गाँव में पंचायत के चुनाव जोरों पर थे. भाषणों की तो बाढ़ आई हुई थी. नेता अपना अपना राग अलाप रहे थे.
उनमें से एक नेता कहता है
"सिर्फ मुझे ही वोट देना, देखना मैं गांव की तस्वीर बदल दूंगा"
दूसरा नेता कौन सा कम था, वो बोला
"मैं इसे शहर की सुविधाओं से भर दूंगा"
सब चुनाव जीतने के लिए हर हथकंडे अपना रहे थे .
इसी गांव का एक समाज सेवक हरिया ये सब सुनकर हंस रहा था. उसको मालूम था कि ये चुनाव जीतते ही गायब हो जायेंगे.
हरिया बहुत ही मेहनती व्यक्ति था. गांव के विकास में उसका भरपूर योगदान रहता था, श्रम से कभी नहीं घबराता था. जहां जरूरत पड़े वहां तुरंत पहुंच जाता था. गाँव की टूटी सड़क पर खुद फावड़ा चलाकर सड़क ठीक कर देता था. रात को अगर किसी स्कूल की छत टपकती थी तो बच्चों के साथ बैठकर टिन लगा देता था.
कुछ चुनिंदा लोगों के दबाव पर उसने चुनाव लड़ने की ठानी यह सोचते हुए कि वह गांव का भरपूर विकास करेगा.
चुनाव का दिन आया. लोगों ने पूछा
“अरे हरिया, तू किस पार्टी से है?”
हरिया मुस्कराया और बोला
“भाई, मैं काम की पार्टी से हूँ, और हमेशा काम की बात करता हूं, चाहे हारूं या जीतूं”
खैर चुनाव के नतीजे आए. नतीजे हरिया के लिए चौंकाने वाले थे. नतीजों में हरिया हार गया था. उसे थोड़ा बुरा जरूर लगा. उसने निर्णय लिया ओर गांव वालों से बोला
"अब वो कभी कोई चुनाव नहीं लड़ेगा"
अगले दिन हरिया फिर वही गांव की सड़कें ठीक करने के लिए सड़क पर फावड़ा चला रहा था.
ये देख गांव का एक युवक बोला
“हरिया काका, आप तो चुनाव हार गए थे ना ?”
हरिया मुस्कराया और युवक के कंधे पर हाथ रखते हुए बोला
“ बेटा चुनाव हार सकता हूँ पर गाँव नहीं ... जब तक जिऊंगा गांव की सेवा करता रहूंगा”
जोश में युवक ने भी फावड़ा थाम लिया, देखा देखी और भी युवक जुड़ने लगे.
चुनाव का मंच अब सूना पड़ा था, जीतने वाला नेता गायब था.
अब सड़क पर कई निस्वार्थ नेता खड़े हो गए थे. वो भी बिना वादे और कुर्सी के.
सिर्फ और सिर्फ काम के लिए.
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