कविता : नादान

कविता : नादान 

कौन सी शौहरत पर,
तुझको इतना नाज़ है, 
ए नादान इंसान...

तू तो खुद ही मोहताज है
जिंदगी के अंतिम सफ़र में 
किसी और के कंधों का....

याद रख
शोहरतें भी बदल देती हें 
रिश्तों के मायने ...

कहता है जीके 
ए मुकद्दर किसी को 
इतना भी मशहूर ना कर....
🙂🙂🙂🙂🙂

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