सूना साकी,
सूना प्याला,
सूनी ये महफिल
कोई छीन ले गया
खुशियां मेरी
सज गई मेरी मधुशाला...
मेरे घर में
कभी छनकती थी चूड़ियां
मुस्कुराहटें
आज विरह में जलाती है
मेरी मधुशाला.
साँझ ढलती है
बालकनी में मेरे
यादों की लालिमा बिखर आती है
यादों की घटाएँ छा जाती हैं,
सज जाती हैं मधुशाला...
तेरी ही बातें,
तेरी ही यादें,
मदिरा बन
हलक से उतर जाती हैं.
ढूंढें फिर मधुशाला..
कैसे पियूं अमृत
जब आसूं हो हिस्से में
मैं पीता हूं भर भर जाम
मदहोश कर देती है
मेरी मधुशाला..
मेज पर सजी
श्रृंगार किए तस्वीर तुम्हारी
चमक रही बिंदिया
ले लेती है मेरी निंदिया
ढूंढें मन की ज्वाला
कहां है मधुशाला....
हर जाम में
दिखती है मूरत तुम्हारी
फिर क्यों याद आए तुम
यादों, सिसकियों में सजती है
मेरी ये मधुशाला....
वो कहते हैं
ग़म भुलाती है मदिरा
मैं कहता हूं
यादें गहरी करती है मदिरा
कोई ये तो बताए
कहां है मेरी मधुशाला..
किस किस को बताऊं
विरह का नशा
पल-पल हमें रुलाता है,
तुम क्या जानो बाबू
विरह में ही काम आती है
ये मेरी मधुशाला...
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