बालकनी की रेलिंग से
रात के गहन अंधकार में
कुछ अधूरे ख़्वाब नजर आए
ये रात का साया
रोशनी से नहाया ये शहर
दूर तक चमकता रहता है
आँखों में थकी रोशनी,
और खामोश हवा कहती है
सब तो ठीक है,
बस थोड़ी सी
आंखों में नमी है
मेरे दिल में
गहन अंधेरा है
मेरा खोया नूर अब
कहीं तारा बन के चमकता है
मैं यादों में सिसकता हूं.
यह रात
मेरे कान में धीरे से फुसफुसाई
जीना भी एक कला है,
तू बस जीने का तरीका देख
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