कहानी: अकेलापन

अकेलापन 

रात के करीब ग्यारह बज रहे थे. शहर की एक आलीशान बिल्डिंग के तीसरे माले पर खड़ा आरव नीचे की ओर देख रहा था.. इतनी रात को भी गाड़ियों का मेला सा लगा हुआ था... कुछ गाड़ियां थमी थीं.. कुछ भाग रही थीं, लोग भाग रहे थे, समय भी भाग रहा था. वह उदास सा इन सबको देख रहा था. उसके कमरे में ठहरा हुआ सन्नाटा सा था.

आरव की दिनचर्या मे दिन भर दफ्तर में लोगों से घिरा रहना, मीटिंग, ईमेल, फोन कॉल औरभी बहुतकुछ. शाम जब वो फ्लैट का दरवाज़ा खोलता, सारा शोर बाहर रह जाता और उसके भीतर एक खालीपन आ जाया करता था.

अक्सर चाय का कप लिए वह बालकनी से बड़ी बड़ी इमारतों की खिड़कियां की जलती बुझती रोशनी देखता जैसे हर फ्लैट की अपनी कोई कहानी चल रही हो. उसे लगता था कि इतनी भीड़ के बीच भी वह अकेला कैसे है?

एक रात उसने चाय वाले को देखा. कुछ लोग उस ठेले के पास खड़े हँस हँस कर बतियारहे थे और चाय सिगरेट का आनंद ले रहे थे. उसकी हिम्मत नहीं हुई उनकी बातों में शामिल होने की. चाय का गिलास खत्मकर आरव अपने फ्लैट पर आ गया.

आरव दफ्तर से लौटते वक्त रूटीन से उसके ठेले से चाय पीता. उसकी चाय वाले से बातचीत भी शुरू होने लगी, कभी मौसम की, काम की, शहर की और भी चीज़ों की. अब ये ठेला आरव की शाम का हिस्सा बन गया था. उसे लगने लगा था उसकी तरह ही यहाँ कॉलेज के छात्र , ऑटो चालक , ऑफिस के लोग औरभी लोग.. सब अपने अपने अकेलेपन को दो घूँट चाय में घोल रहे थे.

आरव महसूस करने लगा कि शहर में अकेलापन भीड़ की कमी से नहीं, जुड़ाव की कमी से होता है. उसने सोचा अब अकेलेपन को हराया जाय ... अब आरव ने कुछ नया करने की सोची उसने स्केच बनाना, पार्क में बैठकर लोगों के चेहरे पढ़ना, फोटोग्राफी करना, छुट्टी के दिन किसी नजदीक जगह घूमने चले जाना और व्यस्त रहना शुरू कर दिया.

अब उसका कमरा पहले जैसा खाली नहीं रहता था. 
खिड़की से दिखती रोशनियाँ भी अब अनजानी नहीं थीं. 
उसे समझ आ गया था... अकेलापन कोई दीवार नहीं है बल्कि एक पुल है जो उस पार क्या है.. दिखाता है..

आरव अब अकेला नहीं था उसे शहर में धड़कन महसूस होने लगी थी...

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