रंग कौन भरेगा....
मैं चित्र बनाता हूँ,
इनमें रंग कौन भरेगा,
जिंदगी कोरे काग़ज़ सी
कुछ यादों की लकीरें
इन सूखे से लम्हों में
उमंग कौन भरेगा..
मैंने तो तोड़ दी हैं
तक़दीर की सारी सीमाएँ,
इस बैरंग दुनिया में
किस्से कौन भरेगा...
यादों की धूल जमी है
कई बीते बरसों से
इन फीकी सी यादों में
तरंग कौन भरेगा।
कौन भरेगा....
🙂🙂🙂🙂🙂🙂
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