत में पुरानी किताबें बेचना और साल के शुरू में नई किताबें खरीदना होता था वो भी बिना शर्म के, पैसे जो बचते थे.

दोस्त की साइकिल के डंडे पर एक बैठता, कैरियर पर दूसरा और इधर उधर घूमन बस यही हमारी मस्ती हुआ करती थी.

स्कूल में सर से पिटाई खाना, धूप में खड़ा होना, अपनी अपनी कक्षाओं की रोल नंबरवाइज सफाई करना. टाट पट्टी पर बैठकर डेस्क पर लिखना और थैला अर्थात बस्ता डेस्क में ही रहना.

घर में स्कूल में, मार खाना तो रोज़मर्रा का हिस्सा होता था और मारने वाला और खाने वाला  दोनों ही खुश रहते थे, खाने वाला इसलिए कि “चलो, आज कल से कम पड़ा” मारने वाला इसलिए कि “आज फिर मौका मिला”

नंगे पाँव, लकड़ी की बैट और कपड़े की बॉल से
गली–गली क्रिकेट खेलना वही असली सुख होता था.

उस जमाने में पॉकेट मनी नहीं होता था और जो माता–पिता ने दिया वही बहुत होता था क्योंकि हमारी ज़रूरतें बहुत छोटी थीं जो परिवार पूरा कर देता था.

दिवाली में फ़टाकों और फुलझड़ी की लड़ी खोलकर
फोड़ना और चलाना हमें बिल्कुल भी छोटा नहीं लगता था अगर कोई और पटाखे फोड़ रहा हो तो उसके पीछे–पीछे भाग जाना यही हमारी मौज हुआ करती थी.

हमने कभी अपने माता–पिता से यह नहीं कहा कि
“हम आपसे बहुत प्यार करते हैं” क्योंकि उस जमाने में हमें “I Love You” कहना आता ही नहीं था.

आज हम जीवन में संघर्ष करते हुए इस विशाल दुनिया का एक अहम हिस्सा बने हैं. हम में से कुछ ने बहुत कुछ पाया तो कुछ संतुष्ट रहे.

हम दुनिया के किसी भी कोने में रहें लेकिन सच यह है कि हमने हकीकत में जीया और हकीकत में बड़े हुए. दुनिया देखी और समझी. औपचारिकता और बनावटी दुनिया से से दूर भी रहे.

हमने कभी अपनी किस्मत को दोष नहीं दिया क्योंकि हम मेहनत के सपनों में जीते थे और शायद वही सपने हमें जीने की ताक़त देते हैं.  हमारी पीढ़ी ने जितने बदलाव देखे उतने शायद ही कोई और  पीढ़ी देखेंगी.

ये हमारा जीवन वर्तमान से कभी तुलना नहीं कर सकता क्योंकि वो दुनियां अलग थी आज की दुनियां से बेहतर थी.

ये तो उस जमाने की बानगी है, इससे ज्यादा बहुत कुछ गुजरा है वो अच्छा भी था या सबक था. लेकिन उन पलों को याद कर आज भी चेहरे पर मुस्कान आ ही जाती है.

मित्रों आप ने और क्या क्या अनुभव किए मुझे बतलाना, अनुभव लिखना और मुझे गाइड भी करना, मैं उन्हें अगले पार्ट में अवश्य शामिल करूंगा.

जय श्री कृष्णा 

आपका मित्र
डॉ गणेश


If you are a senior citizen

Notice : if you are a senior citizen....

As you know, at 60; killing time is really tough specially when you are alone.

Here are some calm and healthy ways suited for old age people.

For Peaceful & Fulfilling Activities
*Go for morning or evening walks ( May be at parks, riversides, hills or nearby)

*Calmly sit with the nature: watch birds, clouds, sunrise and beautiful sunset.

*You can choose light gardening or caring for plants.

Writing & Mind Activities
*You can write short blog posts, memories, life lessons, poems and thoughts.

*You can read books ( specially books on biographies, spirituality, nature and writing)

*Light photography is also a good idea, you can use your photos for your blog and other writings.

*You can solve Crossword puzzles, Sudoku, play chess, or simple brain games

Gentle Digital Time
*You can join some online courses with IGNOU, Udemy, Coursera, open University, and many onther online free courses.

*You can learn something new on YouTube ( related to history, music, spirituality and knowledge)

*You can share your writings on Medium and blogspot for name and fame.

*Listen to old songs, bhajans, or soft instrumental music.

Heart & Soul Care
*Meditation or quiet prayer

*Help others: guide younger people with your experience

*Talk to friends or relatives regularly—even short calls matter

One Important Thought
*You’re not “killing” time, you are honoring it, one peaceful moment at a time.

So enjoy your golden time with love and laughter