तुम कहाँ हो प्रिये
शायद इस सुबह की
पहली किरण में
जो खिड़की से आकर
मेरे अकेलेपन को छू जाती है?
या फिर
उस हवा के झोंको में
जो शाम ढले
धीरे से मेरा नाम लेती है?
या फिर
उस चाँद की शीतलता में
या उन तारों की झिलमिल में
जो हर रात
मेरी आँखों में उतर आते हैं?
मैं जानता हूँ,
तुम दूर नहीं हो
मेरी धड़कनों में हो
एक संगीत की तरह...
तुम जहाँ भी हो,
मेरा गीत हो
मेरा संगीत हो
मेरी हर प्रार्थना का
केंद्र तुम ही तो हो....
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