असलियत में नीयत वही होती है, जो मौका मिलने पर ही सामने आती है, इस संबंध में, मैं एक छोटी सी कहानी प्रस्तुत कर रहा हूं.
एक छोटे से कस्बे में राजेश नाम का साधारण व्यक्ति रहता था. राजेश शांत व्यवहार का और मीठा बोलने वाला व्यक्ति था यही कारण था कि कस्बे के लोग उसे एक अच्छा इंसान मानते थे. वह हमेशा कहता था
“मैं अपने दिल से किसी का बुरा सोच ही नहीं सकता।”
एक दिन राजेश नहर के किनारे चहलकदमी कर रहा था तभी उसकी नज़र नहर के किनारे पड़े थैले पर पड़ी. कौतूहलवस उसने जब थैला खोला तो उसमें कुछ रुपए और सोने के गहने थे. आसपास कोई भी नहीं था. यह देख राजेश का एक मन बोला
“किस्मत ने मौका दिया है, इसे रख ले ”
लेकिन तुरंत ही उसका दूसरा मन बोला
“यह किसी की अमानत है, पता लगाओ और उसे तुरन्त लौटाओ”
सोच विचार के बाद राजेश ने थैला उठा ही लिया और घर ले आया. उसने खुद को समझाया
“जब कोई देखने वाला कोई नहीं था तो इसको रखने में बुराई ही क्या है?”
कुछ दिनों बाद उसी कस्बे का एक बूढ़ा व्यक्ति रोता हुआ जा रहा था. किसी ने बताया उसकी बेचारे की ज़िंदगी भर की जमा-पूँजी नहर के आस पास या कहीं नहर में गिर गई है. बेचारे ने ये पैसे उसने अपनी बेटी की शादी के लिए बचा रखे थे.
यह सुनकर उस रात राजेश सो नहीं सका. सोने और रुपयों से भरा थैला उसे बेचैन कर रहा था. उसे ये एहसास होने लगा कि इंसान की गलत नीयत ही सबसे पहले आत्मा को बेचैन कर देती है.
अगली सुबह जल्दी में राजेश ने थैला उठाया और सीधे उस बूढ़े के पास पहुँचा. रुपए और गहनों से भरा थैला लौटाते हुए बोला
"बाबा ये है आपकी अमानत"
यह बोलते हुए राजेश की आँखों में पश्चाताप के आँसू थे और मन के किसी कोने में दुःख भी था.
बूढ़े ने अपने कांपते हाथों से थैला लिया और हाथ जोड़ते हुए बोला
“बेटा, आज तुमने मेरा ही नहीं मेरी बेटी का भी भविष्य बचाया है”
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