गणतंत्र दिवस.....
लहराता है तिरंगा
हर गली चौराहे पर
कोई बैठा है,
भूखे पेट
झंडे की छांव...
ओ संविधान की
कसमें खाने वालो
ग़रीब को रोटी
पहुंचाने की भी
कसमें खा लो...
काग़ज़ों में अधिकार लिखे हैं
भाषणों ने सपने पाले हैं,
आज भी किसी की
रातभर झुग्गी टपकती है,
कोई रेन बसेरों में सोता है
बच्चे भूखे सोते हैं
और
किसी को नर्म गद्दों में भी
नींद नहीं आती
वोट की कीमत
समझी जाती है
रोटी की कीमत
कौन समझाए.....
गणतंत्र तो आता है
हर साल
हर पाँच साल,
गरीबी कैसे हटेगी
ये कौन समझाए....
उम्मीदें आज भी जिंदा है
एक दिन गणतंत्र
और भी चमकेगा
फिर कोई भी
भूख से नहीं सोएगा...
जय हिंद
अमर रहे गणतंत्र हमारा
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