तुम्हारी मुस्कान
आज भी मेरी सुबह है
और शाम भी.
तुम्हारी
गहन खामोशी
हर शाम
मौन होकर बोलती है.
तुम चली तो गईं हो
पर स्नेह के बंधन
यहीं छोड़ गई हो
जो बस गई है
मेरी रूह में
मेरी साँसों में,
मेरी दुआओं में..
क्या कहूं
तुम्हारे बिना ये घर
एक कमरा बन गया है
और मेरा जीवन
एक कविता
और एक
अधूरी सी कहानी.
मेरे हर शब्द में
इन सांसों में
यादों में
तुम ही तो हो..
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