भारतीय वेलेंटाइन डे
जब फरवरी की हवा में ढेरों गुलाबों की सुगंध घुलती है, बाज़ार गुलाबी और लाल रंग से भर जाता हैं. ढेरों युवा जोड़े हाथों में उपहार लिए दिखाई देते हैं तब मेरे मन में एक प्रश्न उठता है: क्या यह प्रेम प्रदर्शन गुलाबों और शारीरिक आकर्षण तक सीमित है ?
भारतीयत परंपरा के हिसाब से प्यार एक एहसास है, समर्पण है, त्याग है और जीवन में सतत चलने वाली प्रक्रिया है जो इस जनम से लेकर कई जन्मों तक चलती है.
भारतीय संदर्भ में जब हम सीता और राम को स्मरण करते हैं, तो हमें केवल दांपत्य नहीं दिखता; हमें कठिन परिस्थितियों में भी साथ निभाने का साहस दिखाई देता है. प्रेम वहाँ शब्दों से नहीं, आचरण से प्रकट होता है. जब राधा और कृष्ण की बांसुरी की तान सुनाई देती है, तो वह केवल मिलन की कथा नहीं होती, वह विरह की अग्नि में तपे हुए प्रेम की अनुभूति होती है. ऐसा प्रेम जो पास रहकर भी दूर हो सकता है, और दूर रहकर भी हृदय में बसा रहता है.
भारतीय संस्कृति में प्रेम का अर्थ “तुम मेरे हो” से अधिक “मैं तुम्हारा हूँ” है क्योंकि यह अधिकार नहीं, स्वीकार है.
अपेक्षा नहीं, एक विश्वास है.
आज के संदर्भ में वेलेंटाइन डे केवल उपहारों, शारीरिक आकर्षण और तस्वीरों तक सीमित रह गया है क्योंकि यह त्याग के बिना अधूरा है.
प्यार का सही अर्थ तो ये है जब दोनों एक दूसरे को समर्पण और त्याग की भावना से बोले जैसे कि...
“मैं तुम्हारे सुख-दुःख में साथ हूँ,”
“मैं तुम्हारी कमियों को भी अपनाता हूँ,”
“मैं तुम्हारे साथ समय की हर परीक्षा से गुजरूँगा,”
तभी यह प्यार का उत्सव है.
भारतीयता हमें सिखाती है कि प्रेम एक दिन के फूल का आदान प्रदान नहीं है बल्कि जीवन भर की साधना है. इस वेलेंटाइन पर यदि कुछ देना ही है, तो
गुलाब के साथ धैर्य दीजिए,
चॉकलेट के साथ भरोसा दीजिए,
और शब्दों के साथ प्रतिबद्धता दीजिए
क्योंकि भारतीय हृदय जानता है
प्रेम केवल कहा नहीं जाता,
ये तो आत्मा से जिया जाता है, और जन्म जन्मांतर का अटूट बंधन होता है..
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