(तुम्हारी स्मृति में ढली हुई)
आज सुबह की धुंध
कुछ ज़्यादा ठहरी हुई थी,
जैसे उसे भी मेरी तरह
किसी का इंतज़ार हो.
मंजिले वही हैं
और रास्ते भी
पर एक पहचान खो बैठे हैं
पेड़ भी आज नज़रें चुराने लगे हैं
हर चीज़ धुंधली नजर आती है
सिवाय तुम्हारी यादों के.
तुम्हारी खूबसूरत हँसी
धुंध के बीच से उभर आई,
फिर मैं उसी में खो गया
मैंने तुम्हें जोर से पुकारा
मेरी आवाज़ दूर कहीं खो गई.
आज इस धुंध ने
मुझे झकझोंर कर कहा
जो चला जाता है
वह पूरी तरह नहीं जाता,
बस छोड़ देता है हर जगह
अपनी उपस्थिति.
कभी-कभी
धुंध मुझे अच्छी लगती है,
क्योंकि इसमें
तुम्हारा न होना भी
साफ़ नहीं दिखता.
धुंध भी छँट जाती है
सूर्य निकल आता है
मैं रोशनी से घिर जाता हूं
तुम्हारा साया लुप्त हो जाता है.
जाते-जाते ये धुंध
कुछ तो दे जाती है
एक पल के लिए
मैं फिर से तुम्हारे साथ हो लेता हूँ.
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें