My beloved wife


कोरा काग़ज़ 

ये जीवन मेरा 
कोरा काग़ज़ सा
जो भी लिखा 
मिटता चला गया

कुछ सपने स्याही बनकर 
कागज पर उतारे थे 
कोई उन सपनों को 
उड़ा ले गया.

लिखी थी कभी 
धूप में कुछ सुनहरी पंक्तियाँ,
बारिश के धब्बों ने
सब धो दिया.

इस जिंदगी के
कोरे पन्नों की किताब का
मैं ही लेखक हूं
मैं ही पाठक हूं

क्या करूं 
गलतियाँ से सीखता हूं
फिर भी गलती करता हूं
कल भी कोरा कागज था
आज भी कोरा कागज ही हूं.






कोई टिप्पणी नहीं: