शीशे का शहर


ये शहर : शीशे का 

वो जमाना लद गया
जब ईंट गारे से
घर बना करते थे
अब तो चारों तरफ
शीशे से बनी स्क्रीन ही स्क्रीन 
नजर आती है.

मैं अब 
शहर का नागरिक हूं
जेब में स्मार्टफोन,
कलाई में स्मार्टवॉच,
और दिल में अजीब-सी 
ख़ामोशी रखता हूं.

अब सुबहों को अलार्म नहीं, 
मोबाइल जगाता है
सब ऑनलाइन रहते हैं
कोई शोर नहीं होता
नोटिफिकेशन सब याद दिलाते है..

मैने एक दिन सोचा
गाँव में चलते हैं
ये क्या , यहां भी
गांव शहर हो गया
पुराने मकान पक्के 
खिड़की दरवाजे 
शीशे के हो गए

फिर एक दिन 
मोबाइल अचानक बंद हो गया
बैटरी खत्म हो गई
मैं घबरा गया
जैसे रुक गई हो सांसें..

सोचा खिड़की के बाहर झांकूँ 
पेड़ अब भी हरे भरे हैं,
आसमान अब भी नीला है,
कुछ लोग अब भी इंसान हैं,

ओह
मोबाइल फिर से चल पड़ा,
मैं सपनों से बाहर निकला
खो गया फिर से 
उन शीशे की दीवारों के पीछे

शहर वही है
मैं भी वही हूं
बस जिंदगी
शीशे के पीछे 
धकेल दी गई है...



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