अकेलापन क्या है ?
ये मनुष्य के जीवन का एक ऐसा समय है जब वो अपने आप को भीड़ में भी अकेला महसूस करने लगता है.
अकेलापन केवल शारीरिक एकांत नहीं है बल्कि भावनात्मक दूरी का दुसरा नाम है क्योंकि आज के आधुनिक, तेज़ रफ्तार जीवन में अकेलापन एक बड़ी और आम सामाजिक समस्या बनता जा रहा है, जहाँ दोस्त और रिश्तेदार तो बहुत हैं, उनके साथ संवाद भी है फिर भी लोगों में अपनापन कम होता जा रहा है.
वैसे तो अकेलेपन के कई कारण होते हैं जैसे परिवार से दूरी, मित्रों की कमी, जीवनसाथी का चले जाना, ढलती उम्र या सामाजिक उपेक्षा. ये सभी अवस्थाएं अकेलेपन को जन्म देती हैं. तकनीक के इस युग में लोग मोबाइल और सोशल मीडिया से जुड़े तो हैं, पर दिलों का जुड़ाव फिर भी कमजोर पड़ता जा रहा है. आभासी रिश्ते वास्तविक संबंधों का स्थान नहीं ले पा रहे हैं. यही खालीपन का कारण है.
अकेलेपन का प्रभाव व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है जिसके कारण उदासी, निराशा, आत्मविश्वास की कमी, तनाव और अवसाद जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं. ये अकेलापन कभी कभी व्यक्ति को भीतर से तोड़ देता है और वह स्वयं को समाज से अलग-थलग महसूस करने लगता है.
अगर दूसरी दृष्टि से देखा जाय तो ये अकेलापन हमेशा नकारात्मक नहीं होता बल्कि एक अवसर भी देता है जहां हम कुछ क्षणों का एकांत आत्मचिंतन, सृजन और आत्म-खोज का अवसर प्राप्त करते हैं. अनेक विद्वान लोग, कवि, लेखक और विचारक अपने एकांत में ही श्रेष्ठ रचनाओं को जन्म देते हैं और समाज और देश का मार्गदर्शन भी करते हैं. देखा जाय तो समस्या तब होती है जब अकेलापन बोझ बन जाए और मन को कचोटने लगे.
इस अकेलेपन से उबरने के लिए आवश्यक है कि व्यक्ति अकेले में स्वयं से संवाद करे और दूसरों से मिलने जुलने का प्रयास करे और परिवार और मित्रों के साथ समय बिताये, समाज सेवा, पढ़ाई लिखाई, ऑनलाइन कोर्सेस, योग, यात्रा, धार्मिक गतिविधियों में रुचि लेना, सामाजिक सेवा, प्रकृति के साथ समय बिताना ; जैसे पहाड़, नदी, या खुले आकाश का आनंद ले. यही रुचियां हमारे मन को शांति देती हैं. एक बहुत अच्छा उपाय यह भी है ; ब्लॉग बनाकर अपने अनुभवों को साझा करे या अपने आप को रचनात्मक कार्यों में लगाए. इससे भी अकेलेपन को सकारात्मक दिशा मिल सकती है.
सारांश में यह कहा जा सकता है कि अकेलापन जीवन का एक सत्य है, पर इसे समझदारी और सूझबूझ से संभाला जाए तो यह हमें स्वयं को समझने और मजबूत बनने का अवसर भी देता है. बस आवश्यकता है तो संतुलन की, जहाँ एकांत आत्मविकास का साधन बने, न कि मन की पीड़ा.
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