नई दिल्ली स्टेशन और शाम का समय. अचानक ट्रेन आने का अनाउंसमेंट हुआ.
"चंडीगढ़ से अजमेर जाने वाली गाड़ी संख्या 12986 प्लेट फॉर्म नंबर 1 पर आने वाली है, जिन यात्रियों को जयपुर होते हुए अजमेर जाना है वो प्लेटफार्म नंबर 1 पर शीघ्र पहुंचे"
हरीश प्लेटफ़ॉर्म के पास की बेंच पर बैठा और आने जाने वाली ट्रेनों को और दौड़ते भागते इंसानों को देख रहा था. उसके हाथ में एक पुराना सा थैला था और आँखों में किसी अपने का इंतजार.
यह वही स्टेशन है जहां वह कई बार आया है कभी लेने आता तो कभी छोड़ने. उसकी बेटी पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ जो गई थी. जब भी जाती थी उदास होकर बोलती थी
“पापा, आप चिंता मत करो मैं जल्दी ही लौटूंगी . वो भी इसी प्लेटफार्म नंबर 1 पर”
ट्रेन के अनाउंसमेंट ने हरीश के कान खड़े कर दिए, अरे इसी ट्रेन से तो मेरी बेटी आ रही है, वह प्लेटफार्म नंबर एक की तौरफ दौड़ रहा था. ट्रेन भी पहुंच चुकी थी. बोगी के बाहर खड़ा वो बेसब्री से बेटी का इंतजार कर रहा था.
अचानक भीड़ में एक जानी-पहचानी मधुर आवाज़ सुनाई दी
“पापा…!”
हरीश ने सिर घुमाकर देखा. फिर वही चेहरा, वही आँखें वह कुछ कहता उसकी बेटी पिता से लिपट गई.
हरीश की आंखों में आँसू थे. उसकी बेटी अब हमेशा उसके साथ रहेगी. उसकी आवाज़ भरभरा रही थी. इतने में उसकी बेटी बोली
“ अरे पापा अब क्यों उदास हो रहे हो,अब तो आपका इंतजार हमेशा के लिए खत्म हुआ, मेरी पढ़ाई जो पूरी हो गईं अब हम सब साथ रहेंगे"
हरीश को आज समझ आया… हर स्टेशन मंज़िल नहीं होता, बस कुछ अपनों के पास लौटने के लिए भी होते हैं. स्टेशन वही था, प्लेटफ़ॉर्म वही था… लेकिन हरीश का इंतज़ार अब ख़त्म हो गया था.
हरीश कुछ बोलता उसकी बेटी बोली
"तो पापा चलें ... अपने घर"
दोनो मुस्कुरा रहे थे ... स्टेशन धीरे धीरे पीछे छूट रहा था...
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