कहानी : मैं फिर लौटूंगा


मैं फिर लौटूंगा
 

वरुणेश एक कॉल सेंटर में काम करता है .. कुछ दिनों से उसे अच्छा नहीं लग रहा था... वह कुछ थका और असहाय सा महसूस कर रहा था.. काम के बोझ से, इस देश की राजधानी के पोल्यूशन से, भीड़ से और ऊंची ऊंची बिल्डिंग से वह घुटन महसूस कर रहा था. वह अक्सर सोचा करता था पैसों की चाहत ने इंसान को मशीन ही बना डाला.

वरुणेश को अब शांति की जरूरत महसूस हुई. उसने सोचा दो दिन की छुट्टी पर कहीं शांत और एकांत वाली जगह चला जाय. शुक्रवार की शाम का दिन था उसने फटाफट जरूरी सामान के साथ बैंग पैक किया और निकल पड़ा बस अड्डे की तरफ, बिना किसी तय मंज़िल के.

विशाल बस अड्डा... ... जहाँ देखो बसें ही बसे, चिल्ल पों मची हुई थी, कन्डेक्टर अपनी अपनी बसों को भरने में लगे थे... वरुणेश के सामने एक बस वाला चिल्ला रहा था 
"नॉन स्टॉप... ऋषिकेश... ऋषिकेश"

बारुणेश ने क्षण भर के लिए सोचा फिर फटाफट बस के अंदर प्रवेश किया... बस भर चुकी थी... थोड़ी देर में कंडक्टर ने टिकट भी बना दिया.. बस चल रही थी ... हवा के ठंडे झोंको ने उसे सुला दिया...

सुबह हो चुकी थी. कंडक्टर ने उसे जगाया 
"सर .. ऋषिकेश आ गया है"
"ओह" उसने कंडक्टर को धन्यवाद दिया.

शांत सुबह... हरी भरी पहाड़ीयों के किनारे माँ गंगा तीव्र गति से बह रही थी. असीम शांति थी, मनोरम दृश्य था और नदी के किनारे एकांत था. वरुणेश ने बिना समय गवाएं नदी के तट की ओर बढ़ा... घाट की सीढ़ियों पर बैठा नदी के बहाव को देख रहा था. सोच रहा था.. जीवन में इंसान को भी को इसी तरह चलते रहना चाहिए... सतत.

उसने महसूस किया ... पहाड़ों की गोद में बसा यह छोटा सा स्थान किसी दैविक जगह से कम नहीं है. उसे हवा में ठंडक और ताज़गी महसूस हुई... दूर किसी मंदिर से घंटी की आवाज उसे एक मधुर संगीत की तरह महसूस होने लगी. वह इस अनुपम सौंदर्य का आनंद लेने लगा. उसे लगा प्रकृति उसे प्यार कर रही है छोटे बच्चे की तरह दुलार रही है.

पास खड़े एक वृद्ध साधु ने मुस्कुराकर कहा
“बेटा, यहाँ लोग सवाल लेकर आते हैं और शांति लेकर जाते हैं।”
"जी बाबा आप सही कह रहे हैं" 
वरुणेश ने आँखें बंद कर लीं, उसे देख शहर की भागती सड़कें, अधूरे काम, उलझी बातें सब धीरे-धीरे धुँधली हो रहीं थीं.

उसे सब समझ आ गया था. प्रकृति समाधान नहीं देती है बल्कि वह मन को इतना शांत कर देती है कि समाधान स्वयं दिखाई देने लगते हैं.

दिनभर वह गंगा के किनारे घूमता रहा.. शाम को जब सूरज पहाड़ों के पीछे उतर रहा था, आकाश का रंग गहरा पीला हो रहा था. वरुणेश मन ही मन आनंदित होकर बोला,
“जब भी मेरा मन उदास होगा" 
फिर माँ गंगा की तरफ मुखातिब होकर बोला..
"माँ ... मैं फिर लौटूँगा, आपसे मिलने" 
सूरज ढल रहा था, फिर एक नई सुबह के लिए...



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