शहर के सबसे ऊँचे टावर में कॉरपोरेट जगत की आपात बैठक चल रही थी. देश के सबसे अमीर लोग, उद्योगपति, निवेशक, टेक-सम्राट एक समस्या पर विचार विमर्श कर रहे थे.
सुबह से पूरे शहर का बिजली नेटवर्क ठप था नतीजा थोड़ी देर में इनवर्टर भी खत्म, ना इंटरनेट, ना बैंकिंग और ना ही कोई डिजिटल ट्रांजैक्शन. वैसे भी इस डिजिटल युग में कैश कौन रखता है ? वर्षों से किसी ने रखा ही नहीं सब डिजिटल कैश के भरोसे.
बिजली नेटवर्क फैलियर के कारण
लिफ्ट अटकी,
दरवाज़े नहीं खुले
एसी बंद
मोबाइल भी कहीं खो गए
एक प्यासा अरबपति घबराकर चिल्लाया
“मेरे पास सब है… बस एक गिलास पानी नहीं है, कोई एक गिलास पानी दे दो।”
दूसरे ने घड़ी उतारते हुए बोला
“यह दुनिया की सबसे महँगी घड़ी है, कोई इसके बदले में एक गिलास पानी ही दे दो”
वहीं सीढ़ियों पर बैठा सफ़ाईकर्मी अपनी पुरानी पानी की बोतल, चाय की थर्मस, अपनी पहचान का कागज और एक चाबी जो दरवाजे की मैनुअल चाबी थी लिए बैठा था.
हॉल में अंधेरा था, सब हॉल के कांच और जाली के दरवाजे से उसे देख रहे थे. उन्होंने देखा उसके पास पानी है और थर्मस भी है. उनकी आंखों में चमक आई.
सबको अचानक सामने देख वो घबराकर बोला
“पानी दूँगा, दरवाज़ा भी खोल दूँगा पर पैसे नहीं चाहिए मुझे”
सब उसकी बात सुनकर चौंक पड़े
“तो क्या चाहिए?” किसी नउद्योगपति ने पूछा
वह थोड़ा मुस्कुराया और बोला
“पहले मेरी बात सुनिए. जब आप लोग सिस्टम से चलते हैं तो आप हमें नहीं देखते और जब सिस्टम रुकते हैं तब आपको समझ आता है कि कौन और क्या ज़रूरी है।”
उसने दरवाज़ा खोला, सब बाहर आए, सबने पानी पिया, सबकी सांस में सांस आई.
जद्दोजहत के बाद नेटवर्क भी लौटा, मोबाइल चमके, डिजिटल वॉलेट फिर भारी हो गए लेकिन एक चीज़ हल्की रह गई अहंकार.
सब दहशत से निकले, खुशी महसूस की, अपने खाली वॉलेट की तरफ देखा और आज जाना सीखा की पैसा बस दर्शक बनकर रह जाता है. इंसान ही इंसान के काम आता है क्योंकि पैसे की भी एक सीमा होती है.
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