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जीके की डायरी से

जीके की डायरी से .........
"यात्री अपने सामान की रक्षा स्वयं करें"

गांधी नगर रेलवे स्टेशन पर बहुत भीड़ थी। हर कोई जल्दी में था। किसी को घर पहुँचना था तो किसी को काम पर जाना था, कोई अपनों के स्वागत के लिए खड़ा था और कोई अपनों से बिछड़कर लौट रहा था। 

मेरी नजर एक बोर्ड पर पड़ी "यात्री अपने सामान की रक्षा स्वयं करें" मैं ठहर गया और सोचने लग गया... कितना छोटा-सा वाक्य है! लेकिन इसके भीतर कितनी बड़ी बात छिपी है। क्या हमारा ये जीवन भी कहीं एक यात्रा तो नहीं? क्योंकि हम भी अपने साथ कितना कुछ लेकर चलते है जिनमें होते हैं कुछ सपने, कुछ रिश्ते, कुछ उम्मीदें, कुछ यादें, और मन में संजोकर रखी हुई थोड़ी-सी शांति भी।

यात्राओं में लोग मिलते हैं। कुछ हमारे सहयात्री बन जाते हैं, कुछ रास्ते में ही बिछड़ जाते हैं। किसी से प्रेम मिलता है, किसी से सीख, और किसी से ऐसा अनुभव, जिसे हम जीवन भर नहीं भूल पाते। लेकिन इस भागदौड़ में एक बात अक्सर भूल जाते हैं। हम दूसरों की खुशी बचाने में अपनी खुशी खो देते हैं।

रिश्ते निभाते-निभाते अपना आत्मसम्मान भुला देते हैं। दूसरों की अपेक्षाएँ पूरी करते-करते अपने सपनों की आवाज सुनना बंद कर देते हैं। और फिर एक दिन जब जिंदगी की यात्रा में थोड़ा ठहरते हैं, तो खुद से पूछते हैं— सबका ध्यान रखते-रखते, मैंने अपना ध्यान कब रखा था?

रेलवे स्टेशन का वह बोर्ड आज भी मुझे याद है। उसने मुझे यह नहीं सिखाया कि दुनिया से बचकर रहना है। जीवन की यात्रा में दूसरों का साथ दीजिए, लेकिन अपने जीवन की जिम्मेदारी भी मत भूलिए। क्योंकि मंजिल पर पहुँचकर आपको अपने जीवन का हिसाब किसी और को नहीं, खुद को देना है। और शायद जीवन की सबसे बड़ी समझ यही है
"दुनिया के साथ चलना, लेकिन स्वयं को खोए बिना"

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धन्यवाद